खंडित होता हमारा लोकतंत्र

: 26 जून को इमरजेंसी पर विशेष : 26 जून 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल लागू किया गया था। उसके 38 साल बीत गये। तब से गंगा व गोमती में बहुत पानी बह चुका है। देश और दुनिया में बड़े बदलाव आये हैं। पर आज जब भी भारतीय लोकतंत्र की चर्चा होती है इमरजेंसी के दौर को काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है।

1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्‍ता में आईं। आते ही मीसा जैसा कानून बनाया जिसका उद्देश्य ही राजनीतिक विरोध का दमन करना था। इंदिरा गांधी कंग्रेस का पर्याय बनकर ही नहीं उभरी बल्कि ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’ के नारे के तहत वे देश का पर्याय बना दी गई। इसकी परिणति 26 जून 1975 को देश के ऊपर इमरजेंसी लगाने की घोषणा के रूप में हुई।

इमरजेंसी के दौरान अनेक राजनीतिक संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संगठन बनाने के अधिकार को छीन लिया गया। प्रेस की आजादी समाप्त कर दी गई। सरकार विरोधी विचारधारा रखने वाले असंख्य लोगों को बिना मुकदमा चलाए जेलों में डाल दिया गया। संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत सभी मौलिक अधिकारों को रद्द कर दिया गया। मीसा और डी आई आर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। करीब 34,630 लोगों को मीसा के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया। मीसा के आपातकालीन प्रवधानों के तहत सरकार को यह विशेषाधिकार प्राप्त था कि वह बिना कारण बताए अपने राजनीतिक विरोधियों को हिरासत में रख सकती थीं। इमरजेंसी के दौरान हजारों लोगों को डी आई आर में नजरबंद किया गया।

इमरजेंसी कोई अकेली घटना नहीं है जिसने हमारे लोकतंत्र को लहुलूहान किया है। ऐसी बहुत सी घटनाएं इस आजाद भारत में हुई हैं जिनमें हम इमरजेंसी की छवियां देख सकते हैं। आज भी हमारी सरकार के पास ऐसे दमनकारी कानूनों का पूरा तोपखाना है जहां से जनता की स्वतंत्रता और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों पर गोलाबारी की जाती है, विरोध की आवाज को दबा दिया जाता है। यह देश के अन्दर अघोषित तौर पर इमरजेंसी की हालत है। इन्हें काले कानूनों के रूप में जाना जाता है। ये कानून अंग्रेजों के द्वारा बनाये गये रोलट एक्ट जैसे कानून की याद दिलाते हैं। आज भी देश के बड़े हिस्से में विशेष सशस्त्र बल कानून (आफ्सपा) लागू है। यह कानून हमें न सिर्फ इमरजेंसी के दौर की याद को ताजा करता हैं बल्कि भारतीय संविधान और लोकतंत्र के खण्डित चेहरे से भीं रू ब रू कराता है।

हमारी संसद ने नये नये दमनकारी कानून बनाये हैं या पहले के कानूनों में यह तर्क देते हुए संशोधन किये हैं कि चूंकि परिस्थितियां असामान्य हो चुकी हैं और इन आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए मौजूदा कानून अपर्याप्त हैं, ऐसे में स्थितियों को नियंत्रित करने, उन्हें सामान्य व शंतिपूर्ण बनाने के लिए सुरक्षाबलों को असाधारण कानूनों के कवर की जरूरत है। इन कानूनों को बनाने के पीछे जो बड़ा कारण सरकार की ओर से दिया गया है, वह है देश के अन्दर बढ़ रही आतंकवादी व माओवादी गतिविधियां हैं। ये राष्ट्रीय अखण्डता व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। वैसे इस संबंध में सरकार की नीतियों व दृष्टिकोण पर अलग से विचार की जरूरत है फिर भी तथ्य यही बताते हैं कि इन कानूनों से आतंकवादी व माओवादी गतिविधियां तो नियंत्रित नहीं हुई, बेशक इन कानूनों के माध्यम से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, लोकतांत्रिक आंदोलनों व संगठनों को दमन का शिकार बनाया गया। चाहे विनायक सेन हो या सीमा आजाद या अभी हाल में कबीर कला मंच के कलाकार शतल साठे व सचिन माली ऐसे ही कानूनों के शिकार बनाये गये।

सच्चाई यह है कि भारतीय राज्य सुरक्षाबलों को ऐसे कानूनी अधिकारों से लैस कर दिया है ताकि वे बे रोक टोक कार्रवाई कर सके और उनके अमानवीय कृत्य के लिए उनके विरूद्ध कोई कार्रवाई न हो सके। ‘आफ्सपा’ के प्रावधानों के तहत सेना व अर्द्धसैनिक बलों को ऐसा ही विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके अन्तर्गत वह सन्देह के आधार पर बगैर वारण्ट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकता है, किसी को गिरफ्तार कर सकता है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकता है। यही नहीं, यह कानून सशस्त्र बलों को किसी भी दण्डात्मक कार्रवाई से बचाता है जब तक कि केन्द्र सरकार उसके लिए मंजूरी न दे। देखा गया है कि जिन राज्यों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहाँ नागरिक प्रशासन दूसरे पायदान पर पहुँच गया है तथा सरकारों का सेना व अर्द्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ी है। इन राज्यों में लोकतंत्र सीमित हुआ है, जन आन्दोलनों को दमन का सामना करना पड़ा है तथा सामान्य विरोध को भी विद्रोह के रूप में देखा गया है।

गौरतलब है कि जिन समस्याओं से निबटने के लिए सरकार द्वारा ‘आफ्सपा’ लागू किया गया, देखने मे यही आया है कि उन राज्यों में इससे समस्याएँ तो हल नहीं हुई, बेशक उनका विस्तार जरूर हुआ है। पूर्वोतर राज्यों से लेकर कश्मीर, जहाँ यह कानून पिछले कई दशकों से लागू है, की कहानी यही सच्चाई बयान कर रही है। 1956 में नगा विद्रोहियों से निबटने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा पहली बार सेना भेजी गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने संसद में बयान दिया था कि सेना का इस्तेमाल अस्थाई है तथा छ महीने के अन्दर सेना वहाँ से वापस बुला ली जायेगी। पर वास्तविकता इसके ठीक उलट है। सेना समूचे पूर्वोत्‍तर भारत के चप्पे.चप्पे में पहुँच गई। 1958 में ‘आफ्सपा’ लागू हुआ और 1972 में पूरे पूर्वोत्‍तर राज्यों में इसका विस्तार कर दिया गया। 1990 में जम्मू और कश्मीर भी इस कानून के दायरे में आ गया। आज हालत यह है कि देश के छठे या 16 प्रतिशत हिस्से में यह कानून लागू है।

लोकतांत्रिक और मानवाधिकार संगठनों ने जो तथ्य पेश किये हैं, उनके अनुसार जिन प्रदेशों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहाँ लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ है, राज्य का चरित्र ज्यादा दमनकारी होता गया है, जनता का सरकार और व्यवस्था से अलगाव बढ़ा है तथा लोगों में विरोध व स्वतंत्रता की चेतना ने आकार लिया है। इरोम शर्मिला इसी चेतना की मुखर अभिव्यक्ति हैं जो ‘आफ्सपा’ को मणिपुर से हटाये जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं। इस साल 4 नवम्बर को उनकी भूख हड़ताल के तेरह साल पूरे हो जायेंगे। जनरोष व आक्रोश की इससे बड़ी अभिव्यक्ति क्या हो सकती है कि असम राइफल्स के जवानों द्वारा  थंगजम मनोरमा के साथ किये बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा था, उसमें लिखा था ‘भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो’।

हमारा देश कश्मीर से कन्याकुमार तथा कच्छ से कोहिमा तक एक है। देश संविधान से चलता है। हमारी राजनीतिक प्रणाली लोकतांत्रिक है। सवाल है कि इस सम्पूर्ण भूभाग में क्या हमारे लोकतंत्र का एक ही रूप मौजूद है ? जिन राज्यों या क्षेत्रों में ‘आफ्सपा’ लागू है क्या हमारा वही संविधान लागू होता है जो देश के अन्य हिस्सों में लागू है? डॉ0 अम्बेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के समक्ष कहा था कि भारतीय गणतंत्र के रूप में 26 जनवरी 1950 को हम अंतरविरोधों से भरपूर जिन्दगी में प्रवेश कर रहे हैं जहां हमारे पास राजनीतिक समानता व स्वतंत्रता होगी, वहीं आर्थिक व सामाजिक जीवन में यह हमारे लिए दुर्लभ रहेगा। डॉ0 अम्बेडकर की ये शंकाएं निर्मूल नहीं थीं। आर्थिक जीवन की कौन कहे, राजनीतिक समानता व स्वतंत्रता भी आजाद भारत में क्षतिग्रस्त होती रही है। भारतीय राज्य की संवेदनहीनता ही नहीं बल्कि उसका अपने लोक के साथ संवादहीनता भी बढ़ी है। डॉ0 अम्बेडकर ने संविधान को लेकर कुछ आशंकाएं जरूर जाहिर की थीं लेकिन कभी नहीं सोचा होगा कि गणतंत्र के बासठ-तिरसठ सालों में हमारा संविधान व लोकतंत्र इतना खण्डित होगा। हमारे लोकतंत्र व संविधान का चेहरा इतना दरक जाएगा।

लेखक कौशल किशोर सोशल एक्टिविस्‍ट हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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