क्‍या सच सामने आने के डर से टैम से दूर भाग रहे हैं चैनल?

यह आप पर निर्भर करता है कि भारतीय मीडिया और मनोरंजन (एमऐंडई) कारोबार में छाई निराशा, असंतुष्टि और बेचैनी के बीच आप सबसे पहले किन चीजों पर गौर करेंगे। आप इन बदले हालात पर हंस सकते हैं, चीख सकते हैं, घबरा सकते हैं या नजर फेर भी सकते हैं। बड़े पैमाने पर कई टेलीविजन प्रसारणकर्ताओं ने एक साथ टेलीविजन दर्शकों की रेटिंग मापने वाली एजेंसी टैम की सेवाएं लेनी बंद कर दी जो बेहद हास्यास्पद सी बात लगती है।

ये वही कंपनियां है जिन्हें कई सालों तक टैम मीडिया रिसर्च के टेलीविजन रेटिंग मापने के नमूने से कोई एतराज नहीं था। अब जब टैम ने रेटिंग मापने के लिए अपने नमूने के आकार में बढ़ोतरी की है तो कई नेटवर्क अपनी कम पहुंच और रेटिंग के आंकड़ों को देखकर हैरान हो रहे हैं। टैम ने अपने नमूने के दायरे में 100,000 के कम आबादी वाले शहरों को भी शामिल किया है।

इन चैनलों के हैरान होने की वजह यह थी कि उनके वितरण की रणनीति का पूरा जोर टैम वाले शहरों तक ही सीमित था। भारत के छोटे शहरों के लिए तैयार कराए गए कार्यक्रमों में निवेश करने चंद प्रसारणकर्ताओं को छोड़कर लगभग सभी चैनल टैम के मेट्रो शहर पर केंद्रित नमूने से मिले शानदार आंकड़े से काफी खुश थे। जब टैम ने दर्शकों के एक बड़े वर्ग को नमूने के तौर पर लेना शुरू किया तो उनकी संख्या में गिरावट आई।

इन चैनलों के लिए 12 मिनट वाले विज्ञापन नियम ने आग में घी डालने का काम किया और वे ज्यादा दबाव महसूस करने लगे हैं। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने यह आदेश दिया है कि चैनलों को अपने विज्ञापन समय में कटौती करनी होगी और एक घंटे के कार्यक्रम में 15-25 मिनट के विज्ञापन के बजाय इसका समय 12 मिनट तक ही सीमित होना चाहिए।

विश्लेषकों का कहना है कि नतीजतन इससे दरों में 20 से 30 फीसदी की तेजी आएगी खासतौर पर बड़े नेटवर्कों के लिए यह रुझान लाजिमी होगा। प्रमुख पांच नेटवर्कों का स्टार, सोनी, सन, जी और नेटवर्क 18 का दबदबा टेलीविजन देखने में बिताए गए कुल वक्त में सबसे ज्यादा है और इन चैनलों की 65 फीसदी से भी ज्यादा की हिस्सेदारी है। इनमें से हरेक चैनल का नेटवर्क 10 से 35 चैनलों के बीच है। अगर टैम के आंकड़े किसी चैनल की कम पहुंच और रेटिंग को दर्शा रहे हैं तो ऐसे में दरों में इजाफा मुश्किल ही होगा। यह वजह है कि सभी बड़ी हड़बड़ी से टैम की सेवाएं लेना समाप्त कर रहे हैं। हालांकि विज्ञापनदाता अब भी यह कह रहे हैं कि जब तक ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च कौंसिल के आंकड़े नहीं आने शुरू होते तब तक टैम के आंकड़े पर ही रणनीति बनानी होगी।

दूसरी चीज जिस पर हम गौर करेंगे कि जो मीडिया व विज्ञापन प्रकाशन और वेबसाइटें टैम के आंकड़े लेती हैं उन पर रोक लगने की कोशिश हो सकती है। इस साल की शुरुआत में टैम ने चैनल या नेटवर्क संबंधित आंकड़ों को संवाददाताओं से साझा करना बंद कर दिया क्योंकि इसके मुख्य ग्राहक प्रसारणकर्ताओं को यह बात पसंद नहीं आ रही थी।

मिसाल के तौर पर अगर मुझे यह विश्लेषण करना है कि पांच नेटवर्कों का प्रदर्शन दर्शकों की हिस्सेदारी के लिहाज से कैसा है तो मुझे किसी एक नेटवर्क से यह गुजारिश करनी होगी कि वह अपने आंकड़े को साझा करे। हालांकि हमारे पास इन आंकड़ों की प्रामाणिकता की जांच का भी कोई तरीका नहीं होगा। टीवी प्रसारणकर्ताओं का इस तरह का अतार्किक और बचकाना बरताव बेहद हास्यास्पद है।

नेटवर्क 18 ने फोब्र्स इंडिया के चार वरिष्ठ संपादकों को बड़े निंदनीय तरीके से निकाला गया जो अपने आप में एक मिसाल है। संपादकों का दावा है कि उन्होंने स्टॉक विकल्प की मांग की थी जिसकी वजह से उन्हें निकाल दिया गया था।

नेटवर्क 18 के अधिकारियों ने न्यूजरूम में ही सारे मामले को सुलटाने की कोशिश की। हालांकि वजह जो भी रही हो इससे आपको अंदाजा जरूर मिल सकता है कि क्यों बेहतर कंटेंट भारतीय समाचारपत्रों और चैनलों से गायब हो रहे हैं। किसी भी बेहतर कंटेंट को तैयार करने के लिए जितने समय और संसाधनों की जरूरत होती है उसके लिए ज्यादातर चैनल और अखबार के प्रकाशक तैयार भी नहीं होते। अखबारों और टीवी कंपनियों में प्रशिक्षण, सुझाव देना, संपादकों को विश्व स्तर की एक टीम तैयार करने की छूट देना भी ज्यादा समय बर्बाद होने और लागत बढ़ाने के तौर पर देखा जाता है।

अब हम मीडिया नीति की प्राथमिकताओं पर गौर करते हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने पिछले कुछ सालों में टैम की रेटिंग की निगरानी करने के लिए तीन अलग-अलग समितियां नियुक्त कीं। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग इस पर ध्यान नहीं दे रहा है। किसी बॉक्स ऑफिस की कमाई या अखबार के सर्कुलेशन की तरह ही रेटिंग से सरकार का कोई लेना देना नहीं है। सरकार का संबंध मीडिया नीति और प्रसार भारती से ही है। अहम सवाल यह है कि आखिर करदाताओं की 1500-1800 करोड़ रुपये की पूंजी अगर सरकारी चैनल दूरदर्शन पर खर्च की जाती है तो आखिर इसे बीबीसी की तरह ही विश्वस्तरीय चैनल क्यों नहीं बनाया जा सकता?

वित्त मंत्रालय देश भर में मनोरंजन कर को बराबर क्यों नहीं करती? इसके अलावा भी कुछ सवाल हैं कि फिल्म थियेटर की इमारत को इन्फ्रास्ट्रक्चर का दर्जा क्यों दिया जाता है या कंसर्ट की कमाई के बारे में सरकार का क्या नजरिया है? इससे उन्हें देश के बड़े-छोटे शहरों में निर्माण करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।

आखिर मीडिया पर राजनीतिक स्वामित्व के बढ़ते वर्चस्व या पेड न्यूज की समस्या को खत्म करने के लिए कोई कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? मंत्रालय यह चाहता है कि 12 मिनट वाले विज्ञापन के नियमों को लागू करने से पहले देशभर में डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाए और इसके लिए पूरा दबाव भी दिया जा रहा है। ऐसे में कई छोटे स्वतंत्र चैनलों और नेटवर्क का अस्तित्व खत्म होने का खतरा है। मौजूदा ड्रामा को देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता है कि मीडिया और मनोरंजन उद्योग शेक्सपियर के दुखांत नाटक का प्रतिनिधित्व कर रहा है। (बीएस)

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