गठबंधन में बंधन खुलने पर हंगामा क्यूँ?

१७ वर्षों तक साथ रहे नीतीश और शरद यादव की जेडीयू का एनडीए के गठबंधन से बंधनमुक्त होने पर इतना हंगामा क्यों? बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में अभी तक चल रही एनडीए की सरकार के भंग होने व भाजपा के सरकार से बाहर होने की घटना चिरप्रतीक्षित थी. यह कोई ऐसी घटना नहीं है जिस पर देशवासी अचंभित रह गए हों. २०१४ के लोकसभा के चुनावों से पूर्व या तत्काल बाद, एनडीए और यूपीए गठबंधन से कई दलों के बाहर निकलने व नए दलों के सम्मिलित होने की सम्भावना तो हम पहले भी जता चुके हैं.

पहले टीएमसी फिर डीएमके और अब जेडीयू ने यूपीए और एनडीए से नाता तोड़कर हमारी इस आशंका पर मोहर लगा दी है. बड़े और राष्ट्रीय दलों की कमजोरी के कारण ही क्षेत्रीय दल अमरबेल की भांति पनप रहे हैं जो जाति, संप्रदाय और क्षेत्रीयता के बलपर ही अंततः कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े राष्ट्रीय दलों का जनाधार खिसकाकर अपनी शक्ति व स्थिति को निरंतर मजबूत करने का कार्य कर रहे हैं. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे कांग्रेस के विशाल जनाधार वाले राज्य इसके उदाहरण हैं.

कांग्रेस की असफलता के पीछे जनसरोकारों की अनदेखी और उसकी बढ़ती निरंकुशता एक बड़ा कारण रहा है जिसके चलते ७० के दशक से देश में दो-दलीय राजनीतिक शासन व्यवस्था की आवश्यकता के साथ ही विकल्प की तलाश होने लगी थी. कांग्रेस के विरोध के चलते तत्कालीन विपक्षी दलों द्वारा चुनाव में कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए ही १९७७ में चार प्रमुख दलों का विलय कर जनता पार्टी का गठन किया गया था, जो विचारधारा में समानता न होने के कारण ही अंततः विफल हुआ. जनता पार्टी में घटक के रूप में विलय कर चुके पूर्व जनसंघ ने जनता पार्टी से अलग होकर १९८० में भारतीय जनता पार्टी का गठन किया और आज वह एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में हमारे समक्ष है. दूसरी और जनता पार्टी में शेष रह गए घटकों का बार-बार विघटन हुआ जो निरंतर चल रहा है.

गठबंधन के इस वर्तमान दौर में कांग्रेस का विकल्प बन उभर कर आनेवाली भाजपा को केंद्र और राज्यों की सत्ता की बागडोर सँभालने की कुछ अधिक ही जल्दबाजी दिखाई पड़ती है. इस जल्दबाजी में उसने मात्र कांग्रेस का विरोध करनेवाले दलों से स्वयं मात खाई जिससे उसकी राजनीतिक अपरिपक्वता का पता चलता है. गठबंधन के चक्कर में पहले उत्तर प्रदेश में बसपा ….फिर कर्नाटक में जेडीएस….और अब बिहार में जेडीयू से चोट खाई. सरकार बनाने या उसमें सम्मिलित होने की इतनी जल्दबाजी और इतना हड़कंप की सहयोगी दल के विचारों व नीयत को जांचे-परखे बगैर सत्ता की खीर चखने की बेताबी में सही मित्र की पहचान करने में बार-बार विफल रही भाजपा को क्या कहा जाए?

विडम्बना यह है कि सत्ता की दौड़ में आज भाजपा दलनिष्ठ या संगठननिष्ठ न होकर व्यक्तिनिष्ठ अधिक हो गई है. संगठनों पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हावी होने पर ही सत्ता और राजनीति की तमाम बुराइयां बिन बुलाये आ धमकती हैं. भाजपा में धैर्यवान, कर्मठ और त्यागी कार्यकर्ताओं और शीघ्रता से सब कुछ पा लेने की जल्दबाजी वाले कार्यकर्ताओं में एक संघर्ष सा छिड़ा है. दूसरी पंक्ति के शीर्षनेता आपस में ही भिड़ गुटबाजी को हवा दे रहे हैं. कमजोर और अनुभवहीन शीर्ष नेतृत्व संगठन में बढ़ रही अनुशासनहीनता को रोकने में अक्षम दिखाई दे रही है. संगठन को मजबूत कर जनता को अनुकरणीय सन्देश देंगे तो सत्ता की कमान स्वतः ही मिल जायेगी……इस मूल मंत्र पर चले बिना सफलता संदिग्ध है. दूसरे भाजपा में पैराशूट और जुगाड़ के सहारे बहुत से ऐसे लोगों ने न केवल सदस्यता बल्कि महत्वपूर्ण पद भी हथिया लिए हैं. ऐसे मौका परस्त लोगों ने पार्टी का अपहरण कर लिया है जिसके चलते आज भाजपा ऐसी स्थिति पर पहुँची है.

बिहार में अभी हाल में ही जो कुछ हुआ उसका अंदेशा बहुत दिनों से था कि भाजपा जिस दिन जेडीयू के भय दोहन से बाहर आ जायेगी…..उसी दिन जेडीयू एनडीए से बाहर चली जायेगी. भाजपा में भी लगता था कि अब वो जेडीयू के दबाव में अधिक दिनों तक नहीं रहेगी. शीघ्रता से बदलते घटनाक्रम से लग रहा था कि जेडीयू का कांग्रेस से गुप्त समझौता हो चुका हो. दोनों दलों द्वारा यह खेल अचानक या वर्तमान का न होकर भविष्य की रणनीति के तहत खेला जा रहा है. मुस्लिम और हिन्दू मतों को मध्ये नजर रख कर शतरंज की चालें चली जा रही हैं. जिसके चलते कोई गठबंधन से जाने को तैयार है तो कोई शासन-सत्ता को तिलांजलि देने को तैयार है. किसी का लक्ष्य २०१४ है तो किसी की निगाहें २०१४ के बाद उत्पन्न होने वाली स्थिति या २०१९ पर है.

मीडिया चाहे जो भी कयास लगाये…….चैनलों पर अपना आंकलन प्रस्तुत करते धुरंधर चाहे जो कुछ भी कहें…..इतना तो स्पष्ट है कि नरेन्द्र मोदी न तो २०१४ में लोकसभा के लिए प्रत्याशी होंगे और न ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार. वह तो स्टार प्रचारक बन कर पूरे देश का भ्रमण कर देश की जनता से रूबरू हो अपनी उपस्थिति के माध्यम से एक सीधा सम्बन्ध बना भाजपा की स्थिति को मजबूत करने का प्रयास करेंगे, जो अंततः उनको प्रधानमंत्री पद तक ले जायेगी. बिहार विधानसभा के पिछले चुनावों में जेडीयू की अधिक सीटों की मांग पर झुकती आई भाजपा आज अचानक इतना कड़ा रुख अपनाने को यूँ ही तैयार नहीं हो गई…..जेडीयू से पीछा छुड़ाने के लिए ही एक सोची समझी रणनीति के तहत यह कदम उठाया गया है. २०१४ तक जेडीयू का विघटन हो जाए इस संभांवना से इनकार नहीं किया जा सकता. जेडीयू के विधटन पर सबसे अधिक लाभान्वित लालू प्रसाद की राजद और भाजपा रहेगी.

बिहार में यह राजनीतिक उठापटक बहुत दिनों से संभावित थी परन्तु इस घटनाक्रम में सबसे बड़ा धोखा तो जेडीयू से छतीस का आंकड़ा रखनेवाले आरजेडी के लालू प्रसाद यादव के साथ हुआ है. नीतीश के विश्वास मत में कांग्रेस के ४ विधायकों द्वारा नीतीश के पक्ष में मतदान करने से प्रश्न उठता है कि क्या आरजेडी अब कांग्रेस के लिए एक्सपायरी डेट की हो चुकी है? गठबंधन में हो या एकल, राजनीति में सभी दल अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए लाभ-हानि की गणना कर भविष्य की रणनीति बनाने के लिए स्वतन्त्र हैं. राजनीतिक दृष्टि से नीतीश ने जो कुछ भी किया उसे गलत कतई नहीं कहा जा सकता….हाँ, नैतिक दृष्टि से यह धोखा है. हमें यह समझना होगा कि बड़े दलों की नालायकी के कारण ही क्षेत्रीय दल शक्तिशाली हो रहे हैं, जो देश के गणतांत्रिक ढाँचे के लिए ठीक नहीं है. १९८० में पैदा हुई भाजपा को अभी बहुत कुछ सीखना होगा……हड़बड़ी में शासन करने की जल्दबाजी में उसका आधार और संगठन निश्चित रूप से कमजोर हो रहा है…यह उसे समझना चाहिए.

लेखक विनायक शर्मा मंडी से प्रकाशित साप्‍ताहिक अमर ज्‍वाला के संपादक हैं.

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