गरीबी के आंकड़े पर फंसी सरकार को आने लगा है गुस्सा!

योजना आयोग के चर्चित गरीबी के नए आंकड़े ने केंद्र सरकार की काफी किरकिरी करा दी है। इस मुद्दे पर अपनों ने भी योजना आयोग पर गुस्सा उतारना शुरू कर दिया है। कांग्रेस के अंदर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया को लेकर अंदर ही अंदर काफी गुस्सा बढ़ा है। आहलुवालिया का नाम लिए बगैर पार्टी के कई दिग्गजों ने योजना आयोग की इस नई ‘बाजीगीरी’ को कोसना शुरू कर दिया है। यहां तक कि पार्टी के चर्चित महासचिव दिग्विजय सिंह को भी आयोग के दावे हजम नहीं हो रहे हैं। उन्होंने खुलकर कह दिया है कि गरीबी के ताजा आंकड़े उन्हें भी समझ में नहीं आ रहे हैं।

5 अगस्त से संसद का सत्र शुरू होने जा रहा है। सत्र शुरू होने के महज कुछ दिन पहले ही उठे इस विवाद से पार्टी के रणनीतिकार काफी हलकान होने लगे हैं। राजनीतिक माहौल को देखते हुए सरकार ने भी इस मामले में किनारा करने का विकल्प चुन लिया है। हालांकि, केंद्रीय योजना राज्यमंत्री राजीव शुक्ला ने इस मुद्दे पर सरकार का यह कहते हुए बचाव किया है कि गरीबी के ताजा आंकडे से सरकार का कोई सीधा रिश्ता नहीं है। क्योंकि, यह आंकड़ा योजना आयोग ने जारी किया है। इस पर अभी सरकार ने कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है। ऐसे में, जो लोग इस मामले में सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, यह बात कुछ ठीक नहीं लगती। शुक्ला का दावा है कि सरकार ने पहले ही सुरेश तेंदुलकर समिति के फॉर्मूले से बनाए गरीबी के आंकड़े को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया था। ऐसे में, दो साल पहले ही गरीबी का आकलन करने के लिए रंगराजन समिति बना दी गई थी। इस समिति की रिपोर्ट अगले साल आने वाली है। इसका सरकार को इंतजार है। ऐसे में, बेवजह इस मामले को तूल देने की जरूरत नहीं है।

दरअसल, मंगलवार को योजना आयोग ने आंकड़ा जारी करके यह जानकारी दी थी कि देश में गरीबों की संख्या तेजी से घटी है। अप्रत्यक्ष रूप से यह जताने की कोशिश की गई कि यूपीए सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के चलते तेजी से गरीबी उन्मूलन हुआ है। जाहिर है कि इस तरह के सुहावने आंकड़े से रणनीतिकारों को उम्मीद रही होगी कि इससे राजनीतिक रूप से सरकार की वाहवाही होगी। शुरुआती तौर पर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इस आंकड़े को लेकर काफी उतावले भी हो गए थे। कई नेताओं ने सरकार और पार्टी की अतिरिक्त ‘वफादारी’ में कई ऐसे बोल बोल दिए, जिनसे पार्टी की काफी फजीहत हुई है।

उल्लेखनीय है कि पार्टी के सांसद राज बब्बर ने दावा किया था कि खाने-पीने की चीजों में महंगाई उतनी नहीं बढ़ी, जितने का स्यापा किया जा रहा है। अभिनेता से सांसद बने बब्बर ने यह दावा किया था कि आज भी मुंबई जैसे महंगे शहर में किसी को 12 रुपए में भरपेट खाना मिल जाता है। इसी प्रकरण में पूर्व केंद्रीय मंत्री रसीद मसूद ने कह डाला कि दिल्ली में तो 5 रुपए में ही खाना मिल जाता है। दावेदारी के इसी क्रम में केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला यहां तक बोल गए कि खाना तो 1 रुपए में भी मिल जाता है। इस तरह के बड़बोले बयानों ने जैसे जख्म में मिर्च का काम कर दिया। पूरे देश में आम जनता से लेकर मीडिया और विपक्ष ने इन बयानों की जमकर खबर ली।

खास तौर पर टीवी मीडिया ने यह दर्शाने की कोशिश की कि देशभर में कांग्रेस के दफ्तरों में भी खाने की थाली कहीं 40-50 रुपए से कम में नहीं मिलती। 5 रुपए में तो मुश्किल से एक कप चाय ही मिल पाती है। जगह-जगह लोगों ने टीवी न्यूज चैनलों के कैमरों पर सरकार को कोसा। यही कहा कि 5 रुपए और 1 रुपए में खाना मिलने की बात कहकर नेतागण गरीबों के साथ भद्दा मजाक कर रहे हैं। इस मामले में दांव उल्टा पड़ते देखकर कांग्रेस नेतृत्व ने अपने नेताओं के इन बयानों से खुद को अलग कर लिया। बाद में, जब बयानों की ज्यादा धुनाई-पिटाई शुरू हुई, तो राज बब्बर जैसे नेताओं ने अपने बयान के लिए माफी मांग ली। रसीद मसूद बोले कि उनकी बात को सही ढंग से नहीं समझा गया। इसीलिए, वे अपने बयान पर खेद जताते हैं।

इस माफीनामे के बावजूद महंगाई और गरीबी के मुद्दे पर लोगों का गुस्सा काफी बढ़ चला है। लोगों के इस गुस्सैल तेवर को देखते हुए कांग्रेस के कई रणनीतिकार ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए आगे आ गए हैं। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने भी गरीबी के आंकड़े के मामले में योजना आयोग की रीति-नीति पर सवाल उठा दिए हैं। उन्होंने कहा है कि अभी तक यही तय नहीं हो पाया कि आखिर गरीबी का वास्तविक मापदंड क्या है? जब बात हुई थी कि गरीबी के विभिन्न पहलुओं का आकलन करने के बाद रंगराजन समिति नया आंकड़ा तैयार करेगी, तो फिर जल्दबाजी क्यों की गई? सिब्बल ने बगैर नाम लिए योजना आयोग के कर्ताधर्ताओं पर नाराजगी जताई है। उन्होंने याद दिलाया कि दो साल पहले भी इसी मुद्दे पर आयोग ने सरकार की फजीहत करा दी थी। इसके बाद फिर वही गलती कैसे की गई?

योजना आयोग के सूत्रों के अनुसार, गरीबी के आंकड़े को लेकर जितना राजनीतिक बवाल मचा है, उसको लेकर आहलुवालिया भी काफी दुखी हैं। अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने योजना भवन में अपने सहयोगियों से यही कहा है कि नेताओं की आलोचनाओं से टीम को ज्यादा डरने-घबराने की जरूरत नहीं है। क्योंकि, तेंदुलकर फॉर्मूले से गरीबी का नया आंकड़ा देकर योजना आयोग ने कोई अपराध नहीं किया है। सिर्फ यह बताने की कोशिश की है कि तीन सालों में गरीबी के मोर्चे पर क्या तस्वीर बनी है?

कांग्रेस नेतृत्व की सबसे बड़ी मुश्किल यह बढ़ गई है कि इस मुद्दे पर सरकार के सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस ने काफी नाराजगी वाले तेवर अपना लिए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल ने खुलकर कह दिया है कि उनकी पार्टी को टीम आहलुवालिया का यह आंकड़ा स्वीकार्य नहीं है। क्योंकि, इससे सरासर एक गलत राजनीतिक संदेश जाने का खतरा पैदा हो गया है। सीपीएम के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम का मानना है कि सरकार गरीबी के इस मामले में राजनीतिक ढोंग ज्यादा कर रही है। पहले तो एक सुनियोजित रणनीति के तहत आयोग से आंकड़ा जारी कराया गया, ताकि नई तस्वीर को लेकर सरकार की वाहवाही कराई जा सके। जब खेल उल्टा पड़ गया, तो सरकार ने चालाकी दिखाते हुए इस काम की जिम्मेदारी  योजना आयोग पर डाल दी। अब तो सरकार के मंत्री भी आयोग के आंकड़े पर असहमति जता रहे हैं। दरअसल, यह सब कांग्रेस का राजनीतिक ढोंगभर है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने लंबे समय बाद सरकार के खिलाफ मुंह खोला है। उन्होंने इस मुद्दे पर यही कहा है कि सस्ती लोकप्रियता बटोरने के चक्कर में कांग्रेस ने योजना आयोग को हथियार बनाकर गरीबों के साथ भद्दा मजाक किया है। इसे लोग माफ नहीं कर सकते। भाजपा नेतृत्व ने रणनीति बनाई है कि यह मामला संसद के दोनों सदनों में उठाया जाए। सरकार से यह पूछा जाएगा कि आखिर योजना आयोग ने किसके इशारे पर तेंदुलकर समिति फॉर्मूले के आधार पर गरीबी का आधा-अधूरा आंकड़ा जारी किया? जबकि, संसद की अनुमति से ही इस काम के लिए रंगराजन समिति बना दी गई थी। इस मुद्दे को लेकर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव भी खफा बताए जा रहे हैं। हालांकि, औपचारिक तौर पर उन्होंने सरकार के खिलाफ कोई तीखी टिप्पणी अब तक नहीं की है।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व इस मुद्दे पर ‘डेमेज कंट्रोल’ के लिए सक्रिय हो गया है। इसी के चलते सरकार ने इस विवाद से अपने को अलग करने की कोशिश की है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कल यहां पार्टी के प्रदेश अध्यक्षों और विधानसभा के नेताओं के साथ बैठक की थी। इसमें भी गरीबी के आंकड़े वाले मामले में चर्चा हुई थी। कई नेताओं ने अपनी राय बताई कि महंगाई से जुडेÞ मुद्दों पर यदि सावधानीपूर्वक बयान नहीं दिए गए, तो पार्टी के लिए दांव उल्टा पड़ सकता है। क्योंकि, महंगाई को लेकर लोग इतने गुस्से में हैं कि उन्हें छोटी सी भी बेतुकी बात से काफी तकलीफ हो जाती है।

कोशिश की जा रही है कि संसद सत्र शुरू होने के पहले ही यह राजनीतिक विवाद एकदम ठंडा करा दिया जाए। केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने कह भी दिया है कि इस मुद्दे को लेकर बहस बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। अच्छा यही रहेगा कि लोग गरीबी पर रंगराजन समिति की रिपोर्ट का इंतजार कर लें। उनका दावा है कि मनरेगा जैसी तमाम कल्याणकारी योजनाओं से बड़े पैमाने पर गरीबी उन्मूलन हुआ है। खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी के नए कानून से गरीबी के मोर्चे पर बड़ी जीत मिलने वाली है। शायद, सरकार की इस ‘गेम चेंजर’ योजना को लेकर विपक्ष ज्यादा बेचैन है। हो सकता है कि इसी की वजह से छोटी से बात पर भी बतंगड़ खड़ा करने की कोशिश होती है। लेकिन, ऐसे गैर-जिम्मेदार राजनीतिक तौर-तरीको से देश का भला नहीं हो सकता।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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