खुदाई हो गई हो तो फसल बो दो, चिंता की कोई बात नहीं

: उन्नाव में एक हजार टन सोना प्रकरण सपना पीछे छूटा, विवाद आगे बढ़ा : आस्था और अंधविश्वास के बीच बेहद बारीक रेखा खिंची होती है। कई बार इसकी बारीकी राजा से रंक और सरकार से लेकर प्रजा तक नहीं समझ पाती है। कई मौकों पर जनता ही नहीं सरकारें तक आस्था के विश्वास में अंधविश्वास का साथ देते हुए दिख जाती है, जिसका फायदा चन्द्रा स्वामी से लेकर आशा राम बाबू जैसे तमाम कथित संत समय-समय पर उठाते रहते हैं। आस्था के नाम पर भोली-भाली जनता को साधू-संत ही नहीं ठगते हैं।

ठगों का लूट खसोट का धंधा भी अंधविश्वास के सहारे खूब फलता-फूलता है। अक्सर ही आस्था और अंधविश्वास के सामने वैज्ञानिक सोच और एतिहासिक दावों की प्रमाणिकता बेईमानी हो जाती है। अनजाने में ही सही कई बार मीडिया भी ऐसी धारणाओं को बल प्रदान काम करता है। चाहें करीब दो दशक पूर्व गणेश जी को दूध पिलाने की घटना रही हो या फिर ताजा मामला उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव से जुड़ा हो, जहां एक संत के सपने ने देश ही नहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। देश-विदेश का मीडिया एक हजार टन सोना देखने के लिये जंगलों में भटकने लगा। किसी ने इतिहास नही टटोला कि कैसे यहां एक हजार टन सोना मिल सकता है?

इसे हास्यास्पद ही कहा जायेगा कि एक तरफ जहां विज्ञान की कसौटी पर सपनों या फिर किसी की आत्मा से बातचीत को कोई मान्यता नहीं दी जाती है। वहीं पीएमओं से जारी पत्र के आधार पर पुरातत्व विभाग के अधिकारी जिला उन्नाव के डौडिया गांव में राजा राव रामबख्श सिंह के खंडहर हो गये किले की खुदाई करने पहुंच जाता है और तर्क यह दिया जाता है कि साधू के सपने के आधार पर नहीं हमने अपनी जांच के बाद यह पाया है कि यहां धातु जैसी कोई चीज हो सकती है। केन्द्र और राज्य सरकार के मंत्री संत शोभन सरकार के सपनों को साकार होने की कामना में उनके सामने दंडवत करने लगते हैं। सोने पर किसका कितना हक होगा, इस पर भी राज्य सरकार चर्चा शुरू कर देती है, जिस गॉव का नाम कल तक पूरे जिले ने नहीं सुना था, वह अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ जाता है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया अपने ओवी वैन के साथ घटना स्थल पर पहुंच जाते हैं। खुदाई की लाइव कवरेज होती है, जिलाधिकारी महोदय प्रेस को ब्रीफ करते हैं। सोना देखने की चाहत में लोगों का हुजूम जुट जाता है। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए  जिला प्रशासन को  धारा 144 लगानी पडत़ी है,  खुदाई के स्थल पर सीसी टीवी कैमरे और बैरिकेडिंग के जरिये सुरक्षित किया जाता है। पुलिस और पीएसी के जवान कथित सोने की हिफाजत के लिये मुश्तैदी के साथ डट जाते हैं। खुदाई स्थल पर खाने-पीने से लेकर सभी जरूरतों के सामान वाली दुकानें सज जाती है।

शोभन सरकार की बातों पर विश्वास करके पीएमओ खुदाई का आदेश देता है तो भाजपा के पीएम वेटिंग नरेन्द्र मोदी को खुदाई का उपहास उड़ाने के कुछ घंटों के भीतर ही संत शोभन सरकार से मॉफी मांगनी पड़ जाती है। मोदी उनकी तपस्या और त्याग को प्रणाम करने लगते हैं। बुद्धिजीवी पूरे घटनाक्रम पर बुद्ध बक्शे के सामने सिर पीटते रहते हैं। खुदाई की कवरेज के लिये इलेक्ट्रानिक मीडिया ने प्राइम टाइम एलाट कर देता है तो प्रिंट मीडिया के फस्ट पेज की खबर बन जाती है और खबरों को छोटा कर दिया गया। इस दरमयान, उत्तर प्रदेश सरकार को इस बात की चिंता नहीं रहती है कि आजमगढ़ मे जहरीली शराब से मरने वालों के परिवार के जख्मों पर मरहम लगाने के लिये जहरीली शराब के कारोबारियों पर फंदा कसा जाये, जिसमें करीब 45 लोग मौत के मुंह में चले गये थे। इसी तरह से मुजफ्फरनगर दंगों के बाद के हालातों पर से कुछ समय के लिये ही सही लोगों का ध्यान हट जाता है। सरकार की नाकामयाबी से ध्यान हटा कर लोग सोने के सपने देखने लगते हैं।  शोभन सरकार के सपनों की वकालत करने के लिये एक अन्य महात्मा ओमजी इलेक्ट्रानिक चैनलों पर प्रकट होते हैं। बाद मे पता चलता है कि वह पुराने कांग्रेसी थे और 1984 में इंदिरा जी की हत्या के बाद उन्होंने राजनीति से तौबा करके अपना जीवन धमार्थ कार्यो में लगा रखा था।

अच्छी बात यह है कि यह ड्रामा कुछ ही दिन चला। खुदाई के हफ्ते भर के भीतर ही एक हजार टन सोने की जिज्ञासा नेताओं/नौकरशाहों/सरकारों के दिलो-दिमाग से काफूर हो गई। खुदाई स्थल से मीडिया और अधिकारी नेता नदारत हो गये हैं। सोने की हकदारी जताते हुए सामने आये राजा बक्श के वारिसों का भी अब कोई अता-पता नहीं चल रहा है। बयान बहादुर अपना बयान पलटने लगे हैं। त्योहारी मौसम में कुछ कमा लेने की चाहत में दुकान सजा कर बैठ गये लोग ने भी ठिकाना बदल लिया है, लेकिन इस बात का जबाव देने वाला कोई नहीं है कि सारे घटनाक्रम में सरकारी पैसे की जो बर्बादी हुई, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।  बहरहाल, अभी भी संत के अनुयायी दावा कर रहे हैं कि शोभन सरकार चाहें तो अभी 20 हजार टन सोना और सरकार को दिला सकते हैं और सोना नहीं मिलने पर फांसी पर लटका देने का राग अलाप रहे हैं।

सोना मिले या न मिले, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि संत शोभन की नियत में जरा भी खोट थी। वह देश का भला चाहते थे, इसी लिये उन्होंने अपने स्थानीय सांसद अनु टंडन के माध्यम से केन्द्र तक अपनी बात पहुंचाई थी। उन्होंने सोने के लिये किसी तरह का दावा भी नहीं ठोंका था। बस, वह क्षेत्र का विकास होते देखना चाहते थे, लेकिन एक हजार टन सोने की खबर ने मेरे जहन में एक ठग की पुरानी यादें ताजा कर दी। कुछ दशकों पूर्व एक ठग ने सोने की आड़ में उत्तर प्रदेश प्रशासन को हिला कर रख दिया था। यह कारनामा करने वाला ठग था मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल, जिसके चरित्र पर कई फिल्में बन चुकी हैं। यह ठग तो यहां तक दावा करता था कि उसे अगर एक बार विदेश भेज दिया जाये तो वह ठगी के बल पर हिन्दुस्तान का पूरा कर्जा ही उतार देगा।

एक जमाने में जब नटवर लाल लखनऊ जेल में बंद था,  तो सिवान जिले में स्थित उसके गांव बंगारा से पत्नी का पत्र आया, जिसमें उसकी पत्नी ने अपनी व्यथा लिखते हुए कहा था, ‘मैं बड़े आर्थिक संकट में हूं, घर में खाने को नहीं है। खेत जोतने के लिए मजदूर भी तैयार नहीं है। कहीं से कुछ पैसे की व्यवस्था कराओ नहीं तो भूख से ही मर जाऊंगी।’ पत्र पढ़ते ही नटवर लाल बेचैन हो गया। तभी उसके शातिर दिमाग में एक आइडिया आया। नटवन ने अपनी पत्नी को जवाब पत्र लिखा, 'परेशान मत हो, किसी विश्वसनीय व्यक्ति से खेत के दक्षिणी कोने में एक डेढ़ फिट खुदवा लेना। वहां एक पोटली में मैंने कुछ जेवरात गाड़ रखे हैं, जिन्हें बेचकर घर चलाओ। जल्दी ही जेल से निकलूंगा। तब मिलूंगा।'

गौरतलब हो,  कैदियों द्वारा लिखकर भेजी जाने वाली जेल प्रशासन द्वारा चिट्ठियां सेंसर की जाती हैं। नटवरलाल की भी चिट्टी पढी गई। जेल अधिकारी सकते में आ गये। उन्होंने चिट्ठी दबा ली। तत्काल नटवर के गांव बंगारा की जानकारी के लिए बिहार के सिवान जिले के एसपी को लिखित जानकारी भेजी गई। नटवर लाल के खेत पर सिवान पुलिस ने धावा बोल दिया।  बताए गये स्थान पर खुदाई की गई। वहां कुछ न मिला तो पूरा खेत खोद डाला गया। खेत में न रूपये मिले न जेवरात। अधिकारी सिर खुजाने लगे। नटवर को पूरे प्रकरण की पल-पल जानकारी मिल रही थी, खुदाई की खबर सुनते ही उसने पत्नी को दूसरा पत्र लिखा, 'खुदाई हो गई हो तो फसल बो दो। चिंता की कोई बात नहीं।'

चर्चा यह है कि जिस तरह नटवर ने अपना परिवार चलाने के लिये सजिश रची थी, कहीं ऐसी की कुछ सोच को तो किसी ने साजिशन उन्नाव में सोना होने की बात कहकर आगे नहीं बढ़ाया है। क्योंकि सोने की बात सामने आते ही कई खबरें हासियें पर चली गईं थी। उस समय नरेन्द्र मोदी की यूपी में पहली रैली होने वाली थी, विपक्ष और सरकार रैली की सफलता को लेकर परेशान था। शोभन सरकार के सपने को बेहद प्रचार मिलने की वजह को 2014 के लोकसभा चुनाव से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। उन्नाव, फतेहपुर और सोनिया गांधी के संसदीय जिला रायबरेली की सीमाएं आपस में जुड़ती हैं। इस इलाके में बाबा शोभन सरकार के चमत्कार के तमाम किस्से मशहूर हैं। जनता उन्हें भगवान की तरह मानती है और इस भगवान को सभी दलों के नेता अपने पाले में करना चाहते थे, ताकि चुनावी फायदा उठाया जा सके। इसी लिये सपा और कांग्रेस बाबा का महिमामंडन करने में लगे हैं और भाजपा को राजनैतिक  नुकसान से बचाने के लिये मोदी को शोभन सरकार के सामने झुकना पड़ जाता है। 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.


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