खुद को ‘माननीय मंत्रीजी’ कहलाना मनीष सिसोदिया को पसंद नहीं

Manish Sisodia : आज का दिन कहीं बधाई देती जनता तो कहीं समस्या सुनाती जनता और कहीं काम न करने के बहाने ढ़ूंढ़ रहे अफसर तो कहीं काम करने का अवसर मिलने पर उत्साहित अफसरों से मिलने में बीता। जब भी कोई समस्या लेकर आता है और मैं किसी अधिकारी से फोन पर बात करना चाहता हूं तो मेरे ओएसडी की रटी-रटाई लाइन होती है- माननीय मंत्री जी, आपसे बात करेंगे। बार-बार टोकने पर भी उनकी आदत छूट नहीं रही है, उम्मीद है जल्दी छूट जाएगी।

हालांकि पटपड़गंज विधायक ऑफिस में बैठने वाले कुछ कार्यकर्ताओं को यह समझाना आसान नहीं है कि मंत्री बनने के बाद भी मुझे वैसी ही कुर्सी पर बैठना है जैसी कमरे में बाकी सबके लिए रखी है। कोई बात नहीं, अभी तो नई राजनीति बनाम पुरानी राजनीति की परंपराओं में यह टकराव चलेगा। लेकिन हैरत होती है ऐसे अधिकारियों से मिलकर जो साल भर से ज्यादा से अपने पद पर बैठे हैं, उनके ठीक नीचे व्यवस्था न सिर्फ ठप पड़ी है बल्कि सड़ चुकी है, लेकिन उन्हें उनका आभास भी है लेकिन माथे पर शिकन तक नहीं आती। उनकी सारी योग्यता महज कुर्सी पर बैठे रहने और बचाए रखने को समर्पित है।

अच्छी बात यह है कि इन सबके बीच बहुत सारे अफसर नई राजनीति को एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। कई तो आज ऐसे भी मिले जो बेताब हैं कुछ कर दिखाने के लिए। उन्हें पसंद आ रहा है कि आगे से उन पर भ्रष्ट नेताओं का नहीं बल्कि जनता का दबाव डालकर काम करवाया जाएगा। कल शिक्षा विभाग, राजस्व और शहरी विकास के अधिकारियों को उनके लेखा-जोखा के साथ बुलाया है। विकास के गुब्बारे के पीछे कुछ सवाल हैं, जिनका उत्तर मुझे ढ़ूंढ़ना है, जाहिर है, समाधान भी इन्हीं सवालों से निकलेगा- अगर हम स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा, साफ पानी और साफ-सुथरे शौचालय भी मुहैया नहीं करा सकते तो शिक्षा विभाग की जरूरत ही क्या है? अगर लोग गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं तो दिल्ली जल बोर्ड या फिर जल संसाधन मंत्रालय के अस्तित्व का क्या मतलब है? अगर हम इस ठंड में खुले आसमान के नीचे सोने वाले के लिए छत, बीमार के लिए इलाज और हर व्यक्ति को पीने के लिए पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाते, तो विकास का नारा किसके कानों तक पहुंचा है।

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली सरकार के मंत्री मनीष सिसोदिया के फेसबुक वॉल से.

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