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सुख-दुख...

खुशवंत ने कभी भी वैसे लोगों को गंभीरता से नहीं लिया, जो खुद को बहुत गंभीरता से लेते थे : एमजे अकबर

खुशवंत सिंह कभी पत्रकारिता वाले पत्रकार नहीं थे, वे एक लेखकीय पत्रकार थे. वे अखबारी लेखन में कलात्मक दास्तानगोई का पुट लेकर आये. टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के मुख्य प्रकाशन इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादक बनने के लिए जब उन्हें आमंत्रित किया गया, तब तक ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ के साथ वे एक उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे. लेकिन यह पत्रिका ब्रिटिश राज की मानसिकता से उपजे पारंपरिक साज-सज्जा में जकड़ी हुई थी.

खुशवंत सिंह कभी पत्रकारिता वाले पत्रकार नहीं थे, वे एक लेखकीय पत्रकार थे. वे अखबारी लेखन में कलात्मक दास्तानगोई का पुट लेकर आये. टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के मुख्य प्रकाशन इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादक बनने के लिए जब उन्हें आमंत्रित किया गया, तब तक ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ के साथ वे एक उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे. लेकिन यह पत्रिका ब्रिटिश राज की मानसिकता से उपजे पारंपरिक साज-सज्जा में जकड़ी हुई थी.

किसे पता कि जिन लोगों ने उन्हें संपादक बनाया, वे इसके परिणामों से आगाह थे या नहीं. एक हफ्ते के काम के बाद ही खुशवंत परंपराओं की लुगदी बनानेवाली मशीन बन गये. द टाइम्स के शीर्ष पर बैठे कुछ लोग उनके अतिवाद से अचंभित जरूर हुए होंगे. लेकिन खुशवंत ने कभी भी वैसे लोगों को गंभीरता से नहीं लिया, जो खुद को बहुत गंभीरता से लेते थे. वे दिखावे के कट्टर दुश्मन थे और उन्होंने अपने मुताबिक हालात खुद तय किये. कोई भी संपादक तौलियानुमा टीशर्ट पहनकर कार्यालय जाने की हिम्मत नहीं कर सकता था.

यह एक सांस्कृतिक सदमा था. बड़े आत्मविश्वास के साथ वे अपने मस्तमौला अंदाज को जीते थे. हर तरीके का विरोध पाठकों द्वारा स्वीकार्य होने की स्थिति में बेमानी हो जाता था, जो किसी भी संपादक के लिए सबसे बड़ा हथियार होता है. अमर पक्षी के राजसी ठाठ की तरह पत्रिका की लोकप्रियता में बढ़ोतरी हुई.  कथा-कहानियां यदि समकालीन जीवन के बारे में होती हैं, तो पत्रकारिता क्षणिक सच्चइयों को बयान करती है. खुशवंत सिंह ने बेहिचक इस दूरी को पाटा, क्योंकि वे किसी शाही मीनार में कैद होने को हास्यास्पद मानते थे. वे अपने कॉलम के साथ छपनेवाले रेखाचित्र में बने बिजली के बल्ब में जीवन बिताना पसंद करते थे. इस शानदार छवि को प्रसिद्ध कलाकार और काटरूनिस्ट मारियो ने गढ़ा था, जिसमें खुशवंत की दोस्ताना शरारती मुस्कान ने उन्हें लाखों लोगों के लिए परिभाषित किया. ‘बल्ब’ विचार का जाना-पहचाना प्रतीक है. खुशवंत सिंह विचार को विचारधारा से अधिक पसंद करते थे. तब के बौद्धिकफैशन वामपंथ को वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विरोधी मानते थे, जो उनके लिए सबसे अधिक कीमती था. उनके लिए कोई मत ताबूत की तरह था, जिसकी जरूरत श्मशान में होती है. दक्षिणपंथ उनकी रुचियों के हिसाब से बहुत कठोर था. गुण-दोषों के आधार पर अपना पक्ष रखते हुए वे सकारात्मक मध्य में विचरते रहे. लेकिन, भारतीय पत्रकारिता को 20वीं सदी में लानेवाले खुशवंत सिंह को जाननेवाले हर व्यक्ति को पता है कि वे पक्षहीन नहीं थे.

उनकी पक्षधरता का बड़ा उदाहरण श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रति उनका झुकाव था. 1971 में जब श्रीमती गांधी देश की हीरोइन थीं, तब यह कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी. इंदिरा गांधी ने पहले मृतप्राय बूढ़े नेतृत्व से कांग्रेस को मुक्त किया और फिर बांग्लादेश को आजाद कराने में सहयोग किया, जो मजबूत और बहादुर नेतृत्व का शानदार प्रदर्शन था. पर 1975 में जब उन्होंने आपातकाल लगाकर विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया और प्रेस पर अंकुश लगाया, तब उनके समर्थन के लिए अविश्वसनीय वफादारी का होना जरूरी था. अचंभे की बात यह थी कि खुशवंत सिंह जैसा उदारवादी तानाशाही की तरफदारी भी कर सकता था. अगर इसका कोई बहाना हो सकता है, तो वह उनकी आम राय के विरोध में जाने की प्रवृत्ति थी. यदि कभी कोई बाढ़ बेहतर किस्मत की ओर ले जा रही हो, तो खुशवंत उसकी विपरीत धारा में तैरने की कोशिश करते. मुङो नहीं लगता कि उनका स्कॉच व्हिस्की को एक आम आकर्षण बना देना संभव हो पाता, यदि उनके इलस्ट्रेटेड वीकली के दिनों में मुंबई में शराबबंदी नहीं होती. अगर शराब पीना वैधानिक होता, तो वे एक परहेजगार भी बन सकते थे. प्रेम और सेक्स पर उनके प्रचुर विचार कुछ अधिक पेचीदा थे, लेकिन इसके पीछे उनका मुख्य इरादा ‘संभ्रांत’ भारतीयों की सोच को आक्रांत करनेवाले विक्टोरियाई मूल्यों की चिकोटी काटने का था.

1960 के दशक के विश्वव्यापी युवा आंदोलन, जिसमें पेरिस में युवाओं ने देसी बम फेंके और कैलिफोर्निया में गांजे की सिगरेट जलायी, भारत में 1970 के दशक के शुरुआत में पहुंचा. ठीक इसी समय इलस्ट्रेटेड वीकली लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़ रहा था. यह कोई संयोग नहीं था. खुशवंत सिंह वह विद्रोही बन गये थे, जिसकी तलाश भारतीय मध्यवर्ग के युवा को थी. वे गांधी आश्रम के नियमों को माने बिना गांधी की प्रशंसा करते थे. खुशवंत सिंह युवाओं और युवा पत्रकारों में बेहद भरोसा करते थे, जो 1970-71 में एक क्रांतिकारी बात थी. मीडिया तंत्र में निचले पायदान पर खड़े लोग बरसों वहीं खड़े रह जाते थे. खुशवंत सिंह ने खुले अंदाज से उन्हें ऊंचाई दी, लेकिन उनके काम पर भी पैनी नजर रखते रहे. मुङो नहीं मालूम कि मेरा भविष्य क्या होता, यदि खुशवंत और उनकी शानदार उप-संपादक फातिमा जकारिया ने मुङो अपनी किस्मत को बदलने का मौका नहीं दिया होता. लेकिन इतना मैं जरूर जानता हूं कि उन्होंने मेरे लिए जो किया, उसके लिए मैं उनका जीवनभर आभारी रहूंगा. खुशवंत सिंह उस्ताद थे. वे ईश्वर में भरोसा नहीं करते थे, पर मेरी कल्पना में ईश्वर उनमें जरूर भरोसा करता था. खुशवंत सिंह कुछ चुनिंदा लोगों में से थे. 99 साल के खुशगवार उथल-पुथल के बाद उनकी आत्मा अब शांति से आराम कर रही है.

लेखक एमजे अकबर वरिष्ठ पत्रकार हैं और अभी हाल में ही भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं.

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