क्या हिंदी की चेतना पर एक पुलिसिया तिकड़मबाज अपने पूरे शवाब के साथ छा जायेगा!

हिंदी के प्रबुद्ध जनों के नाम एक खुला खत…

सेवा में जिससे सम्बंधित है :

आज टाइम्स ऑफ इण्डिया इण्डिया में अक्षय मुकुल और कल देर शाम आज तक के वेब साईट पर संतोष कुमार की रपटों से (रपट के लिंक नीचे आखिर में दिए गए हैं) स्पष्ट है कि दारोगा कुलपति विभूति राय ने अपने दूसरे टर्म के लिए कैसे और किस हद तक एड़ी चोटी लगा रखी है. दिल्ली में दारोगा अपने हनुमान मनोज राय और अपने भांजे चोरगुरु के साथ पूरे शवाब पर हैं. अब शराब की मत पूछ लीजियेगा की किसको–किसको पिलाई जा रही है, अगले पांच साल तक के लिए अपनी गोटी सेट करने के लिए.

यह हिंदी के लोगों के लिए महान शर्म का विषय होगा कि अपने प्रतिनिधि विश्वविद्यालय को एक पुलिसिया कुलपति के लिए अपने चारागाह के तौर पर इस्तेमाल के लिए छोड़ दिया गया. एक तिकड़मी दारोगा क्या हिंदी की चेतना पर इस तरह हावी हो जायेगा. अब जरा सर्च कमिटी के भीतर क्या हुआ उसकी कहानी जान लें तो पता चले कि जनाब दारोगा जी ने क्या –क्या जाल नहीं फैलाया है. पहले तो सर्च कमिटी के लिए कपिला वात्स्यायन का नाम अपनी कार्यपरिषद से डलवाया और प्रीतम सिंह का भी. फिर अपने हर कुकर्म में शामिल निर्मला जैन से अपने लिए उन्हें मनाया.

बात को अपनी ओर और मजबूत करने के लिए १९ अगस्त को उनके भाई केशव मालिक को वर्धा बुलवाया और कपिला जी तथा केशव मालिक की माँ के नाम से कुछ पांडुलिपियाँ अपने आर्काइव में जमा करवाई. इस तरह कपिला जी का समर्थन पुख्ता किया. फिर जो होना था हुआ, कपिला जी विभूति राय का नाम राष्ट्रपति को भेजे जाने वाले पैनल में शामिल कराने के लिए अड़ गई. साथ मिला प्रीतम सिंह का, जो पहले से ही सेट थे.

सूत्र बताते हैं कि पांच लोगों में नाम डालने के लिए जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के नाम की भी चर्चा हुई कि कपिला जी ने कहा कि पहले से ही थानवी जी से उनकी बात हो चुकी है और उन्होंने अपनी पुरजोर अनिच्छा जाहिर की है कुलपति बनने के लिए, इसलिए उनका नाम पैनल में न डाला जाय. विभूति राय का नाम दुबारा न डालने के लिए अशोक जी के पास कई तर्क और तथ्य थे, लेकिन ‘आदरणीय’ कपिला जी के हठ का मान रखने के लिए उन्होंने नाम तो जाने दिया , लेकिन उनके नाम के आगे अपनी आपत्ति दर्ज करा दी.

राष्ट्रपति के द्वारा सर्च कमिटी का अंपायर नियुक्त होने के कारण उन्होंने अपनी आपत्ति एक अलग पत्र में भी मंत्रालय और राष्ट्रपति को भेज दी. अशोक जी ने अपनी भूमिका निभा दी है, जो कि ऐतिहासिक भूमिका है.  राष्ट्रपति, उनकी सचिव अनीता पाल, मंत्रालय के अधिकारियों और मंत्री को भी और भी पत्र भेजे जा चुके हैं, जिनमें विभूति के कारनामे बताये गए हैं और बताया गया है कि ८ अक्तूबर को नागपुर उच्च नयायालय के द्वारा ‘फर्जी मायग्रेशन’ प्रकरण में विभूति और उनके अधिकारियों के खिलाफ सी बी आई जांच के लिए सरकार की राय मांगी गई है. विभूति पर इस प्रकरण में वर्धा के एक कोर्ट ने मुकदमा का आदेश दे रखा है, जिसे पुलिसिया रिश्ते से वे टैकल कर रहे हैं.

विभूति ने महिलाओं का अपमान किया है. विभूति ने दलितों –आदिवासियों का उत्पीडन किया है और हर प्रकार के भ्रष्ट –आचरण से वि वि को अभ्यस्त करा दिया है. अब विभूति राय यदि कुलपति बनाए जाते हैं, तो विवाद –प्रिय यू पी ए की सरकार का हिंदी के प्रति नकारात्मक रवैया ही इसका कारण होगा. इस विश्वविद्यालय को पूरी तरह नौकरशाहों के हाथ में छोड़ दिया गया है. नौकरशाह विभूति के खिलाफ विजिलेंस जांच को कुंद कर चुके हैं. जब पल्लम राजू मंत्री बने थे, तो हम लोगों का एक डेलीगेशन उनसे मिला था, वे इस
वि वि को जानते तक नहीं थे, यानी मंत्रियों ने इस विश्वविद्यालय को नौकरशाहों के खेल के लिए छोड़ दिया है, उस मुलाकात का कोई खास फर्क नहीं पड़ा.

दूसरी बार डेलीगेशन गया तो मंत्रालय के नौकरशाहों के खिलाफ अपनी बात कही. मंत्रालय की भूमिका शुरू से ही संदेहास्पद रही है. ‘विपिन चन्द्र कमिटी’ रिपोर्ट को ठंढे बस्ते में डाला गया और कई विवादों की फ़ाइल बिना निपटारे के छोड़ दिया गया है. यह सब जांच का विषय है. लेकिन फिलहाल हिंदी समाज के लिए चिंता का विषय है कि क्या हिंदी की चेतना पर एक पुलिसिया तिकड़मवाज अपने पूरे शवाब के साथ छा जायेगा .

हिंदी वि वि बचाओ संगठन की ओर से
संजीव चन्दन
राजीव सुमन


संबंधित लिंक…
http://timesofindia.indiatimes.com/home/education/news/Row-over-fresh-term-for-Hindi-varsity-VC/articleshow/24003573.cms?

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http://aajtak.intoday.in/story/lobbying-for-vc-post-of-mahatma-gandhi-antarrashtriya-hindi-vishwavidyalaya-1-744285.html?fb_action_ids=557204857668599&fb_action_types=og.recommends&fb_source=aggregation&fb_aggregation_id=288381481237582

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