कैमरों के सामने परोसा गया दुख धीरे-धीरे धोखे का पर्याय बनने लगा है

Sheetal P Singh : हादसों के शिकार लोगों से सहानुभूति होना स्वावाभाविक है पर समझ नहीं आता कि क्या करें जब किसी पीड़ित को आप schemer के रोल में पाते हैं जो दुख को financially exploit करने या किसी को फँसाने में एक sadist pleasure पाता दिखता है । दिल्ली में flyover या red light crossing पर हाथ,पैर पर medical पट्टी बाँधे (नक़ली चोट), दुधमुँहे बच्चों को गोद में लिये या प्रसव के लिये जाती महिला का पेट दिखाकर पैसा माँगने वाले गिरोहों से दो चार होते होते आप मुँह उधर करने लगते हैं पर यहाँ मैं अलग प्रसंग लेना चाहता हूँ ।

हाल फ़िलहाल की दो घटनाओं ने ज़्यादा चौंकाया । पहली घटना कुंडा UP की है । चार्जशीट के मुताबिक़ मरहूम DSP की पत्नी ने जो FIR दर्ज की और उसमें जिन चार लोगों को नामजद किया उसके बारे में आधार यह था कि उनके आस पास के अनाम लोग ऐसा कह रहे थे, जिसमें मीडिया प्रमुख था । अब वे स्वयं एक पुलिस अधिकारी हैं पर चार्ज शीट कोर्ट में दाख़िल हो जाने(जिसमें उनका CBI के जाँच अधिकारी को दिया बयान शामिल है) के बाद भी किसी TV वाले या मीडियावाले से बातचीत में वे उसी artificial victimhood की मुद्रा में theory of conspiracy को हवा देते हुए मिलती हैं । मेरे हिसाब से UP state ने अपनी खस्ता माली हालत के बावजूद उनके मसले में ठीकठाक compensate किया है । हालाँकि कोई भी compensation DSP साहेब का replacement नहीं हो सकता ।

दूसरा प्रसंग जिया खान का । अब लगभग तय सा हो गया है कि जिस सुसाइड लेटर पर 25 बरस के पंचोली साहेब अन्दर हैं वह जाली हो सकता है । जिया की मां राबिया खान भी शुरू शुरू में हम सब की और ख़ासकर media की स्वावाभाविक हमदर्दी की पात्र रहीं । समय बीतने के साथ साथ पता चलना शुरू हुआ कि दरअसल जिया के disturbed childhood का ज़्यादा संबंध राबिया खान के अतीत की उथल पुथल से है न कि साल डेढ़ साल के पंचोली प्रेम प्रकरण से । अगर कल यह सचमुच साबित हो गया कि ये लेटर जिया का नहीं है तो ,

दरअसल चिबिल्ले मीडिया ने बात बात पर फाँसी, तरह तरह की सजाओं की मांग, instant food की तरह त्वरित न्याय की TRP oriented चीख़ों से उथल पुथल मचा दी है । हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में petition से पहले advocates सलाह देते हैं, media में चलवा दें तुरंत accept हो जायेगी । नतीजा कैमरों के सामने परोसा गया दुख धीरे धीरे धोखे का पर्याय बनने लगा है ।

पत्रकार से उद्यमी बने शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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