क्या फारवर्ड प्रेस मैग्जीन में लड़कियों और पत्रकारों का शोषण होता है?

Wasim Akram Tyagi : हमारे एक सहपाठी और खांटी संघ परस्त मित्र हैं Jitendra Kumar Jyoti. शॉट फोर्म में हम उन्हें जेजे बुलाते हैं. फॉरवर्ड प्रेस मासिक पत्रिका में काम करते थे. बकौल जितेन्द्र ज्योति, उन्हें केवल इसलिये नौकरी से हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने मीडिया द्वारा किये जा रहे लड़कियों और नौजवान पत्रकारों के शोषण के खिलाफ आवज उठाई थी. उन्होंने स्टाफ पर कई गंभीर आरोप भी लगाये थे जिसकी कीमत उन्हें इस्तीफा देकर चुकानी पड़ी.

जेजे कह रहे थे कि मीडिया रोज कोई ना कोई घोटाला, घूस खोरी, बलात्कार, उत्पीड़न की खबरें छापता है. मगर खुद जो भ्रष्ट और बुराईयों के समुद्र में डूबा पड़ा है, उन खबरों को कौन छापेगा. उनका यह कहना काफी हद तक सही है कि मीडिया पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली बन चुका है. बंग्लादेश में इमारत के गिरने से मरने वालों की संख्या 200 के पार पहुंच चुकी है लेकिन अखबारों ने इसे एक कोने में जगह दी है जबकि अमेरिका के बॉस्टन में हुऐ बम धमाके की कवरेज से अखबारों के पन्ने भरे पड़े थे और टीवी चैनल भी लगातार कई दिन तक चीख रहे थे लेकिन पड़ोस के हादसे की खबर किसी चैनल पर नजर नहीं आ रही है. लगता है कि दुष्यंत ने शायद यह शेर इसी दिन के लिये कहा था…

सुर्खियों में झूठ ने पायी जगह
बदचलन अदबी रिसाले हो गये

युवा पत्रकार वसीम अकरम त्यागी के फेसबुक वॉल से.

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