गड़बड़ सुर लय ताल उर्फ आज का नैनीताल

नैनीताल की खूबसूरत प्राकृतिक झील के पानी में रिकार्ड गिरावट आ गई है। नैनी झील का न्यनतम जल स्तर 12 फीट से भी 6 फीट नीचे गिर गया है। झील में मानक के मुताबिक करीब 18 फीट पानी कम हो गया है। जल स्तर में गिरावट का यह सिलसिला लगातार जारी है। झील का जल स्तर हर रोज कम होता जा रहा है। झील का जल स्तर कम होने के कारण यह खूबसूरत तालाब तलैया सी नजर आने लगी है। तालाब के चारों ओर दर्जनों डेल्टा उभर आये है। झील के जल स्तर में आई इस गिरावट से भविष्य में नैनीताल में पीने के पानी की सप्लाई और पर्यटन उद्योग पर बुरा असर पड़ने के आसार नजर आ रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि उत्तराखण्ड को पर्यटन प्रदेश बनाने का दावा करने वाली राज्य सरकार और झील के नाम पर करोड़ों का बजट ठिकाने लगाने में जुटे सभी जिम्मेदार सरकारी महकमें इससे कतई बेखबर बने हुए हैं।

समुद्र तल से 1938 मीटर ऊँचाई पर सात पहाड़ियों से घिरी सुन्दर झील के चलते नैनीताल का नाम भारत ही नहीं विश्व के प्रतिष्ठित हिल स्टेशनों में शुमार है। नैनीताल का नाम, शान, पहचान और अस्तित्व नैनी झील पर ही टिका है। तालाब नहीं तो नैनीताल नहीं। नैनीताल अगर है तो सिर्फ तालाब की वजह से। तालाब के बगैर नैनीताल की कल्पना करना भी नामुमकिन है। खूबसूरत तालाब से प्रभावित होकर ही करीब एक सौ साठ साल पहले अंग्रेज व्यापारी पीटर बैरन ने यहां एक यूरोपियन अंदाज का शहर बसाने की कल्पना की थी। इस तालाब की सुन्दरता ने अंग्रेजों का मन मोहा। 1841 में यहां बसासत शुरू हुई। नतीजन विश्व के नक्शें में नैनीताल का वजूद कायम हुआ।

तालाब की सेहत और खूबसूरती से नैनीताल की खूबसूरती है। सेहतमंद पीने का पानी है। पर्यटन है। सालाना अरबों का कारोबार है। रोजगार है। तालाब की सेहत और सुन्दरता पर रूपया बरसता है। इस तालाब को निहारने के लिए साल के बारहों महीने देश-विदेश के सैलानियों का यहां जमावड़ा लगता है। तालाब से नैनीताल नगर ही नहीं बल्कि आस-पास के इलाके के लोगों को पीने का पानी मिलता है। नैनीताल की आधी से ज्यादा आबादी की रोजी-रोटी सीधे तौर पर तालाब से जुड़ी है।

अचरज की बात है कि नैनीताल की हरेक सांस जिस तालाब के बूते चल रही है, वह लावारिश है। गंभीर रूप से बीमार है। पिछले तीन सालों से एयरेशन के हवाले है। या यूं कहिए कि आई.सी.यू. में आक्सीजन के बूते जिन्दा है। पिछले करीब तीन दशकों के दौरान सभी स्तरों पर नैनीताल के तालाब की जबरदस्त उपेक्षा हुई है और मौजूदा वक्त में हो रही है। पिछले सालों में नैनीताल के तालाब के संरक्षण के नाम पर अरबों रूपये की योजनाएं बनी और मौजूदा वक्त में बन रही है। लेकिन तालाब की सेहत पर इन योजनाओं का कोई असर नहीं हुआ। हाल के वर्षो में भारत सरकार ने झील संरक्षण के वास्ते करीब 96 करोड़ रूपये की योजना मंजूर की। इस योजना के तहत झील में ऐयरेशन के अलावा कोई काम नहीं हुआ। सरकारी अमले ने योजना का 95 प्रतिशत हिस्सा सड़क-खडन्जा और संचार माध्यमों में अपनी रंगीन फोटों छपवाने में ठिकाने लगा दिये। भारत सरकार ने हाल में जे.एन.एन.यू.आर.एम योजना के तहत नैनीताल को भवन निर्माण, वाटर सप्लाई रिआर्गनाईजेशन, सीवरेज सिस्टम और ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन के लिए फिलहाल चार हजार तीन सौ अड़सठ लाख रूपये मंजूर किये है। एशियन डवलपमेंट बैंक ने नैनीताल के पेयजल सप्लाई सिस्टम के लिए तीन चरणों की करोडो़ की योजना मंजूर की है। पहले चरण में पेयजल वितरण लाईनों, टैंक और ट्यूबवेल आदि कामों के लिए करीब चालीस करोड़ रूपये मंजूर हो चुके है। इसका काम भी शुरू हो गया है।

झील के विकास के नाम पर बने झील विकास प्राधिकरण मकानों का नक्शा पास कराने के एवज में विकास शुल्क, उप विभाजन शुल्क और संरक्षण शुल्क वगैरह नाम से बेहिसाब रकम वसूलता आ रहा है। उत्तराखण्ड पेयजल संस्थान झील से रोजाना औसतन 19 लाख लीटर पानी बेचकर सालाना करीब तीन से चार करोड़ रूपये की कमाई कर रहा है। ये सारी योजनाएं झील के बूते चल रही है। लेकिन झील की हालत यह है कि महज दो-ढाई हजार रूपये की रस्सीयों के अभाव में 1993 के बाद से पिछले 19 सालों के दरम्यिान झील की लम्बाई, चैडा़ई और गहराई नहीं नापी जा सकी है। जबकि झील के अन्दरूनी जांच-परख के लिए यह काम रूटीन में हर साल होना चाहिए था।

झील संरक्षण योजना में करोड़ों रूपये की रकम को ठिकाने लगाने के लिए झील के सदियों पुराने निकासी द्वार को अवैज्ञानिक तरीके से पाट कर, कार पार्किंग और दुकानों बनाने वाले सरकारी महकमे के अफसरान तालाब के भीतरी हालात की पड़ताल के लिए महज तीन-चार हजार रूपये तक खर्चने की जहमत नहीं उठा रहे है। जबकि नैनीताल की झील और नालों के रखरखाव के लिए जिम्मेदार लोक निर्माण विभाग की हर साल नियमित रूप से झील की गहराई-लम्बाई और चौड़ाई जांचने की जिम्मेदारी है।

सरकारी अमले ने नैनीताल की कमजोर पहाड़ियों की हिफाजत, यहां की झील और नालातंत्र की देखरेख और रखरखाव के लिए आज से पिच्चासी साल पहले 1927 में बनी हिल साईड सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति का वजूद खत्म कर दिया है। कमिश्नर की अध्यक्षता में बनी इस विशेषज्ञ कमेटी की सन् 2000 के बाद से कोई बैठक नहीं बुलाई गई है। मशीनरी ने नैनीताल के बारे में इस उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति की समीक्षात्मक रपट और सुझावों को भी ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया है।

झील के जल स्तर में आ रही गिरावट को लेकर सरकारी मशीनरी जरा सी भी चिंतित नजर नहीं आ रही है। इसकी वजहों को जानने तक की कोशिशें नहीं की जा रही है। जानकारों का मानना है कि बिना वैज्ञानिकों की राय के तालाब के प्राकृतिक मुहाने को पाटने से झील में रिसाव होना मुमकिन है। रिसाव की वजह से झील का जल स्तर तेजी से घट रहा है। जबकि कुछ लोग झील के जल स्तर में आ रही गिरावट की वजह नैनीताल के प्राकृतिक परिवेश में पिछले सालों में हुए मनुष्यकृत बदलावों को मानते है। जानकारों का मानना है कि तालाब की तलहटी में बेहिसाब मिट्टी मलवा और कूडा़ करकट भर जाने से तालाब के भीतर मौजूद प्राकृतिक जल स्रोत बंद हो गये है। झील के जल संग्रहण क्षेत्र माने जाने वाले सूखाताल जैसे इलाकों में भी कंक्रीट का जंगल उग गया है। नैनीताल में पिछले दो दशकों के दौरान हजारों वैध और अवैध मकान बन जाने से बरसात का पानी सोखने के लिए खाली जमीनें बचीं नहीं है। पहले मुख्य सड़क, मालरोड और बाजार के इलाकों को छोड़कर सभी सड़क-रास्ते कच्चे थे। ये संपर्क मार्ग बरसात का पानी सोखने का काम करते थे। झील संरक्षण के नाम पर और दूसरी योजनाओं के तहत शहर की सभी सड़क और रास्तों में डामर या सिमेंट-कंक्रीट बिछा दिया गया है। पैसा ठिकाने लगाने के चक्कर में ठंडी सड़क और खेल के मैदान के एक हिस्से को भी टायलों से पाट दिया गया है।

ब्रिटिश सरकार ने यहां की पहाड़ियों की हिफाजत के खातिर 1880 से 1928 के बीच यहां 56 बड़े और 229 छोटे नाले बनाये थे। नालों के तल में पत्थरों का खड़ंजा बिछाया गया था। जगह-जगह पर फाल बनाये गये थे। ताकि पानी जमीन में रिस सकें। आजाद भारत के योजनाकारों और इंजीनियरों ने इन नालों के तलों को भी सिंमेट-बजरी से पाट कर पक्का कर दिया है। नैनीताल में समतल खाली जमीन बची नहीं है, जो बरसात का पानी सोख सकें। खाली जमीन के नाम पर जंगलात की निगरानी वाला कुछ वन क्षेत्र और तेज ढाल वाली कुछ जमीनें बचीं है, जो कि बरसात के पानी को सोख पाने से असमर्थ है। लिहाजा बरसात के दिनों में जमीन के भीतर पानी जमा होने के बजाय तेज रफ्तार से नालों के जरिये सीधे तालाब में पहुंच रहा है। पानी के साथ बहकर आए मिट्टी-मलवा, कूडा-करकट तालाब के तल में समा जाता है और तालाब भर जाने के बाद पानी बाहर निकल जाता है। कुल मिलाकर तालाब के रिचार्ज होने की संभावनाएं तकरीबन क्षीण हो चुकी है।

केन्द्र और राज्य सरकारें पेयजल रिआर्गनाईजेशन के नाम पर अरबों रूपये खर्च करने जा रही है। ये सभी योजनाएं तालाब और उसके पानी पर केन्द्रित है। लेकिन तालाब की सेहत को दुरूस्त करने की दिशा में किसी को सोचने तक की फुर्सत नहीं है। जबकि इतनी बढ़ी रकम से नैनीताल के लिए पीने के पानी की वैकल्पिक योजनाएं बनाई जा सकती है।

उत्तराखण्ड को पर्यटन प्रदेश बनाने का दावा करने वाली राज्य सरकार अलग राज्य बनने के साढे़ ग्यारह साल बाद भी आज तक कोई नया पर्यटन स्थल विकसित कर पाने में नाकाम रही है। उल्टा विश्व पर्यटन मानचित्र में पहले से ही प्रतिष्ठित पर्यटन स्थल के रूप में दर्ज नैनीताल जैसे नगर को संरक्षित करने में भी घोर लापरवाही बरत रही है। राज्य सरकार को यह नहीं भुलना चाहिए कि पर्यटन उद्योग की भाषा में नैनीताल की झील यहां का

प्रयाग पांडे
प्रयाग पांडे
प्रमुख पर्यटक उत्पाद है। अगर नैनीताल को पर्यटक केन्द्र के रूप में बनाये रखना है तो यहां की झील का जिन्दा और सेहतमंद रहना बहुत जरूरी है। नारों से सिर्फ वोट झटके जा सकते है, पर्यटकों को आकर्षित नहीं किया जा सकता। पर्यटकों को नारे नहीं, पर्यटक स्थल और वहां मौजूद अधिसंरचनात्मक नागरिक सुविधाएं आकर्षित करती हैं।

लेखक प्रयाग पाण्डे उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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