क्‍या टैम के पक्ष में लिखी गई यह खबर पेड न्‍यूज है?

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने टैम मीडिया रिसर्च से उसके तंत्र की जांच रिपोर्ट जमा कराने के लिए कहा है। आयोग ने यह फैसला वर्ष 2012 में प्रसार भारती की उस शिकायत के बाद दिया, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि टैम अपने दबदबे का गलत इस्तेमाल कर रहा है और टीवी के दर्शक तय करने में गलत कारोबारी व्यवहार अपना रहा है। कुछ दिन पहले आई मीडिया रिपोर्ट में टैम के मुख्य कार्याधिकारी एल वी कृष्णन ने कहा था कि कंपनी का आयोग के आदेश के साथ सहयोगात्मक रवैया रहेगा और वह अपनी रिपोर्ट जमा करेगी।

कृष्णन ने तो यहां तक कहा कि टैम को ग्रामीण बाजारों तक जाने में भी कोई गुरेज नहीं है, जैसा कि दूरदर्शन चाहता है लेकिन इस प्रक्रिया के लिए किसी को उसे वित्तीय मदद देनी पड़ेगी। पिछले साल एनडीटीवी ने टैम के आंकड़ों में गड़बड़झाले का आरोप लगाते हुए उसके खिलाफ न्यूयॉर्क में याचिका दायर की थी। लेकिन यहां हम न तो टैम के बारे में बात कर रहे हैं न एनडीटीवी और न ही रेटिंग के बारे में। यह हमारी मीडिया नीति और हमारी प्राथमिकताओं के बारे में है।

पिछले पांच साल के दौरान भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा दी गई रेटिंग पर महज तीन खबरें या रिपोर्ट आई हैं। इनमें से ज्यादातर का एक ही नतीजा रहा कि रेटिंग के साथ कुछ समस्या है। 74 करोड़ की आबादी वाले बाजार में महज 35,000 भारतीयों का नमूना रखना बहुत न्यायसंगत नहीं है। इसके अलावा रेटिंग आकलन की प्रक्रिया में भी समस्या है और टैम भी यह बात स्वीकार करती है। टैम अपने नमूने का आकार बढ़ाने के लिए तैयार है लेकिन इसकी कीमत काफी ज्यादा करीब 50 करोड़ रुपये के करीब आने का अनुमान है। ट्राई की एक रिपोर्ट के अनुसार 1,08,000 लोगों को कवर करने की लागत करीब 660 करोड़ रुपये आने का अनुमान है लेकिन कोई भी इतनी रकम नहीं लगाना चाहता।

टैम का वर्चस्व आभासी है न कि वास्तविक। बाजार उन सभी के लिए खुला हुआ है, जो आकार के हिसाब से रेटिंग सेवाएं उपलब्ध कराना चाहते हैं। इस बाजार में कदम रखने वाली एक कंपनी एमैप ने अपनी सेवाएं बंद भी कर दी हैं। इसकी वजह टेलीविजन जगत की निष्क्रियता है। अब टैम ही इस क्षेत्र में इकलौती कंपनी रह गई है। लेकिन उद्योग को यह बात समझ भी आ गई है। ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बीएआरसी) ने आखिरकार इसके विकल्प पर काम शुरू किया है। बीएआरसी के वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो एक या दो साल में नए आंकड़े मिल सकते हैं।

दरअसल बात यह है कि 37,000 करोड़ रुपये के सालाना कारोबार वाले टेलीविजन उद्योग पर निजी कंपनियों का दबदबा है। इसलिए अगर उन्हें टैम से कोई समस्या है तो उन्हें अपने आप ही निपटने दीजिए। प्रसार भारती का परिचालन करने वाले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को यह शोभा नहीं देता कि वह टैम की रेटिंग पर कुछ भी कहे या उसकी आलोचना करे। अखबारों की पाठक संख्या और बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों की ही तरह यह भी उद्योग आधारित है। अखबारों की पाठक संख्या के आंकड़े और बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों में भी कई बार समस्याएं हुई हैं लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने उन पर कभी टिप्पणी नहीं की। इसलिए रेटिंग को लेकर मंत्रालय इतना परेशान क्यों है- वह भी एक बार नहीं बल्कि बार बार? सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास करने के लिए मीडिया, पेड न्यूज, मनोरंजन कर को तर्कसंगत बनाने, डायरेक्ट-टू-होम ऑपरेटरों के लिए सैटेलाइट नीति आसान बनाने जैसे अन्य दर्जन भर काम हैं जो वह कर सकता है और वह इस उद्योग को ज्यादा राजस्व कमाने, कर चुकाने और रोजगार सृजन में मदद कर सकता है। इन मुद्दों को भी उतनी सक्षमता के साथ क्यों नहीं निपटाया जाता, जैसे उसने डिजिटलीकरण के मसले को निपटाया है।

जहां तक दूरदर्शन की बात है तो कई मायनों में उसके पास क्षेत्रीय प्रसारकों के ऊपर कानूनी एकाधिकार है। अपने इस रूतबे का इस्तेमाल कर दूरदर्शन अपनी खबर सामग्री के स्तर को सुधार सकता है और इसे बीबीसी के स्तर तक ला सकता है। केबल अधिनियम के तहत दूरदर्शन चैनलों को प्राइम बैंड पर रखना अनिवार्य है। दूरदर्शन किसी भी निजी चैनल से किसी भी खेल या अन्य आयोजन के लिए 'देश हित' में अपनी सुविधानुसार फीड भी ले सकता है। यह अलग बात है कि अभी तक यह देश हित क्रिकेट से आगे नहीं निकल पाया है। 1000 से ज्यादा टावर के साथ इसके पास देश में सबसे बेहतरीन ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचा है। सरकार की रिपोर्ट पर नजर डालें तो 2011-12 में दूरदर्शन का राजस्व 1,409 करोड़ रुपये रहा जबकि इसके खर्च 2,890 करोड़ रुपये से ज्यादा रहे। यानी दूरदर्शन और आकाशवाणी का संचालन करने वाली  इस 'स्वायत्त' संस्था प्रसार भारती को जीवित रखने के लिए करदाताओं को हर साल 1,500 करोड़ रुपये से 1,800 करोड़ रुपये अपनी जेब से भरने पड़ते हैं। अगर दूरदर्शन को दी जाने वाली वित्तीय और कानूनी तवज्जो किसी निजी प्रसारणकर्ता को दी जाती तो टैम या बिना टैम ही वह भारी भरकम मुनाफा कमा रहा होता।

लेकिन यही बात अहम है कि दूरदर्शन का काम पैसा बनाना नहीं है। इसका काम एक सार्वजनिक सेवा प्रसारक बने रहना है। मैं एक बार फिर अपनी बात दोहराना चाहूंगी कि बीबीसी भी करदाताओं की मेहनत की कमाई को बड़े पैमाने पर खर्च करता है लेकिन यह वैश्विक स्तर पर सम्मानित प्रसारक है। इसने ब्रिटेन के निजी प्रसारकों को उच्च स्तर बरकरार रखने के लिए मजबूर किया है। ऐसे समय में जब भारत में खबरों की गुणवत्ता का स्तर लगातार गिर रहा है तो ऐसा खबर प्रसारक, जिसके पास राजस्व नहीं है या दर्शकों की संख्या बढ़ाने का दबाव नहीं है, जैसा कि निजी चैनलों पर होता है, काफी कुछ कर सकता है। अगर दूरदर्शन अपना स्तर बढ़ाए और दर्शक जोड़ ले तो यह सार्वजनिक सेवा प्रसारक के तौर पर अपना कर्तव्य काफी हद तक निभा चुका होगा। करदाता व दर्शक के तौर पर हमें भी ऐसा होने से खुशी होगी। तो क्या ऐसे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय टैम को सुधारने की कोशिश करने के बजाय दूरदर्शन को बेहतर बनाने पर ध्यान देना शुरू करेगा?

बिजनेस स्‍टैंडर्ड के लिए लिखी गई वनिता कोहली-खंडेकर की रिपोर्ट.

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