खुर्शीद की मौजूदगी में मैं खुद को बहुत सुरक्षित और निश्चिंत महसूस किया करती थी

Manisha Pandey : लड़कियों के सिर के पीछे एक आंख होती है और कोई उनकी पीठ भी देख रहा हो तो वो जान जाती हैं कि देखने वाले की नजर कैसी है। मर्द कितने भी शातिर क्‍यों न हों, औरत की नजर से नहीं बच सकते। हम भांप ही लेते हैं। और तिस पर अकेले रहने-जीने वाली लड़कियां तो और भी हजार गुना ज्‍यादा सावधान होती हैं। हमारे कान हमेशा चौकन्‍ने होते हैं।

और अपनी उन तमाम चौकन्‍नी निगाहों और कानों से देखकर, भांपकर मैं कह रही हूं कि खुर्शीद संसार के उन कुछ बेहद चुनिंदा पुरुषों में से एक थे, जिनकी मौजूदगी में मैं खुद को बहुत सुरक्षित और निश्चिंत महसूस किया करती थी। और मैं ही नहीं, मुझे और उन्‍हें जानने वाली दर्जनों लड़कियां। मैं कई बार उनके घर में बिलकुल अकेले रुकी हूं। खाया-पिया, गप्‍पें मारी और भीतर वाले कमरे में जाकर सो गई। उनके घर में मेरा बिस्‍तर, सबसे अच्‍छी वाली तकिया, चादर सब फिक्‍स था। वो पिंक कलर की वादर कहीं भीतर आलमारी में रखी हो तो ढूंढकर लाते और कहते, ये रही तुम्‍हारी फेवरेट चादर।

मुझे कभी ये ख्‍याल भी नहीं आया कि मुझे कमरे का दरवाजा भी बंद करना चाहिए। इतनी निश्चिंत तो मैं किसी रिश्‍तेदार के घर भी नहीं हो सकती, जैसे उनके घर पर होती थी। जैसे पापा के साथ होती हूं। कमरा खुला है, लेकिन फिर भी सुबह दरवाजे पर नॉक करते। कहते, उठ जा बेटा, चाय बन गई। और मैं पांच मिनट और, दो मिनट और करती आधे घंटे तो और नींद मार ही लेती थी। जब भी मिलते तो सिर पर हाथ फेरते थे। बिटिया बुलाते थे। कभी नहीं लगा कि वो पुरुष हैं और मैं उनके लिए एक स्‍त्री हो सकती हूं। एक क्षण को भी नहीं।

मेरे लिए वो दोस्‍त थे। पिता की तरह थे। मैं उनसे अपने पापा की तरह ही जिद कर सकती थी। मुझे अब भी यकीन नहीं और कभी नहीं होगा कि उन पर लगे आरोपों में कोई दम है। सब झूठ की फसीलें लगती हैं।

इंडिया टुडे हिंदी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.


Pradeep Pallove : इंडिया टूडे की प़त्रकार मनीषा पाण्डेय की बातों में अगर सच्चाई है तो खुर्शीद अनवर भी लगता है साजिश के शिकार हो गए। आज जिस तरह से बलात्कार को परोसा जा रहा है। इतने समय बाद आरोपी मुंह खोलती हैं। ऐसी हालत रही तो वह समय दूर नहीं कि जहां लड़कियां काम करेंगी वहां पर लड़के काम करने को तैयार न हों। लड़कियां फिर चुल्हे चैके तक सीमित न रह जाए। लगता है कि विवेकानंद की बातों पर फिर से मनन करने की जरूरत है। जहां आग और घी रहेगा वहां विकृति आना स्वाभाविक है।

प्रदीप पल्लव के फेसबुक वॉल से.

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