क्या निराला प्रगतिवादियों को पसंद नहीं करते थे?

Virendra Yadav : निराला को कभी किसी ने मार्क्सवादी सिद्ध करने की कोशिश नहीं की. वेदांत और अद्वैतवाद के रास्ते उनका हिन्दू रुझान भी प्रश्नांकित होता रहा है. लेकिन यह सच है कि वे ब्राह्मणवाद की जकड़बंदी को तोड़ने वाले थे इसीलिये वे 'चतुरी चमार', बिल्लेसुर बकरिहा' और 'धोबी, चमार पासी. खोलेंगें अँधेरे का ताला' सरीखी पंक्तियाँ लिख सके और 'ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत' की नियति झेलते रहे.

 

'जनसत्ता' अब अगर गोयेबेल्यीय झूठ फ़ैलाने सरीखा माध्यम न बन गया होता तो कम से कम उसमें यह झूठ तो नहीं ही छपना चाहिए था कि "'निराला प्रगतिवादियों को पसंद भी नहीं करते थे. उन्हें वे अज्ञानी, अहंकारी और पर-उपदेश कुशल लगते थे." सच यह है कि निराला ने कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'लोकयुद्ध' के दो वर्ष पूरे होने पर अपने शुभकामना सन्देश में लिखा था- "तुम्हारी पार्टी के लिए मेरे ह्रदय में अपार श्रद्धा है". इसी के साथ उन्होंने अपनी कविता 'जल्द जल्द पैर बढाओ' भी प्रकाशनार्थ भेजी, जो पहली बार वहीं छपी. एक जनतांत्रिक देश में खुले आम अखबार के माध्यम से झूठ का प्रचार करना, सचमुच निंदनीय है.

Vimal Kumar maine pahle hi kaha tha om thanvi ka agenda leftiston per attack karna hai agey ki alochna se dukhi hoker we nirala ke bahane leftiston per attack kar rahe.shanker sharan ka lekh bakwas hai wo nayye peedhee ke logon ko bharma rahe jo nirala ke baare me jante hi nahi.
 
Ranjit Kumar Sinha निराल रुढ़ियोँ का ,जात पात का पुरजोर विरोध किया जिसके चलते वे साहित्य के मठोँ से उपेक्षित रहे।
 
Manisha Kulshreshtha जनसत्ता का संदर्भ तो मुझे नहीं मालूम, मगर संपूर्णता में निराला और निर्मल को पढ़ें तो लगता है कि किसी भी लेखक के उपर हिन्दु रुझान, मुस्लिम रुझान जैसे टैग्स ही व्यर्थ हैं। दर्शन और साहित्य को धर्म से अलगा कर ही लिखा और पढ़ा जाना चाहिए . मेरी समझ तो यही कहती है।
 
Ranjit Kumar Sinha जनाब साहित्यकार प्रगतिशील होता है ये प्रेमचंद ने भी माना था जो कि प्रगतीशील लेखक संघ (भारत (के पहले सभापति थे।पर प्रगति को मार्क्सवाद का तकमा देना अनुचीत है
 
Parmanand Shastri jansatta me chhapa lekh khatrnaak mansikta se prerit hai.ve harhal me nnirala ko sanghi banane par tule hain.lekin'vah todti pathar,'bhkshuk'kaviatyon kaise khariz karenge?ye kavitayen sanghiyon ke pet marod paaida kar rahi hoongi?
 
Vimal Kumar nirmal ji vampanth se hindu dharm ki or laute nirala vedant se pragatishilta ki or gaye,nirmal ji ant me advani she manch share ker bjp ke hindu nationalism ka samarthan kiya bjp ko vote deni ki baat kahi per nirala ne to nehru ka bhee virodh kiya.fir bhee nirmal verma ki kuchh kahani badi kahaniyan hai ,we bade lekhak the antim dino me hinduwadi rujhan ki taraf badhte hue nityanand tiwari aur veer bharat talwar ne ek achha lekh alochna me likha tha
 
Virendra Yadav Manisha Kulshreshtha इसका सन्दर्भ आज 'जनसता' में प्रकशित शंकर शरण का वह लेख है जिसमें निराला को हिन्दुत्ववादी सिद्ध किया गया है और वामपंथियों की आलोचना की गयी है कि वे निराला को प्रगतिशील बताते हैं .
 
Narendra Tomar कुछ दलित , खासतौर पर फेसबुकिया 'विचारक' यह मान कर चलते हें कि प्रगतिशीलता टकसाल में ढला हुआ सिक्‍का है जिस पर उनकी मुहर लगना जरूरी है ।
 
Ranjit Kumar Sinha मार्क्सवाद एक दर्शन है और भारतीय साहित्य मेँ कबीर से बड़ा कोई मार्क्सवादी नहीँ है पर कबीर तो मार्क्स से काफी पहले पैदा हुए ।अगर साहित्य को जानना है तो इतिहास को भी पढ़ना चाहिए ।हरेक व्यक्ति जो एक आदर्श जीवन जीए वो मार्क्सवादी है भले ही वे प्रलेस जलेस मेँ न ह
 
Manisha Kulshreshtha मैं नहीं देख सकी आज, देखती हूं। Virendra Yadav ji.
 
Shriniwas Rai Shankar निराला न तो मार्क्सवादी थे..और न ही हिन्दुत्ववादी….सही मायने में भारतीय काव्य जगत में प्रगतिशीलता के अंकुरण के सही उदाहरन हैं.
 
Dr.Lal Ratnakar वीरेंदर जी – एक जनतांत्रिक देश में खुले आम अखबार के माध्यम से झूठ का प्रचार करना ,सचमुच निंदनीय है . इससे बड़ा तमाचा और क्या हो सकता है !
 
Bhartendu Mishra जब कुछ नही बचता है तो होशियार लोग(शंकर शरण) अपने पूर्वजो को ही गरियाने लगते हैं-कि कमसे कम उन जैसो की ओर लोगों का ध्यान जाए।तुलसी या कबीर या फिर विवेकानन्द और अम्बेडकर को गरियाने वाले लोगो के लिए अपना नाम आगे रखना ही मूल उद्देश्य होता है।जिस निराला के नाम से अधिकांश हिन्दी भाषी महानगरो मे निराला नगर बनाए गये वह महात्मा गान्धी की तरह म

द्धयम मार्गी तो हो सकते हैं।उन्हे हिन्दुत्ववादी कहना लेखक के अज्ञान का ही प्रतीक है।उसे तो यह भी नही मालूम कि हिन्दुत्व वाद शब्द निराला के समय मे या कि पराधीन भारत मे जातीय चेतना का प्रतीक था ,सांप्रदायिक नही था।.. बाद मे लिखी उनके कविताएँ-कान्यकुब्ज कुलांगार आदि कहने वाले निराला ही बाद मे -बान कूटता है/चतुरीचमार/बिल्लेसुर आदि पात्र लेकर सामने आते हैं।अपनी कुलीनता को तोडने वाले पहले आधुनिक कवि हैं।
 
Manisha Kulshreshtha यह लेख तो सच में prejudiced mindset से लिखा गया है।
 
Bhartendu Mishra यह भी पता करना चाहिए कि क्या इसमे ओम थानवी की भी सहमति है ?या निराला को हिन्दू साबित करने के पीछे जनसत्ता की विज्ञापन दर बढवाना उद्देश्य है।
 
Shriniwas Rai Shankar lekin aalekh किसी अखबार में छपा आलेख लेकिन दुष्प्रचार नहीं कहा जा सकता …वह शंकर के निजी विचार हैं..जनसत्ता के नहीं.
 
Virendra Yadav Bhartendu Mishra जनसत्ता में इस तरह की सामग्री बिना ओम थानवी की सहमति के नहीं छपती .यह उन्ही के वाम विरोधी अभियान का हिस्सा है .
 
Manisha Kulshreshtha हो सकता है, बहस आमंत्रित करने का प्रयोजन हो।
 
Virendra Yadav Shriniwas Rai Shankarकिसी लेखक के विचार उसके अपने हो सकते हैं लेकिन यदि यह विचार तथ्यहीन हों और झूठ पर आधारित हों तो इसे दुष्प्रचार नहीं तो और क्या कहा जायेगा ?
 
Mahendra K. Singh निराला जी मेरे प्रिय कवि हैं, महान हिंदी कवि हैं, और उनका पूरा सम्मान है मेरे मन में। पर जहाँ तक प्रगतिशीलता की बात है मुझे नहीं लगता है कि वे अपनी प्रगतिशीलता में अपने मानस गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर और माइकल मधुसूदन की छाया से एक इंच भी आगे निकल सके हैं। यहाँ किसी को छोटा बड़ा साबित करने की बात नहीं है, मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ अभी कुछ दिनों पहले आपने टैगोर के नोबल पुरस्कार प्राप्त करने के बारे में उनकी योग्यता पर सवाल उठाये थे। इस सन्दर्भ में क्या इस प्रश्न पर विचार करना लाज़मी नहीं हो जाता है कि कहीं टैगोर की भव्य काव्यात्मकता और उनके विशाल व्यक्तित्व की तुलना में निराला उनके हिंदी संस्करण बनकर तो तो नहीं रह गए ….. चाहे वह काव्य-शिल्प हो, विचारधारा हो, जीवन-दर्शन हो, वेदांत और अध्यात्म का प्रभाव हो या फिर जात-पात और रूढ़ियों का विरोध?
 
Shriniwas Rai Shankar लेखक द्वारा दुष्प्रचार किया हो सकता है..परन्तु अखबार को उसमे शामिल करना शायद पूरा उचित नहीं होगा.

Bhartendu Mishra वीरेन्द्र जी यदि यह सत्य है तो चकित करने वाला है क्योकि प्रभाष जोशी जी के समय से जनसत्ता की यह लाइन नही रही।अन्यथा इस लेख मे संपादक का हस्तक्षेप होना चाहिए था।
 
Virendra Yadav Manisha Kulshreshtha संभव है आप का सोचना सही हो .लेकिन पिछ्ला मेरा ही अनुभव बताता है कि ओम थानवी ने स्वयं सी आई ए संबंधी अपना लेख छापा ,लेकिन उस पर भेजे गए किसी भी प्रतिवाद को आज तक नहीं छापा.इस बाबत मेरा लेख 'कथादेश ' के जुलाई अंक में प्रकशित है . ..अक्सर वे बहस भी अनुकूलित करके छापते हैं .
 
Vimal Kumar shivpujan sahay nirala ke sabse kareebee rahe .sabse adhik sansamaran unhone nirala per likhe we unse paanch saal bade bhee the .unhone unhe mahamanav bataya ,ramvilas ji jab nirala ki sahitya sadhna likhne se pahle shivpujan jee se milne gaye to unhone ne nirala ke baare me bahut bate batayee.unhone ne ye bhee kaha ki nirala ke saath bahut anyay hua hindi me.fir unhone pucha ki batayen to unhone nahi bataya.ramvilashji ne likha hai ki jinda bhooton ke karan unhone ne nahi bataya..shivpujan sahay ne likha hai nirala jaise log duniya me kum hi paida hote hain…apne jeevan me nirala to premchand se adhik krantikari the.premchand to kayee mayne me kuchh duniadar bhee thee.kewal nagarjun aur trilochan ji hi unki parampra ke vahak hain .
 
Vimal Kumar shanker sharan aur om thanvi ko shayad ye maloom nahi aur maloom hai to is tarah ki baaten kaise likh gaye.unka maqsad vam ka virodh hai nirala to ek madhyam hain .vam ka virodh karen per nirala ko mohra banaker nahi
 
Bhartendu Mishra थानवी को तो तटस्थ मानता रहा हूँ,पता नही ..उन्हे क्या हुआ ?वैसे भी संपादक का तटस्थ और जनपक्षधर होना मुख्य लक्षण होता है।
 
Alka Singh निराला पर कलम चलाने से पहले निराला कोसही मायनों में समझना जरूरी है ………………
 
Vimal Kumar jahan tak mujhe smaran hai nirala per sambhavtah pahla lekh nanddulare vajpayee ka tha,us samay wo m.a ke student the 1932 me shivpujanji ne likhwaya tha unse .ramvilash ji ko to bad me maloom hua ki nirala bainswada ke hain.ramvilashji ki book aane ke baad hi nirala ki badi image banui nahi to un dino mathilisharan gupta aur pant hi bade kavi mane jaate the .itighas ne siddh kar diya ki kaun bada kavi hai.jitna bada range nirala me hai 20wi shadi ke kisi kavi me nahi
 
Mahendra K. Singh यह भी विचार करने वाली बात है कि निराला की राष्ट्रवादी पंक्तियाँ "वधिर विश्व चकित भीत सुन भैरव वाणी जन्मभूमि मेरी है जगनमहारानी" और राष्ट्रवादी संगठन आरएसएस के मुखगीत "नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे" में कितना ध्वनिसाम्य और अर्थसाम्य है, शुक्र है कि संघियों की निगाह अभी इस पर नहीं पड़ी ….
 
NandKishore Neelam वीरेंद्र दा, शंकर शरण की हर पंक्ति का तल्ख़ और पुख्ता जवाब दिया जा सकता था, पर जितनी बिसात उस लेख की थी उतना जवाब दिया जा चुका है. दासों के लेखन से इससे ज्यादा उम्मीद की भी नहीं जा सकती.
 
Ashok Kumar Pandey किसी लेखक का मूल्यांकन काल निरपेक्ष नहीं होता. देखना यह होता है कि वह अपने समय और समाज द्वारा दिए गए बन्धनों को किस हद तक काटता है, किस हद तक आगे बढ़ता है…
 
Kanwal Bharti चतुरी चमार निराला की दलित विरोधी रचना है.
 
Vimal Kumar premchand bhee dalit virodhi nirala bhee dalit virodhi….pura hindi sahitya brahmanvadi hai…
 
Kanwal Bharti अब आपने सही बात कही.
 
Ashok Kumar Pandey कँवल जी, ठीक है न आपलोग ही सिर्फ़ क्रांतिकारी हैं बाकी पूरी परम्परा प्रतिगामी. इसी मुगालते में खुश रहिये.
 
Mahendra K. Singh "चतुरी चमार निराला की दलित विरोधी रचना है" ….. बिलकुल उसी तरह जैसे प्रेमचंद की "कफ़न" !
 
Mahendra K. Singh वैसे भी निराला का जाति-विरोध केवल ब्राह्मणों की उपजातियों खासकर कान्यकुब्ज और सरयूपारीण के बीच के अंतर को मिटाने तक ही सीमित है !
 
Ashok Kumar Pandey सिर्फ़ धर्मवीर की रचनाएँ 'दलित सम्मान' की रचनाएँ हैं.
 
Ashok Kumar Pandey निराला पर चल रही बहस पर मुझे उनसे जुड़ा एक रोचक प्रसंग याद आ गया. शायद रमेश चन्द्र द्विवेदी ने अपनी किसी किताब में लिखा है. स्मृति के आधार पर लिख रहा हूं… हुआ ये कि मध्य प्रदेश के रहने वाले कोई कट्टर कनौजिया (कान्यकुब्ज) पंडित जी निराला जी के बहुत बड़े भक्त थे. भक्त क्या थे, उनका तो यहां तक मानना था कि अगर हिन्दी में कोई सच्चे अर्थों में कवि है तो केवल निराला ही हैं. लेकिन उनके इस अप्रतिम निष्कर्ष की अधिकाधिक वजह, निराला की कविता नहीं बल्कि निराला का कान्यकुब्ज ब्राह्मण होना था. निराला के प्रति पंडित जी का अनन्य भक्ति-भाव देखकर किसी साहित्यकार मित्र ने उन्हे निराला से मिलवाने का वचन दिया. पंडित जी उत्साह से लबरेज होकर दूसरे ही दिन इलाहाबाद आ गए,और उसी दिन एक साहित्यिक बैठक में ले जाए गए जिसमें निराला जी भी थे. निराला को सामने देखकर वे खुशी से फूल गए. लेकिन ये खुशी कुछ देर बाद ही काफूर हो गई. पंडित जी ने सुना कि निराला ब्राह्मणों को गाली बक रहे हैं. पंडित जी का दिल टूट गया.. लेकिन आस न टूटी, थोड़ी देर बाद उन्होने देखा कि निराला शराब पी रहे हैं, अब पंडित जी अपने बगल वाले से बोले- निराला की कविता में अब वो बात नहीं रही, फिर कुछ देर में पंडित जी देखा किए कि निराला मांस भी खा रहे हैं- पंडित जी सुलग उठे. उनसे निराला का ये रूप और न देखा गया बोले- 'निराला तो कवि ही नहीं हैं. बेवजह लोगों ने उन्हे सर चढ़ा रखा है…'
वाया Himanshu
 
Kanwal Bharti इस देश में प्रगतिशील चिन्तन मार्क्सवाद ने दिए और लोकतान्त्रिक सोच दलित लेखकों ने दी.
 
Ashok Kumar Pandey नहीं भाई साहब. मार्क्सवाद ने तो सिर्फ़ 'ब्राह्मणवादी' दिए. उनसे दूर रहिये. प्रगतिशीलता तो शंकर शरण के यहाँ है..वहाँ शरणागत होना बेहतर है.
 
Kanwal Bharti शंकर शरण भी तो ब्राह्मण हैं.
 
Shobhit Jaiswal शंकर शरण ने उद्धरण देकर अपनी बात कही है। निराला के समर्थकों से अनुरोध है कि वे शंकर शरण के तर्कों की काट पेश करें ।इधर उधर की कहने से अच्‍छा है कि बात का तार्किक विरोध करें ।
 
Mahendra K. Singh यह अनायास नहीं कि निराला की वीणावादिनी कविता दशकों से राष्ट्रवादी संगठन "आरएसएस" के सरस्वती शिशु मंदिरों जो नयी पीढ़ी में हिन्दू राष्ट्रवाद का बीज बोने के लिए नर्सरी का काम करते हैं, में दशकों से प्रति दिन सुबह गाई जाती रही है:

"नव गति नव लय,ताल छंद नव
नव नभ के नव विहग वृन्द को
नव पर नव स्वर दे
वीणा वादिनी वर दे !
 
Bhagwanswaroop Katiyar No body can challenge integrity of Nirala ji.He was antibrahmnist and progressive from every point of view.
 
Kanwal Bharti निराला हर दृष्टिकोण से ब्राह्मणवादी थे.
 
Mahendra K. Singh अगर स्वजातियों को गाली देना, शराब पीना, और मांस खाना ही प्रगतिशीलता के लक्षण हैं तो नेहरु से लेकर जाने कितने ऐसे ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में ही थे जो उन दिनों ही यह सब किया करते थे पर क्या सभी प्रगतिशील हो गए ….
 
Mahendra K. Singh वैसे भी हिन्दू धर्म के शाक्त सम्प्रदाय में मांस मदिरा का सेवन करना धर्म सम्मत माना जाता है। ध्यान रहे निराला बंगाल में पैदा होने और रहने के कारण और रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव में होने के कारण शक्ति के उपासक थे …सन्दर्भ "राम की शक्ति पूजा"!
 
Vaibhav Singh मैं भी स्तब्ध हूं इस तरह का सफेद धूठ से भरा लेख पढ़कर। निराला का साहित्य, मतवाला की संपादकीय टिप्पणियां और संकलित भाषण पढ़े बिना केवल तुलसीदास, शिवाजी का पत्र या वेदांतिक दर्शन पर टिकी रचनाएं दिखाकर निराला का कुपाठ तैयार करना विशुद्ध धूर्तता और मूर्खता है।
 
Kanwal Bharti मांस-मदिरा से कोई न पिछड़ा होता है और न प्रगतिशील.
 
निर्मल गुप्त kanwal bharti aur mahendra k.singh एक झूठ को कम से कम सौ बार दोहराएँ .इस मुल्क को भी एक नहीं दो दो गोयबल्स मिल जायेंगे .
 
Mahendra K. Singh सही बात है कि व्यक्तिगत जीवन में कोई क्या करता है इससे किसी की विचारधारा का आकलन नहीं करना चाहिए। मांस खाए या दारू पिए। सिर्फ इतना कहना काफी होगा कि अडोल्फ़ हिटलर और चंगेज़ खान दोनों ही शाकाहारी थे।

पर किसी लेखक/कवि का आकलन उसके रचना कर्म से जरुर किया जाना चाहिए। बेशक निराला ने अपने उत्तर भारतीय कान्यकुब्ज ब्राम्हण समाज के लोगों की तुलना में कुछ प्रगतिशील बातें कहीं, पर उनके रचना-कर्म में quantitatively या qualitatively दोनों ही दृष्टियों से हिन्दू राष्ट्रवाद, वेदांत के प्रति अंधश्रद्धा, हिन्दुओं के शाक्त सम्प्रदाय का प्रभाव इत्यादि उनकी तत्कालीन प्रगतिशीलता पर बहुत भारी पड़ता है, अब उसे कैसे इगनोर किया जा सकता है।
 
Mahendra K. Singh गुप्ता जी आप व्यक्तिगत न हों तो बड़ी मेहरबानी होगी, किसी को गोएबल्स कहने से पहले जान लें कि गोएबल्स कौन था? वैसे भी आप अपने प्रोफाइल एजुकेशन वाले कॉलम में लिखते हैं कि आपने किसी India, West Warwick, Rhode Island नाम की फर्जी संस्था में शिक्षा प्राप्त की है …..वाह …ऐसी संस्था के बारे में मैंने नहीं कभी देखा सुना ….लगता है वहीं आपने गोएबल्स के बारे में पढ़ा होगा ..है न? अब आप ही बताएं कौन गोएबल्स है आप या यह संस्था जहाँ आपने पढ़ाई की है?

Surya Narayan yah Shakar Sharan kaun hai!kya Thanvi Sahab unki aad me Modi ke agende ka prachar kar rahe hain!
 
Mahendra K. Singh मोदी के हिंदूवादी अजेंडे का प्रचार तो वीणावादिनी और राम की शक्तिपूजा जैसी हिन्दू राष्ट्रवादी कविताओं के लेखक निराला जी की प्रशस्ति से हो रहा है …
 
Ashok Kumar Pandey निराला यह षड्यंत्र खूब पहचानते थे…

राजे ने अपनी रखवाली की;
किला बनाकर रहा;
बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं ।
चापलूस कितने सामन्त आए ।
मतलब की लकड़ी पकड़े हुए ।
कितने ब्राह्मण आए
पोथियों में जनता को बाँधे हुए ।
कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए,
लेखकों ने लेख लिखे,
ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे,
नाट्य-कलाकारों ने कितने नाटक रचे
रंगमंच पर खेले ।
जनता पर जादू चला राजे के समाज का ।
लोक-नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुईं ।
धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ ।
लोहा बजा धर्म पर, सभ्यता के नाम पर ।
ख़ून की नदी बही ।
आँख-कान मूंदकर जनता ने डुबकियाँ लीं ।
आँख खुली– राजे ने अपनी रखवाली की ।
 
Ashok Kumar Pandey कबीर भी धार्मिक थे. उन्होंने भी 'राम मोरे पिऊ मैं राम की बहुरिया' लिखा है. मैं तो डरता हूँ कि कल कोई 'विद्वान' उन पर समलैंगिकता का आरोप न लगा दे.
 
Virendra Yadav निराला को दलित विरोधी कहना ब्राह्मणवाद की जड़े सींचना है . निराला ने चतुरी चमार के बारे में लिखा है," वह एक ऐसे जाल में फंसा है ,जिसे वह काटना चाहता है ,भीतर से उसका पूरा जोर उमड़ रहा है ,पर एक कमजोरी है जिसमें वह बार-बार उलझकर रह जाता है …चमार दबेंगें और ब्राह्मण दबायेंगें .दवा है कि दोनों की जड़ें मार दी जाएँ ."
 
Rakesh Derhgawen This is the fall out of intolerant 'democratic' tenets developing in our country. Being iconoclast is the biggest fashion today.
 
Asang Ghosh निराला ने चतुरी चमार लिख कर अपने ब्राम्‍णत्‍व को प्रखर किया यह रचना दलित विरोधी है…
 
Ashok Kumar Pandey मैं चाहूंगा उस पर विस्तार से लिखा जाय. और फिर बहस हो.
 
Ashok Shandilaya तुल्सी,कबीर .गलिब,भर्तेन्दु सभी रच्नाकरोन की अपनी सीमा है,मुख्य बात ये है की कौन अप्नी सीमा से ज्यादा टक्रराता है ,और उस्का अतिक्रमन कर्ता है ,
 
Mahendra K. Singh जब देश के अन्य भाषाओँ के लेखक एक जाति-विहीन और -धर्म निरपेक्ष देश की परिकल्पना में व्यस्त थे तब हिंदी के लेखक हिन्दू राष्ट्रवाद के नायक राम की (यह कबीर के निर्गुण राम तो एकदम नहीं हैं, नीचे चित्रण देखें) की उपासना में व्यस्त थे, अद्भुत और कालजयी चित्रण है राम का:

ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर।

"होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।"
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

बचपन में एक धर्मभीरु सज्जन को देखता था वे प्रातःकाल रामसहस्त्रनामोशताष्टकम के बाद राम की शक्तिपूजा का पाठ भी करते थे। अब कितने लोग सुबह सवेरे कुकुरमुत्ता का पाठ करते हैं, स्वाभाविक है कि निराला जी का ओजपूर्ण/हिंदुत्वपूर्ण काव्य उनकी गिनी चुनी समाजवादी कविताओं पर भारी पड़ता है। और कहना न होगा कि वही उनकी legacy भी है …!!
 
Virendra Yadav बात ऐसे नहीं की जा सकती . अब लीजिये यह भी निराला की कविता है -'संत कवि रविदास जी के प्रति '. कविता की पंक्तियाँ :"ज्ञान के आकर मुनीश्वर थे परम \ धर्म के ध्वज ,हुए उनमें अन्यतम \पूज्य अग्रज भक्त कवियों के \प्रखर कल्पना की किरण नीरज पर सुघर \पडी ज्यों अंगडायियाँ लेकर खड़ी\…….रानियाँ अवरोध की घेरी हुईं \वाणियाँ ज्यों बनी जब चेरी हुईं \छुआ पारस भी नहीं तुमने ,रहे\कर्म के अभ्यास में ,अविरत बहे \ज्ञान गंगा में ,सम्मुज्जल चर्मकार \चरण छूकर कर रहा मैं नमस्कार ."………अगर सचमुच निराला दलित विरोधी होते तो कम से कम यह कविता तो न ही लिखते .
 
Rakesh Derhgawen How is Ram a 'Hindu Rastravaad ke Nayak'? I don't know much, but before the Jansangh or the BJP happened, Ram was the lord and hero of a society, that per chance happened to be Hindu. Writing on Ram does not make Nirala a religious poet. Being a casteist is one thing, writing on or about caste is quite another. Same applies to Ram and Nirala.
 
Atul Singh संकर जी को विदवान बनने की जलदी है शायद
 
Virendra Yadav Atul Singh आजकल वाम विरोध लाभ का धंधा है .लोग जिसकी खा रहे हैं उसकी बजा रहे हैं .

चिंतक और आलोचक वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

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