खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी विधेयक को लगे पंख

लंबी जद्दोजहद के बाद कांग्रेस की प्रमुख सोनिया गांधी की राजनीतिक महत्वाकांक्षी कार्य योजना को अपनी मंजिल मिल गई है। तमाम बाधाओं को पार करते हुए बहुचर्चित खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी विधेयक पर लोकसभा में मुहर लग गई। बहस के दौरान सोनिया गांधी ने यहां तक कह डाला कि पर्याप्त साधन हों या नहीं, लेकिन लोगों को भोजन का अधिकार हर हालत में देना ही होगा। मुख्य विपक्षी दल भाजपा के दिग्गज नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने बहस के दौरान कई तीखे कटाक्ष किए।

उन्होंने कह दिया कि यह मामला खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी का नहीं, बल्कि वोट बैंक सुरक्षा गारंटी का ज्यादा लगता है। क्योंकि, इसके पीछे की मंशा चुनावी अधिक है। चर्चा के दौरान सबसे हैरान करने वाला रुख तो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का रहा। उन्होंने इस विधेयक को लेकर खांटी विरोध के तेवर दिखा दिए। बोले कि इस विधेयक में किसानों के हितों की सुरक्षा की गारंटी का कोई प्रावधान नहीं किया गया। अच्छा रहता यदि सरकार यह विधेयक संसद में लाने के पहले इस पर मुख्यमंत्रियों से बात कर लेती।

मुलायम सिंह के विरोधी तेवरों से एक बात साफ हो गई है कि अब कांग्रेस और सपा के बीच राजनीतिक पटरी ज्यादा दिन साथ-साथ चलने वाली नहीं है। यह अलग बात है कि यूपीए सरकार को सपा का समर्थन जारी है। सच्चाई तो यह है कि मनमोहन सरकार सपा और बसपा के बाहरी समर्थन से ही अस्तित्व में है। क्योंकि, तकनीकी रूप से लोकसभा में सरकार अल्पमत में काफी पहले ही आ चुकी थी। राजनीतिक कयास थे कि लोकसभा के चुनाव में भी कांग्रेस नेतृत्व, सपा के साथ कोई न कोई समझदारी बनाने की रणनीति पर चलेगी। लेकिन, अब इसके आसार कम नजर आ रहे हैं। जिस तरह से लोकसभा में बहस के दौरान मुलायम सिंह ने खाद्यान्न विधेयक पर धुर-विरोधी तेवर अपनाए, उससे साफ है कि अब सपा और कांग्रेस के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में आर-पार का मुकाबला तय है।

बहस के दौरान भाजपा के दिग्गज नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने इस बात पर खास जोर दिया कि कांग्रेस नेतृत्व की नीयत इस विधेयक को लेकर ‘पवित्र’ नहीं कही जा सकती। ऐसे में इस कानून के लागू हो जाने से न कुपोषण दूर होगा और न ही भुखमरी का कोई स्थाई इलाज हो पाएगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को ठीक करने की कोई पहल नहीं की है। ऐसे में, कौन गारंटी लेगा कि बीमार पीडीएस व्यवस्था के चलते लोगों को भोजन की गारंटी हो जाएगी? उन्होंने कटाक्ष किया कि कांग्रेस के लोग इसके जरिए वोटों की गारंटी की मंशा रखते हैं। शायद, यह भी पूरी नहीं हो पाएगी। क्योंकि, पिछले साढ़े 4 सालों में इस सरकार ने इतने घोटाले करा दिए हैं कि लोग चुनाव में इसकी सजा इन्हें जरूर देने वाले हैं। ऐसे में, खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी का झुनझुना लोगों को भ्रमित नहीं कर सकता। उन्होंने यह सवाल भी किया कि यदि यह कानूनी प्रावधान इतना चमत्कारी था, तो सरकार साढ़े 4 साल तक क्यों सोती रही? ऐन चुनावी मौके पर उसे इसकी याद क्यों आई है?

जबकि, कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने अपने भाषण में इस बात पर खास जोर दिया कि इस कार्य योजना के लिए पूरे साधन हों या नहीं हों, लेकिन सरकार अपने संकल्प को पूरा जरूर करेगी। क्योंकि, जरूरतमंदों को भोजन का अधिकार अपरिहार्य है। ऐसे में, इसमें और देरी नहीं की जा सकती। कांग्रेस के तमाम नेता पहले ही कह चुके हैं कि खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी का प्रावधान एक क्रांतिकारी कदम साबित होने वाला है। इसके अमल में आते ही, राजनीति में एक बड़ा बदलाव आना तय है। यूपीए-1 में सरकार ने मनरेगा   कार्य योजना लागू की थी। इससे देश के गांवों की आर्थिक तस्वीर बदली है। दूर-दराज के इलाकों से मजदूरों का पलायन रुका है। इस अकेली योजना से गांव में आर्थिक मजबूती मिली है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश का दावा है कि मनरेगा से ही एक बड़े सामाजिक आर्थिक बदलाव की शुरुआत हो गई है।

वे कहते हैं कि विरोधियों के तमाम कुप्रचार के बाद भी जनता ने 2009 में यूपीए को फिर से सत्ता सौंपी थी। जाहिर है खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी कानून, ‘गेम चेंजर’ की भूमिका में आने वाला है। इसी के चलते भाजपा जैसे विरोधी दल इसमें तमाम बाधाएं डालने की कोशिशें करते आए हैं। इस प्रक्रिया में जनता ने भी यह अच्छी तरह समझ लिया है कि आम लोगों के हितों के खिलाफ कौन ताकतें काम कर रही हैं? कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद जगदंबिका पाल ने बहस के दौरान यह दावा किया कि इस विधेयक को लेकर विपक्षी दलों ने कुछ ऐसी आशंकाएं जाहिर की हैं, जिनका कोई ठोस आधार नहीं है।

उन्होंने यह बात स्वीकार की कि पीडीएस सिस्टम में कुछ कमजोरियां हैं। इनको ठीक करने की जरूरत है। लेकिन, इस मामले में राज्य सरकारों की बड़ी भूमिका है। ऐसे में, इस बात का कोई मतलब नहीं है कि पीडीएस सिस्टम को दुरस्त किए बगैर खाद्यान्न सुरक्षा का प्रावधान नहीं करना चाहिए। उन्होंने इस प्रकरण में अपनी पार्टी की प्रमुख सोनिया गांधी की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि उनके पक्के संकल्प के चलते ही तमाम बाधाओं को पार करते हुए यह विधेयक कानूनी की शक्ल लेने जा रहा है। जिस तरह से यूपीए के शासन में सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार जैसे ऐतिहासिक कानून आए हैं, उसी क्रम में यह नई कड़ी जुड़ने वाली है।

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने इस विधेयक के मुद्दे पर सरकार की खिंचाई करने वाले नेताओं के ऊपर कई कटाक्ष किए। उन्होंने खासतौर पर भाजपा नेताओं पर निशाने साधे। इस विधेयक को समर्थन देते हुए उन्होंने यही कहा कि इससे देश की 67 प्रतिशत आबादी को बेहद सस्ती दरों पर खाद्यान्न मिलने की गारंटी हो जाएगी। हर तरह से यह प्रावधान ऐतिहासिक बनने जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि सभी दल जनहित के ऐसे मुद्दों पर उदारता का परिचय दें। तृणमूल कांग्रेस के नेता कल्याण मुखर्जी ने सवाल उठाया कि इस विधेयक के प्रावधान से राज्य सरकारों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा, उसके लिए केंद्र ने क्षतिपूर्ति की व्यवस्था क्यों नहीं की? मुलायम सिंह यादव ने भी यही कहा कि जरूरी है कि यह विधेयक संसद में पास कराने की जल्दबाजी न की जाए। जब खाद्यन्न का वितरण पीडीएस के जरिए होना है, तो जरूरी है कि इसमें राज्य सरकारों की पूरी सहमति हो। इसके लिए केंद्र सरकार ने कोई पहल नहीं की। क्योंकि, इस मुद्दे पर उसकी नीयत चुनावी फायदे की रही है। ऐसे में सपा इसका सीधे तौर पर समर्थन नहीं कर सकती।

वामपंथी नेताओं ने भी इस बात पर ऐतराज दर्ज कराया कि सरकार ने राज्यों को बगैर विश्वास में लिए हुए यह कार्य योजना थोपने की कोशिश की है। इससे संघात्मक ढांचे को भी चोट पहुंच रही है। सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि जिस अंदाज में इस विधेयक को पास कराने की कोशिश हो रही है, उससे यही झलकता है कि सरकार की नीयत वोट गारंटी करने की ज्यादा है। उनका सवाल है कि चुनावी साल में ही यूपीए सरकार को भोजन गारंटी की याद क्यों आई है? येचुरी का मानना है कि इस तरह की पहल करके सरकार लोगों का ध्यान बांटना चाहती है। कोशिश की जा रही है कि लोगों को महंगाई और सरकार के घोटालों की ज्यादा याद न रहे। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं होने वाला। यूपीए सरकार को अपने साढ़े 4 साल के तमाम कारनामों की सजा चुनाव में मिलनी तय है। ऐसे में, खाद्यान्न का यह मुद्दा भी इस सरकार को चुनावी ‘डूब’ से बचाने नहीं जा रहा।

इस विधेयक पर लोकसभा में हुई बहस के दौरान कई राजनीतिक समीकरण बनते-बिगड़ते भी दिखाई पड़े। इस मुद्दे पर सपा और कांग्रेस के बीच दूरी बढ़ी है। इसको लेकर भाजपा के डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता खासे गदगद नजर आए। उन्होंने सदन के अंदर ही मुलायम सिंह को सलाह दी थी कि वे बात-बात पर मनमोहन सरकार का साथ देना छोड़ दें। वरना, राजनीतिक घाटे में रहेंगे। क्योंकि, इस सरकार के प्रति लोगों में बहुत गुस्सा है। इस सुझाव पर मुलायम सिंह मुस्कुराते हुए दिखाई पड़े। लंबे समय तक भाजपा से जुड़े रहे जदयू ने अब अपना अलग रास्ता ले लिया है। नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर जदयू ने एनडीए का साथ छोड़ दिया था। खाद्यान्न मुद्दे पर कल लोकसभा में जदयू, सरकार के समर्थन में आ खड़ा हुआ। इस पार्टी के प्रमुख शरद यादव ने इस मुद्दे पर खुलकर सरकार के विधेयक का गुणगान कर दिया। एक तरफ मुलायम सिंह ने विरोधी तेवर दिखाए, तो दूसरी तरफ बसपा प्रमुख मायावती ने इस विधेयक पर खुलकर सरकार का साथ दे दिया। इस तरह से विधेयक की चर्चा के दौरान कई नए राजनीतिक समीकरणों के नए फॉर्मूले भी बनते-बिगड़ते दिखाई पड़े। जदयू के नए तेवरों से साफ हो गया है कि बिहार की राजनीति में कांग्रेस को एक नया ‘साथी’ मिल सकता है। जबकि, यूपी की राजनीति में ‘हाथी’ भी उसके लिए बड़े काम का हो सकता है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *