गरीबों के अरमानों की लाश पर खड़ा लखनऊ का ‘सहारा शहर’

लखनऊ। अपट्रॉन की जमीन की नीलामी को लेकर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है, लेकिन गोमती नगर स्थित नगर निगम की अरबों रुपए की बेशकीमती 170 एकड़ सरकारी जमीन पर काबिज सहारा इंडिया हाउसिंग पर नगर निगम और नौकरशाही ने चुप्पी साध रखी है। सहारा इंडिया हाउसिंग को 1994 में इस भूमि पर गरीबों को आवास बनाने के लिए आवंटित की गई थी। गरीबों का अशियाना इस बेशकीमती भूमि पर नहीं बन पाया, लेकिन सुब्रत राय सहारा श्री का अशियाना 'सहारा शहर' जरूर जनता को चिढ़ा रहा है। इस भूमि के बारे में नगर निगम और शासन के आला अफसर मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं।

21 सितम्बर 1994 को लखनऊ विकास प्राधिकरण ने नगर निगम की गोमती नगर स्थित उजरियांव और जियामऊ गांव की 170 एकड़ जमीन को अधिग्रहण किया था। इस जमीन का अधिग्रहण आवासीय और कार्मिशयल प्रयोजन के लिए किया गया था। लेकिन नगर निगम ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 15 और 17 का उपयोग करते हुए इस भूमि को सहारा इंडिया हाउसिंग के पक्ष में 30 साल के लिए लीज पर दे दिया। इसके साथ ही 30-30 साल के लिए दो बार लीज करार बढ़ाए जाने का प्रावधान किया गया था।

नगर निगम और सहारा इंडिया हाउसिंग के बीच इस जमीन को विकसित करने के लिए एग्रीमेंट के तहत कई शर्तों के साथ 22 अक्टूबर 1994 में करार हुआ था। करार के तहत 170 एकड़ भूमि में ग्रीन बेल्ट विकसित करना था। बाकी बची हुई जमीन पर गरीबों के लिए मकान, प्लॉट, व्यवसायिक भवन, पार्क, अस्पताल, कम्युनिटी हाल विकसित करना था। भूमि को विकसित करने में नगर निगम द्वारा तय किए गए नियमों के तहत कार्य होगा। इस करार में सबसे खास बात यह रही कि सहारा इंडिया हाउसिंग मकान, प्लॉट, व्यवसायिक भवन, पार्क, अस्पताल, कम्युनिटी हाल तो जरूर कराएगा, लेकिन आवासों, प्लाटों और व्यवसायिक भवनों की रजिस्ट्री करने का अधिकार नगर निगम को होगा। इसके साथ ही अगर सहारा इंडिया हाउसिंग किसी भी शर्तों का उल्लंघन करती है तो इस करार निरस्त करने का अधिकार मुख्य नगर अधिकारी (नगर आयुक्त) को होगा। नगर निगम और सहारा इंडिया हाउसिंग के बीच हुए लगभग 23 साल पहले हुए इस करार के तहत अभी तक न तो कोई मकान, प्लॉट, व्यवसायिक भवन, पार्क, अस्पताल, कम्युनिटी हाल का निर्माण करवाया है और न ही नगर निगम  द्वारा निर्धारित किसी भी शर्त का अनुपालन किया है।

नगर निगम और नगर विकास विभाग के सूत्रों का कहना है कि भले ही सहारा इंडिया हाउसिंग ने करार के तहत किसी भी शर्त का अनुपालन नहीं किया है, लेकिन नगर विकास विभाग और नगर निगम के किसी भी अफसर की हैसियत नहीं है कि उस जमीन के बारे में कोई कार्रवाई कर सके। सहारा ग्रुप के मालिकानों के रिश्ते सरकार से काफी प्रगाढ़ हैं। इसके साथ ही तमाम नेता और नौकरशाह भी सहारा ग्रुप के आगे भीगी बिल्ली बने रहते हैं। ऐसे में गरीबों के साथ हुई धोखाधड़ी पर न्याय मिलने की उम्मीद कम है।

नगर आयुक्त राकेश कुमार सिंह ने इस संबंध में कहा कि उन्हें इस मसले की जानकारी नहीं है, सूचना प्राप्त करने के बाद ही कोई प्रतिक्रिया दी जा सकती है। प्रमुख सचिव नगर विकास पी.वी. पालीवाल ने भी इससे पल्ला झाड़ते हुए कहा कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है। सहारा ग्रुप के प्रवक्ता अभिजीत सरकार से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. दिव्‍य संदेश से साभार.

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