गुड़िया रेपकांड (2) : आखिर क्या सोचकर बैठे हैं हम घरों में?

Alok Dixit : आज एम्स गया था। वही जाने पहचाने चेहरे प्रोटेस्ट करने के लिये पहले से मौजूद दिखे। पांच साल की एक मासूम बच्ची का इस तरह से रेप किया गया कि उसके पेट से मोमबत्तियां निकाली गईं, पर प्रोटेस्ट करने वाले वही चंद चेहरे। आखिर हम किस मानसिकता के साथ घरों में बैठे हैं? किस दिन का इंतजार कर रहे हैं कि एक जादू होगा और रेप अपने आप बंद हो जाएंगे या फिर रेप को रोकने के लिये कोई नया कानून आ जाएगा और फिर हमें अखबारों में बलात्कार की खबरें के लिये कोई नया कोना तलाशना होगा? क्या सोचकर बैठे हैं हम घरों में?

क्या हमें अब एक सोशल रिफार्म की पालिसी नहीं लानी चाहिये। अगर एक पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार होता है तो यह तो नहीं कहा जा सकता है कि उसमें कपड़े ठीक से नहीं पहने थे या उसका चाल चरित्र ठीक नहीं था। कानून पहले से ही मौजूद हैं हमारे पास, हिंसक हम हो नहीं सकते हैं। बताइये क्या मांग करें हम? जवाब नहीं सूझता? तो घर में बैठकर आप क्या साबित करने वाले हैं? टीवी देखकर सिस्सटम को गरिया नहीं रहे हैं आप? आपको भी पता है कि सिस्टम कुछ नहीं कर सकता। हैवानियत समाज में है तो सिस्टम में भी झलकेगी ही। बलात्कारी सरकार नहीं बल्कि समाज है। सरकारें तो समाज की ही देन हैं। मैं पूछता हूं इरादा क्या है आपका? इस खबर को पढ़कर अखबार के दूसरे पन्नों की तरफ मुह घुमा लेंगे या फिर फेसबुक पर फोटो टैग और शेरो शायरी पढ़ने के लिये होम पेज पर क्लिक कर लेंगे? आप स्पष्ट करें जरा।

सोशल एक्टिविस्ट आलोक दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *