कोई बात नहीं, अखबार ले जाइये, पैसे कल आकर दे दीजिएगा

: स्व-नियमन को वृहत्तर अर्थों, संदर्भों, उदाहरणों के माध्यम से समझा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह : विख्यात इंडोलाजिस्ट एवं दार्शनिक मैक्स मुलर ने कर्नल स्लीवमन की डायरी में लिखी एक चर्चा को अपनी खोज के साथ जोड़ते हुए  आदिवासी जीवन के मूल्यों के बारे में कहा ''अपनी पंचायतों में लोग आदतन और प्रतिबद्धता के साथ सत्य पर अडिग रहते थे और यहाँ तक कि हमने ऐसे सैकड़ों अवसर देखे जिनमें एक व्यक्ति की पूँजी, स्वतन्त्रता व जीवन इस बात पर निर्भर था कि वह झूठ बोलता है या सच लेकिन उस व्यक्ति ने झूठ का सहारा नहीं लिया.''

अगर एक जनजाति जिसको आज का तथाकथित सभ्य समाज हिकारत के भाव से देखता है, में सत्य के प्रति इस तरह की प्रतिबद्धता थी, तो क्या आज हम इसी प्रतिबद्धता को पुनर्स्थापित करते हुए स्व-नियमन  नहीं कर सकते? क्या ज़रूरी है कि हमें जब तक राजदंड का भय दिखा कर एक वर्दीधारी या नीली बत्ती वाला अफसर ना धमकाए हम स्वेच्छा से स्थापित मूल्यों का अनुपालन ना करें?

दरअसल स्व-नियमन (सेल्फ-रेगुलेशन) भारतीय समाज के लिए नया  नहीं है लेकिन ४०० साल  की गुलामी की मानसिकता ने हमें यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि हमारा स्व अस्तित्व में है हीं नहीं. वह राज्य  व उसके अभिकरणों के हाथों  गिरवी रखा है. यही वजह  है कि जब भी इस बात की कोशिश  होती है कि कम से कम वे गैर-राज्य  संस्थाए जैसे मीडिया या स्वयंसेवी संगठन या राज्य-नीत संस्था जैसे न्यायपालिका स्व-नियमन से समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं तो एक सुविधाभोगी वर्ग इसके खिलाफ खड़ा हो जाता है.

सच तो यह है कि आज के दौर में स्व-नियमन की अवधारणा शायद दुनिया व्यवस्था को समतावादी बनाने में  सबसे कारगर मंत्र हो सकता है. खासकर भारत में सत्ता  में व्याप्त भ्रष्टाचार या राज्य अभिकरणों में  बैठे लोगों के असीमित शक्ति  के जरिया चलाये जा रहे  शोषण को खत्म करने का यह सबसे सफल तरीका हो सकता है.

स्व-नियमन की अवधारणा के मूल में केवल एक ही सिद्धांत है. वह यह कि हर व्यक्ति के भीतर एक अच्छा व्यक्ति है जो कि अच्छे संस्कार, बेहतर समाज के प्रति आकृष्ट किया जा सकता है. पडोसी का, उसी प्रोफेशन में रहने वाले सहयोगी का और समाज का अनौपचारिक लेकिन बेहद प्रभावशाली दबाव उस व्यक्ति को गलत करने से रोकता है. भारतीय समाज में यम, नियम, रीत और शील आदि की व्यवस्था पहले से रही है और आज उसे एक बार फिर से उसे पहचानने और स्थापित कर के संस्थागत मक़ाम देने की ज़रुरत है.

कोई भारतीय सज्जन यूरोप के किसी देश गए. और वहां उन्होंने देखा कि लोग अखबार खरीद कर पैसे डिब्बे में स्वतः डाल देते हैं. उन्होंने किसी से पूछा कि उनके पास पर्स नहीं है और वह अखबार लेना चाहते हैं. उस व्यक्ति ने सहज भाव से कहा ''कोई बात नहीं अखबार ले जाइये, पैसे कल आकर दे दीजिएगा.'' भारतीय सज्जन ने कहा “मान लीजिये मैंने कल भी नहीं दिया”  इस पर उस व्यक्ति ने उसी सहज भाव से कहा ''कोई बात नहीं, परसों दे दीजिएगा''. हमारे भारतीय सज्जन ने कहा ''मान लीजिये मैंने पैसे ना देने का इरादा कर रखा है''. तब वह व्यक्ति पहली बार परेशान हुआ और एक प्राकृतिक उत्सुकता और कौतूहल में पूछा “पर आप ऐसा क्यों करेंगे?”.  

यही है स्व-नियमन के मूल में –आप ऐसा क्यों करते हैं. क्यों कोई राजा–शाहिद बलवा गठजोड़ देश को लाखों करोड़ का चूना लगा जाता है? क्यों भारत के दो वर्षों से अधिक का कोई काला धन देश  से बाहर जाता है और क्यों मुंबई की चाल में फर्जी पता दे कर कंपनियां करोड़ों का वारा – न्यारा करती हैं? क्यों कानून रहते हुए भी कोई पकड़ नहीं पाता बल्कि उसी गोरख-धंधे में मंत्री से लेकर संतरी तक ऊपर से नीचे तक सन जाते हैं?

एक गणना के अनुसार दुनिया में तीन करोड़ तीस लाख कानून हैं लेकिन हत्या, बलात्कार , चोरी की घटनाएँ रुकना तो दूर, बढती जा रही हैं. पूरी पुलिस, न्यायपालिका, शासन-व्यवस्था इसे ना केवल रोकने में नाकामयाब रही बल्कि ये सारे अपराध उनकी सरपरस्ती में फलते-फूलते रहे. आज जहाँ इस बात पर चर्चा हो रही है कि भारत में पुलिस-आबादी अनुपात 170 से बढा कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक लाया जाये वहीं यह बात नहीं देखी जा रही है कि उन देशों में पुलिस की भूमिका अपराधी पकड़ने की ही नहीं है.

मार्क्स-लेनिन ने राज्य के विलुप्त होने की शर्त बतायी थी –वर्ग संघर्ष का खत्म होना. उनका मानना था की राज्य की उत्पत्ति वर्ग –संघर्ष खत्म करने के तार्किक परिणाम के रूप में हुई थी और जिस दिन वर्ग नहीं रहेगा वर्ग संघर्ष नहीं रहेगा और नतीजतन राज्य विलुप्त हो जाएगा. पर वर्ग बढ़ते गए , संघर्ष की जगह शोषितों के अवसाद ने ले लिया. राज्य शक्तिशाली होता गए.

स्वयं मार्क्स ने भारत के बारे में कहा था “हिन्दोस्तान में दिखने वाले गृहयुद्ध, बाहरी आक्रमण व फतह, क्रांति और दुर्भिक्ष भले ही जटिल और विनाशकारी दिखाई दें ये सिर्फ सतह तक हीं असर कर पाएंगे और वह भी इसलिए कि अंग्रेजों ने भारतीय समाज के मूल ताने-बाने को जैसे सामुदायिक जीवन, कुटीर उद्योग, मूल्यनिष्ठ जीवन को तार-तार करने में कोई कसार नहीं छोड़ी.”

उधर सर विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि भारत ने पश्चिमी प्रजातंत्र अपनाने की गलती से भी कोशिश की तो उसे निरंकुसता की गर्त में गिरना पडेगा. ऐसा तो नहीं हुआ और आपातकाल को छोड़ दिया जाये तो प्रजातंत्र चलता रहा परन्तु क्या यह प्रजातंत्र वास्तविक रूप में जनोपादेय हो सका?

दरअसल यूरोपीय समाज से इतर भारतीय समाज संबंधों  पर आधारित है न कि जैसा समाजशास्त्री इमायिल दुर्खिम ने कहा  “रूसो वाला संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर आधारित यूरोपीय समाज”. भारतीय समाज का बहिरंग एक छलावा है जो ऊपर से देखने में सुस्त , अनैतिक , कमजोर , असंयमित दिखाई देता है लेकिन जब भी आपातकालीन स्थिति या भयंकर भ्रष्टाचार इसकी मूल पर चोट करने लगता है यह उठ खड़ा होता है.   

आज ज़रूरत इस बात की है कि भारतीय समाज के इस नैतिक पक्ष पर भीर से भरोसा किया जाये और राज्य की भूमिका को धीरे –धीरे कम करते हुए व्यक्ति के अच्छे पक्ष को आगे लाकर स्व-नियमन का प्रयास शुरू किया जाये. इसमें न तो शोषण है ना कला धन की जगह, ना राजा है ना झुग्गी-झोपड़ी में चलने वाली करोड़ों की कंपनियां.

भारतीय इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया ने इस प्रयास को शुरू किया है और सत्ता पक्ष या सत्ता सुख भोगने वाला एक वर्ग इसे पैदा होने से पहले ही मार देने में लगा है. अगर यह प्रयोग सफल रहा तो इसे शासन के अन्य क्षेत्रों में लागू किरते हुए विश्व को एक नयी राह दिखाई जा सकती है.


लेखक एनके सिंह जाने-माने पत्रकार हैं. ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के जनरल सेक्रेट्री भी हैं. उनसे संपर्क singh.nk1994@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. उनका यह लिखा दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर अखबारों में प्रकाशित हो चुका है. एनके सिंह के लिखे अन्य विचारोत्तेजक लेखों-विश्लेषणों को पढ़ने के लिए उनकी इस तस्वीर पर क्लिक कर दें.


 

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