गाजियाबाद से आईपीएस नितिन तिवारी के जाने और धर्मेंद्र यादव के आने के मायने

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटा उत्तर प्रदेश का जिला गाजियाबाद हमेशा सुर्खियों में रहता है। राजनैतिक और आर्थिक रूप से सशक्त जिला गाजियाबाद राजनेताओं, नौकरशाहों, दौलतमंदों, बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों, फिल्म निर्देशकों, भू-माफियाओं, दबंगों सभी को खूब रास आता है। जमीन यहां सोना उगलती है तो गगनचुंबी इमारतें आसमानों से बातें करती है। विकास के नाम पर यहां सरकारी खजाने की खूब लूट होती है। यह सच्चाई है तो इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि विकास के मामले में यह इलाका राज्य से काफी आगे निकल गया है।

उत्तर प्रदेश में चाहें किसी भी दल की सरकार रही हो उसके लिये गाजियाबाद और गौतम बुद्धनगर (नोयडा) जिले हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। जहां सत्तारूढ़ दल के नेताओं की पसंद वाले अधिकारियों को ही पोस्टिंग मिलती है। कई मामलों में तो गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर को लखनऊ से भी अधिक महत्व मिला हुआ है। गाजियाबाद के कुछ थाने तो कमाई के मामले में देश में नंबर वन है। कहने को तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह यहां के सांसद हैं, लेकिन बसपा और सपा सरकारों के सामने वह कई मामलों में असहाय नजर आते हैं।

दोनों जिलों में दिग्गज नेता अपने पसंद के अधिकारियों को तैनाती देखना चाहते हैं, ताकि वह भी बंदबांट का हिस्सा बन सकें। यहां तैनात अधिकारी अपने आकाओें को ‘खुश’ रखना अपना फर्ज समझते हैं। इन जिलों मे सारा खेल सैटिंग-गैटिंग से होता है। पूर्ववती मायाराज में भी यहां भ्रष्टाचार की ‘गंगा’ बही थी और सपा राज में भी यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। अधिकारियों को यहां तैनाती के लिये काफी हाथ-पैर मारना पड़ता है और पोस्टिंग के बाद उसे बचाये रखने के लिये गोटे बिछानी पड़ती है।

समाजवादी सरकार ने भी यहां पूर्ववर्ती बसपा सरकार की ही तरह अपनी पंसद के अधिकारियों की तैनाती कर रखी है। बसपा राज में यहां कैप्टन साहब की मर्जी के बिना पत्ता नहीं हिल पाता था तो अखिलेश शासन में इन जिलों में अधिकारियों की तैनाती से लेकर सभी छोटे-बड़े फैसले सपा के प्रोफेसर और मैडम लेती हैं। दोनो में कौन कितना पॉवर फुल है, इसका अंदाजा किसी को नहीं है। यहां अधिकारियों की तैनाती में वरिष्ठता नहीं, वफादारी और बिरादरी देखी जाती है। यही वजह थी विगत दिनों गाजियाबाद के एसएसपी नितिन तिवारी को उनके पद से हटाया गया तो विपक्ष से लेकर आम जनता तक के कान खड़े हो गये।

सरकार की तरफ से कहा गया कि गाजियाबाद में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब थी, जिस कारण नितिन को हटाया गया, जबकि हकीकत यह थी कि सपा के प्रोफेसर साहब उनसे खुश नहीं थे। नितिन की जगह वरिष्ठता की परवाह न करते हुए 2006 बैच के आईपीएस अधिकारी धमेन्द्र यादव को गाजियाबाद का नया कप्तान आनन-फानन में बना दिया गया, इसकी खास वजह उनका एक खास बिरादरी से होना और सपा नेताओं के साथ करीबी बताई जा रही हैं, जबकि उनसे (धर्मेन्द्र) काफी सीनियर अधिकारियों को मेरठ रेंज के ही छोटे जिलों की कप्तानी से संतोष करना पड़ रहा है। 2000 बैच के आईपीएस अधिकारी राजू बाबू सिंह को बागपत और एके राघव को हापुड़, 2004 बैच के डा परमिंदर सिंह को गौतमबुद्धनगर, 2005 बैच के दीपक कुमार को मेरठ जैसे कम महत्वपूर्ण जिलों का भार मिला हुआ है।

गाजियाबाद की स्थिति यह है कि यहां के पुलिस महकमें में एक वर्ग विशेष का दबदबा बना हुआ है। यहां एसएसपी के पद पर धमेन्द्र यादव, एसपी सिटी के पद पर शिव शंकर यादव, अपर पुलिस अधीक्षक के पद पर किरण यादव की तैनाती पूरी कहानी बयां करने के लिये काफी है। इतना ही नहीं साहिबाबाद, इन्द्रपुरम और कवि नगर आदि थानों में 90 प्रतिशत पोस्टिंग एक वर्ग विशेष के अधिकारियों / कर्मचारियों को मिली हुई है। गाजियाबाद में जो अधिकारी तैनात होता है उसकी हनक-धमक लखनऊ तक में सुनाई देती है। उन्हें सत्ता का करीबी मानकर उनके साथ शासन-प्रशासन सभी सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते हैं। वैसे गाजियाबाद में पूर्व में तैनात एसएसपी नितिन तिवारी और प्रशांत कुमार के कार्यकाल में अपर पुलिस अधीक्षक की ही ज्यादा धमक थी, अब धमेन्द्र यादव की तैनाती के बाद किरण यादव कि कितनी हनक रहेगी यह वक्त बतायेगा, क्योंकि वर्चस्व की लड़ाई को लेकर घमासान लगभग तय है। 

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय से संपर्क 09335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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