नईदुनिया में दिल्ली एडिशन का आखिरी अंक 31 मार्च को प्रकाशित होगा. यह अखबार इसके बाद दैनिक जागरण प्रबंधन के हवाले हो जाएगा यह भी लगभग फाइनल हो चुका है. पर जिस बिल्डिंग में आलोक मेहता एंड कंपनी नईदुनिया के सहारे अपनी दुनिया चला रही है, उसमें चहल-पहल कम नहीं होगी. इस बिल्डिंग से नईदुनिया का अंत होगा तो एक नया अखबार नेशनल दुनिया इसमें जन्म लेगा. और इसे धरातल पर लाएंगे आलोक मेहता. पैसा और फाइनेंसर जैसी दिक्कतें तो आलोक मेहता को कभी नहीं रही हैं. अखबार भले ही भाड़ में जाए पर ये लोग कभी इससे प्रभावित नहीं हुए.
आलोक मेहता की गिनती ऐसे ही बड़े संपादकों या कांग्रेस के अघोषित प्रवक्ता के रूप में नहीं की जाती है, बल्कि इसके पीछे कारण भी है. चाहे कोई अखबार चले या बंद हो, उससे आलोक मेहता और उनके चेले-चपाटियों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. वे बेरोजगार नहीं होने वाले हैं. आलोक मेहता को लेकर पीछे भी कई खबरें आ रही थीं कि वे नवजीवन को जीवन दे सकते हैं या अपना अखबार निकाल सकते हैं. अब दूसरी वाली बात सच होती दिख रही है. अब खबर है कि वे नया अखबार नेशनल दुनिया लेकर आ रहे हैं. 28 को इस अखबार का वेरिफिकेशन भी आरएनआई से हो चुका है.
नेशनल दुनिया के मालिक खुद आलोक मेहता होंगे. और इस अखबार का टाइटिल कोड होगा DELHIN/27202. आरएनआई की तरफ से होने वाली लगभग सारी प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई हैं. सूत्र बताते हैं कि इस अखबार में पैसा ग्वालियर के शराब माफिया भदौरिया (जिसे कांग्रेस का नजदीकी माना जाता है), राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत और मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह लगा रहे हैं. यह अखबार एक तरह से कांग्रेस का मुख पत्र होगा. दोनों दिग्गज कांग्रेसियों अशोक गहलोत और दिग्विजय के निवेश करने के बारे में कहा जा रहा है कि ये दोनों नेता आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर एक भोंपू तैयार करना चाह रहे हैं.
सूत्रों ने बताया कि आलोक मेहता ने नईदुनिया के अपने साथियों की मीटिंग लेकर कह भी दिया है कि उन्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है. नईदुनिया बंद होने के बाद भी उनकी नौकरी नहीं जाएगी क्योंकि नईदुनिया से आगे उनको नेशनल दुनिया में काम करना है. बताया जा रहा है कि इस खबर के बाद बुझे-बुझे से रहने वाले नईदुनिया के कर्मचारियों में जोश लौट आया है. हालांकि निष्पक्ष पत्रकारिता के लिहाज से यह भले ही उतनी अच्छी खबर ना हो परन्तु पत्रकारों के लिहाज से यह खबर बढि़या हैं, कम से कम वे बेरोजगार होने से तो बच गए. भले ही उन्हें कांग्रेस के अघोषित मुखपत्र जैसे अखबार में ही काम क्यों ना करना पड़े.





