कोट लखपत के अंदर की “कराहती कहानी”

: बियावान जंगल से भी भयानक एक ‘आबाद बस्ती’! : चार-दिवारी के भीतर की बस्ती, जहां मिलती है जलालत की ज़िंदगी या मौत : जाने-अनजाने हुई एक गलती ने भिखीभिंड (पंजाब) के कल के नौजवान सर्बा को आज सरबजीत सिंह बना दिया। इसे गलती कहें या फिर विधि का विधान, कि सरबजीत सिंह ने कभी किसी को चोट नहीं पहुंचाई। हथियार कभी चलाया नहीं। आंतकवादी ट्रेनिंग कैंप में कभी ट्रेनिंग लेने का भी  सबूत सरबजीत सिंह के खिलाफ नहीं मिला। फिर भी बम धमाका करके लोगों की जान लेने का आरोप सरबजीत सिंह पर लगा। आरोप लगाया पाकिस्तानी हुकूमत ने। पाकिस्तान में बम धमाके के आरोप में सरबजीत को मौत की सज़ा मुकर्रर कर दी गयी।

हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की हुकूमतों के बीच गुफ्तगू हुई। दोनों सरकारों के बीच बातचीत के बाद सरबजीत की मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में तब्दील कर दिया गया। उम्रक़ैद की सज़ा सरबजीत पूरी भी कर चुका था, लेकिन उसकी एक गलती की सज़ा शायद उसके नसीब में और बाकी थी। वो सज़ा थी, पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में हमले के बाद कई दिन तक कोमा में रहने के बाद दर्दनाक मौत। ऐसी मौत, जिसने सरबजीत के परिवार को तोड़कर रख दिया। सरबजीत की मौत ने हिंदुस्तान-पाकिस्तान के हुक्मरानों के सामने तमाम सवाल छोड़ दिये। सबसे बड़ा सवाल यह कि, जब मौत की सज़ा को, पाकिस्तानी हुक्मरानों ने उम्रक़ैद की सज़ा में तब्दील कर दिया था, फिर आखिर वो क्या कारण रहे, जिन्होंने सरबजीत को इतनी भयानक मौत के मुहाने पर ले जाकर खड़ा कर दिया। उम्रक़ैद की सज़ा पूरी होने के बाद भी, सरबजीत को सही-सलामत हाल में भारतीय हुक्मरान आखिर क्यों हमवतन ला पाने में नाकाम रहे?

पाकिस्तान में गिरफ्तार होने और उसके बाद उस पर बम धमाकों का आरोप लगने के बाद सरबजीत सिंह को जितनी चर्चा नहीं मिली, उससे कहीं ज्यादा उसकी मौत पर बबाल मचा। बबाल मचना लाजिमी था। पाकिस्तान की, जिस सबसे सुरक्षित कोट लखपत जेल में परिंदा पर नहीं मार सकता, सात तालों के भीतर उसी कोट लखपत जेल में सरबजीत की हत्या कर दी गयी। सरबजीत की हत्या को कुछ लोग पाकिस्तानी सरकार की नाकामी बताते हैं। कुछ लोग पाकिस्तानी सरकार की मिली-भगत का नतीजा। कुछ इसे किसी पाकिस्तानी तनजीम (तंजीम) की कट्टरपंथी सोच का नतीजा मानते हैं। इस सबसे कोई कम या ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है, कि एक वह युवा जो जवानी के जोश में शराब के नशे में, गफलत में किसी तरह जाने-जाने पड़ोसी देश के रेंजरों (पाकिस्तान) हाथ लग गया। उसके बाद कल का वही भारत का एक युवा सरबजीत पाकिस्तानी हुकूमत में खतरनाक आतंकवादी और भारत का ‘शहीद’ करार दिया गया।

सरबजीत सिंह की गिरफ्तारी, सज़ा और उसकी मौत की ह़कीकत की परतें उखाड़ना बंद कर दीजिए। मत करिए चर्चा अब सरबजीत के कथित रुप से पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा उसे आतंकवादी करार दिये जाने जैसी बातों पर। अब बात करना इस पर जरुरी है, कि आखिर भारत-पाक सीमा पर स्थित भारतीय गांवों के लोग आखिर लग कैसे जाते हैं, दुश्मन के हाथ? जब कोई भारतीय नागरिक भारत की सीमा पार करके पाकिस्तानी रेंजरों तक पहुंच जाता है, तो उसे भारतीय सेना, बीएसफ (सीमा सुरक्षा बल) के सैनिक आखिर रोक क्यों नहीं पाते हैं, अपनी ही सरहद में? हां यह सवाल जेहन में आने पर हमें यह भी विचार करना होगा कि, अगर कोई भारतीय महज रास्ता भटक जाने के कारण पाकिस्तानी सेना के हाथ लग जाता है, तो पाकिस्तान भी आतंकवादी ही न साबित करने पर उतर आये। जैसा कि सरबजीत सिंह के साथ हुआ।

ऐसा नहीं है कि, एक सरबजीत ही अनजाने में या नशे में भटककर सीमा पार चला गया हो। ऐसे तमाम उदाहरण मिलते हैं। ऐसे लोगों को दोनो ही देशों के रेंजर आपसी सहमति से और पुष्टि के बाद छोड़ देते हैं। सरबजीत सिंह बदकिस्मत था। किसी ने नहीं सोचा कि, नशे में लड़खड़ाये उसके कदम अब कभी अपने पांवों पर हमवतन की सरज़मीं छूने के लायक उसे नहीं रखेंगे। मैं न तो पाकिस्तान समर्थक हूं, न ही कट्टर विरोधी। बात उसूल और मुद्दों की हो तो हर पहलू पर नज़र डालना जरुरी है। सरबजीत की दर्दनाक मौत को पाकिस्तानी हुक्मरान और वहां के कट्टरपंथी जितने जिम्मेदार है, उससे कम जिम्मेदारी हमारी भी नहीं है। अपनी गर्दन फंसती देखकर दूसरों की गर्दन तलाशने से बेहतर है, कोई सटीक और सकारात्मक रास्ता निकाल लेना। फिर भी नई बहस में उलझकर वक्त जाया करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। जरुरत अब इस बात की है, कि भारत का कोई सपूत, किसी मां का लाल अब पाकिस्तान में जाकर सरबजीत न बने। इसके उपाय हमें और सीमा पर हमारे चौकस जवानों को ही निभानी होगी। भारत-पाक सीमा पर स्थित गांव में रहने वाले लोगों को बताना होगा, कि उनकी एक न-समझी उन्हें, उनके परिवार और देश को कहीं का नहीं छोड़ती है।

यहां हम एक सरबजीत की ही चर्चा न करें। पाकिस्तान सीमा पर पंजाब के गुरदासपुर जिले का एक गांव है डंडवा। करीब डेढ़ लाख की आबादी है गांव की। गांव ईसाई बाहुल्य है। सन्   2003-2004 में डंडवा गांव जाने पर जो कुछ मैंने आंखों से देखा, कानों से सुना। वह सब रुह कंपा देने वाला था। डंडवा गांव में औसतन हर 7वें घर से एक या दो लोग पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं। कई ऐसे बूढ़े मां-बाप मिले, जिनके बेटों को पाकिस्तान की जेल में बंद हुए कई साल गुजर गये हैं। कोई उन्हें छुड़ाने का प्रयास नहीं करता है। इन बूढ़े मां-बाप को जीने का सहारा हैं, तो बस वह ख़त, जो उनके बेटों ने पाकिस्तानी जेलों से लिखकर भेजे हैं। मैंने भी वे तमाम ख़त पढ़े। ज्यादातर ख़त फटकर टुकड़ों में तब्दील हो चुके हैं। पीले पड़ चुके हैं। इन्हीं में किसी एक ख़त का फटा हुआ टुकड़ा पढ़ते वक्त मेरे हाथ से भूलवश ज़मीन पर गिर गया था। उस फटे हुए ख़त के टुकड़े को पाकिस्तानी जेल में क़ैद लड़के की विधवा और अंधी मां ने बूढ़े हाथों से टटोलकर ज़मीन से उठाकर अपने गाल से लगाया और चूमा। फिर मुझसे मुखातिब होती हुई बोली- ‘इन्हें (ख़त के फटे टुकड़ों को) जमीन पर मत फेंको।’ इतना कहते ही उस बूढ़ी मां की आंखों से आंसू छलक कर गालों पर ढुलक आये…और फिर आगे वो जेल में बंद अपने बेटे की आगे की कहानी मुझे न सुना सकी।

डंडवा गांव तो एक उदाहरण था। ऐसा उदाहरण जो, मैंने अपनी आंखों से देखा,सुना, भोगा। मैं यह नहीं कह रहा कि, हर भारतीय पाकिस्तानी जेल में बंद होकर सरबजीत सिंह ही बन जाये। मैं कहना यह चाहता हूं, कि भारत-पाक सीमा पर मौजूद तमाम गांव के सैकड़ों लोग आज भी पाकिस्तान की जेलों में पड़े तिल-तिल कर मरने को मजबूर हैं । सरबजीत के लिए तो दोनों देश के हुक्मरान तमाम मर्तबा सामने आये। मीडिया ने भी खूब दिखाया-छाप, मगर डंडवा जैसे गांवों के पाकिस्तानी जेलों में बंद पड़े तमाम भारतीय नागरिकों का आज भी कोई पुरसाहाल नहीं है। डंडवा गांव में कई ऐसे भी घर मिले, जिन घरों से दो-दो तीन-तीन लोग भी पाकिस्तानी जेल में बंद हैं। किसी का भाई, किसी का पति, किसी का पिता, किसी का बेटा। इस गांव के कई बच्चों ने पिता का मुंह तक नहीं देखा है। इनमें से कई बच्चे तो अब 18-20 साल के भी हो चुके हैं। कई युवाओं के जेल जाने के बाद उनके घर ही बिखर गये। मां-बाप स्वर्गवासी हो गये। कुछ घर ऐसे भी देखने के मिले डंडवा गांव में, जिनमें घर की औरत अगर मेहनत-मजदूर न करे तो, शायद दो जून की रोटी का भी जुगाड़ न हो। इस गांव को जासूसों का गांव भी कहा जाता है। ऐसा क्यों? पूछने पर और नाम न खोलने की शर्त पर एक युवा बताता है..’मैं एक बार पाकिस्तान में गिरफ्तार हुआ। मुझे ऐजंसी वालों ने भेजा। जब पाकिस्तान में गिरफ्तार गो गया तो एजंसी वाले मुकर गये। जैसे-तैसे पाकिस्तानी जेल से छूटकर गांव लौटा, तो पता चला की मां मर चुकी है। पिता अंधे हो चुके हैं। पत्नी दोनो बच्चों के साथ पता नहीं कहां जा चुकी है।’

संजीव चौहान पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ बंद रहे भारतीय क़ैदी करामत राही के साथ…..राही के मुताबिक उन्होंने जेल में सरबजीत का लंगर भी बनाया था..करामत राही 18 साल बाद पाकिस्तान से छूट कर भारत लौटे हैं

सरबजीत सिंह को शहीद का दर्जा मिल गया। सवाल यह पैदा होता है, कि पाकिस्तानी जेलों में क़ैद में सरबजीत से पहले मरने वाले आखिर कितने भारतीयों को हिंदुस्तानी हुकूमत ने ‘शहीद’ का दर्जा दिया है? डंडवा जैसे तमाम गांवों में बसे उन सैकड़ों परिवारों का क्या होगा, जिनके अपने कई साल से पाकिस्तान की जेलों में पड़े सड़ रहे हैं? क्या होगा पाकिस्तान की जेलों में बंद उन भारतीयों का जिनका कसूर सिर्फ इतना है, कि अनजाने में वो सीमा पार जाकर पाकिस्तानी रेंजरों के हाथ लग गये। और फिर कई वर्ष बाद भी वो वापस हमवतन नहीं आ सके। महज इसलिए, क्योंकि उन्हें सरबजीत सिंह जैसी ‘मीडिया’ में कभी सुर्खीयां नहीं मिल सकीं। लिहाजा हिंदुस्तानी हुकूमत ने भी उनकी सुध लेना मुनासिब नहीं समझा।

चमेल भी क्यों नहीं, सरबजीत सिंह ही क्यों?

अंग्रेजी हुकूमत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर की कोट लखपत (लाहौर सेंट्रल जेल) में 23 मार्च 1931 को एक साथ फांसी पर लटका दिया। तीनों ही युवाओं को भारत की आजाद हुकूमत ने ‘शहीद’ का दर्जा दिया। सरबजीत ही हत्या कोट लखपत जेल में कर दी गयी। सरबजीत को ‘शहीद’ का दर्जा दिया गया। फिर चमले सिंह को आखिर हिंदुस्तानी हुकूमत ने ‘शहीद’ का दर्जा क्यों नहीं दिया। भारतीय हुक्मरानों से सवाल कर रहे हैं चमेल के आश्रित। चमेल की हत्या 15 जनवरी 2013 को कोट लखपत जेल में पीट-पीट कर की गयी थी। चमेल की लाश का पोस्टमार्टम 13 मार्च को किया गया। सरबजीत सिंह की तरह ही चमेल की लाश से भी पाकिस्तानी डॉक्टरों ने दिल, गुर्दा और दिमाग का हिस्सा निकाल कर अपने पास रख लिया था। ऐसे में चमेल सिंह के परिवार वाले भारतीय हुक्मरानों से पूछते हैं कि आखिर वह खुद ही क्यों और कैसे अंतर की खाई खोदकर रहे हैं, सरबजीत और चमेल सिंह के बीच ? दोनो ही भारतीय हैं। दोनो ही पाकिस्तानी हुकूमत की क़ैद में प्रताड़ना और जानलेवा हमले में मारे गये हैं। जब सब कुछ एक सा तो फिर शहीद का दर्जा एक अकेले सरबजीत सिंह को ही क्यों? जब भारतीय के साथ भारत सरकार ही इस तरह भेदभावपूर्ण रवैया अख्तियार कर रही है, तो फिर पाकिस्तानियों को और वहां के हुक्मरानों को कोसने से भी क्या मिलने वाला है? सवाल छोड़कर चमेल सिंह के रिश्तेदार चुप हो जाते हैं।

कोट लखपत जेल जहां हो जाते हैं इंसान ‘पागल’

कहीं की भी हो। जेल तो जेल है। हर जेल की अपनी अलग दुनिया होती है। अपने-अपने कायदे-कानून होते है। हर जेल की अपनी-अपनी पाबंदियां होती हैं। पाकिस्तान में लेकिन कोट लखपत यानि लाहौर सेंट्रल जेल का नाम सुनते ही खासकर भारतीय क़ैदियों को पसीना आ जाता है। करीब 18 साल पाकिस्तान की तमाम जेलों में बंद रहकर भारत लौटे पंजाब (भारत) के राही करामत तीन साल कोट लखपत जेल में भी बंद रहे। जेल में करामत राही सरबजीत सिंह का लंगर (खाना) भी बनाते थे। राही के मुताबिक कोट लखपत जेल में या तो हिंदुस्तानी क़ैदी को पागल कर दिया जाता है। या फिर वही हिंदुस्तानी क़ैदी कोट लखपत जेल में जिंदा रह पाता है, जो पागल हो जाये या फिर पागल होने के कगार पर हो।

गोपाल दास भी पाकिस्तान की जेलों में 28 साल काटकर भारत लौटे हैं। गोपाल दास भी कई साल कोट लखपत जेल में बंद रहे हैं। उस समय सरबजीत सिंह भी वहां क़ैद थे। गोपाल और सरबजीत की कई मुलाकातें भी कोट लखपत जेल में हुईं। बकौल गोपाल दास- ‘पूरे पाकिस्तान में अकेली कोट लखपत जेल ही ऐसी जेल हैं, जहां से रात में रोज चीखने-चिल्लाने की आवाजें आती हैं। यह आवाजें उन हिंदुस्तानी क़ैदियों की होती हैं, जो जेल की प्रताड़ना से पागल हो चुके हैं। तमाम भारतीय क़ैदी जेल की बैरकों में पागल होकर निर्वस्त्र पड़े रहते हैं।’ गोपाल दास कहते हैं कि पाकिस्तान की जेल में भगवान दुश्मन को भी बंद न कराये। पाकिस्तानी जेलों में तैनात स्टाफ की हर कीमत पर तमन्ना रहती है, कि वहां क़ैद हिंदुस्तानी क़ैदी न तो मरे और न ही जिंदा रहने लायक बचे। मतलब पागल करके छोड़ दो।

“फांसीपारा” यानि मौत की कोठरी

पाकिस्तानी जेलों से जिंदा लौटकर हमवतन पहुंचे महेंद्र सिंह, बलवीर सिंह, गोपाल दास, करामात राही, कोई भी क़ैदी हो, सब यही दुआ मांगते हैं कि, कोट लखपत जेल में किसी दुश्मन को भी बंद न किया जाये। कोट लखपत जेल में स्थित पंद्रह कोठरियों की कहानी सुनाते हुए गोपाल दास कहते हैं, – ‘यह काल-कोठरियां हैं। दूसरी जेल से जब किसी हिंदुस्तानी क़ैदी को कोट लखपत जेल में लाकर बंद किया जाता है, तो उसे सबसे पहले फांसीपारा में जरुर क़ैद रखा जाता है। फांसीपारा काल-कोठरी है। फांसीपारा में अमूमन उन्हीं क़ैदियों को रखा जाता है, जिन्हें पाकिस्तानी कानून में मौत की सज़ा सुनाई गयी हो, लेकिन जिन हिंदुस्तानी क़ैदियों को फांसी की सज़ा नहीं भी सुनाई गयी होती है, फांसीपारा में उन्हें भी लाकर बंद किया जाता है। ताकि वो जब तक फांसीपारा की कोठरी में क़ैद रहें, उन्हें यह डर लगता रहे, कि कभी भी उनको इस कोठरी से निकालकर फांसी पर लटकाया जा सकता है। भले ही कानून ने उन्हें फांसी की सज़ा न दी हो। असल में फांसीपारा का भय ही इतना होता है, कि उस अंधेरी-वीराना काल कोठरी में कमजोर दिल इंसान दहशत से ही दम तोड़ सकता है।’

कोट लखपत जेल-शहीद भगत सिंह से सरबजीत सिंह तक

कोट लखपत जेल में 1931 में भगत सिहं, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गयी। मशहूर पाकितानी पॉलिटीशियन जुल्फिकार अली भुट्टो कोट लखपत जेल में ही क़ैद रहे। 30 दिसंबर 1999 को गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तानी सीरियल किलर जावेद इकबाल भी इसी जेल में बंद रखा गया था। इकबाल ने पाकिस्तान में 6 से 16 साल के 100 से ज्यादा युवकों की हत्या की थी। फांसी की सज़ा पाये इकबाल ने बाद में 8 अक्टूबर 2001 को कोट लखपत जेल में ही आत्महत्या कर ली थी।

संजीव चौहान पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ बंद रहे भारतीय क़ैदी गोपाल दास के साथ…गोपाल दास 28 साल बाद पाकिस्तान से छूटकर आये

पाकिस्तानी जेलों में ‘टार्चर-ट्रेनिंग’

पाकिस्तान की जेलों से छूटकर आये तमाम क़ैदियों के अनुभव रोंगटे खड़े कर देते हैं। उनके मुताबिक कोट लखपत जेल में उसी अफसर-कर्मचारी की तैनाती होती है, जो क़ैदी को पागल करने में माहिर हो। इस जेल में पोस्टिंग के लिए सबसे बेहतर अफसर-वार्डन वह समझा जाता है, जो क़ैदी को इस तरह प्रताड़ित करे, जिससे क़ैदी मरे नहीं, मगर विक्षिप्त हालत में आ जाये। इसके लिए बाकायदा कुछ रिटायर्ड जेल कर्मचारियों-अफसरान को जेलों में मौजूदा स्टाफ को ट्रेंड करने के लिए बुलाया जाता है। पाकिस्तान की मियांवाली की कसूरी जेल में भारतीय क़ैदियों के दिन की शुरुआत 5 कोड़ों से होती है। इस जेल का यह अपना अघोषित कानून है। इसके बाद हर सजायाफ्ता भारतीय क़ैदी को 4 या 5 किलो रस्सी रोज हाथों से बटकर (बनाकर) देना जरुरी है। पाकिस्तानी जेलों में भारतीय क़ैदियों से मैला उठवाना, नालियां साफ करना, शौचालयों में ड्यूटी कराना भी शामिल है।

ज़मीन पर पेट के बल लिटाकर भारतीय क़ैदी को भारतीय क़ैदी से ही धूप में तपती धूप में नंगे बदन खिंचवाना, एक क़ैदी के बदन के ऊपर एक साथ दो दो क़ैदियों को कुदाना, क़ैदी को तब तक दौड़ाना जब तक कि वो बेहोश न हो जाये, रात भर पानी में भीगे चमड़े के छित्तर (पट्टे) से नंगे बदन तब तक पिटाई, तक बदन से खून न रिसने लगे, जैसे यातनाएं पाकिस्तानी जेलों में भारतीय क़ैदियों को महज इसलिए दी जाती हैं, ताकि वो मरें तो न, लेकिन पागल हो जायें।   

विदेशी जेलों में भारतीय क़ैदी

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा वक्त में तकरीबन 6569 भारतीय नागरिक विदेशी जेलों में बंद हैं। इनमें सबसे ज्यादा भारतीय नागरिक सऊदी अरब (करीब 1691) की जेल में क़ैद हैं। इसके बाद दूसरे नंबर पर कुवैत (1161), तीसरे नंबर पर संयुक्त अरब अमीरात (1012) और फिर ब्रिटेन (426), नेपाल (377), इटली (121), चीन (157), अमरीका (155), बंग्लादेश (62), अफगानिस्तान (28), और अंत में बहरीन (18) का नंबर आता है।

 लेखक संजीव चौहान की गिनती देश के जाने-माने क्राइम रिपोर्टरों में होती हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. ये लेख इनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है. इनसे संपर्क patrakar1111@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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