गौरांग महाप्रभुओं के विरोध में एक संपादकीय लिखकर अखबार और संपादक दोनों महान हो जाते थे

हिंदी पत्रकारिता दिवस की आज फेसबुक पर चर्चा जोरों पर है। जुगल किशोर जी को याद किया जा रहा है। गांधी जी को महान पत्रकार बताया गया। तकनीकी विकास पर गर्व व्यक्त किया गया और मिशन बनाए रखने की अपील हुई। इन तमाम तथ्यों से स्वयं को संबद्ध करते हुए कहना चाहता हूं कि तब के दौर में पत्रकारिता सिर्फ गौरांग महाप्रभुओं के विरोध पर टिकी थी। उनके विरोध में एक संपादकीय लिखकर अखबार और संपादक दोनों महान हो जाया करते थे।

आज का दौर बहुत चुनौती और जोखिम भरा लगता है। पत्रकारिता में महान कहलाने का जमाना अब लद गया है। अब पैकेज को महान बनाने का दौर है। इसके लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। सूचनाओं के हमले के इस दौर में पत्रकार को बहुत अपडेट रहना होता है। अखबार समाज जीवन के हर क्षेत्र को समेटे हुए हैं। ऐसे में पत्रकार को भी विषय और क्षेत्र विशेष की विशेषज्ञता हासिल करने की चुनौती रहती है। प्रसार की गलाकाट व्यवसायिक प्रतिद्वंद्विता में खबर ब्रेक करने की मारामारी और विश्वसनीयता की चुनौती गजब है। अब आपकी एक खोजी रपट पहले तो अखबार के नीति नियंताओं के गर्भ में रहती है। उस दौर की प्रसव पीड़ा पत्रकार को झेलनी पड़ती है। यदि खबर जन्म ले ले और उसकी कुंडली के योग से विज्ञापन पर बाधा आ जाए तो नौकरी का संकट भी आ सकता है।

आज के संपादक उसी सत्य का संधान करते हैं, जिससे उनके हितों पर आंच न आए। संपादक भी कठपुतली है। उसे कोई तो वह रिपोर्टर को नचाता है। इन सब से अलग आंचलिक पत्रकार सबसे अधिक कठिनाइयों के दौर में रात-दिन जूझ रहे हैं। वेतन और सुविधाएं नाममात्र की, ऊपर से ग्राम प्रधान की तरह कभी भी उसका बस्ता जमा करा लिया जाता है पर सुदूर ग्रामीण अंचल की खबर ब्रेक वही करता है जिसका श्रेय बाद में मुख्यालय के तेज तर्रार खबर फ्राई करने में माहिर पत्रकार ले लेते हैं। सत्ता, अफसर, नेता, माफिया, दलाल, कमीशनखोर और इन सबके पालतू छुटभइयों से हर पल पत्रकार को बच कर रहना होता है। ऐसे में मुझे लगता है कि तमाम बुराइयों के बाद भी आज की हिंदी पत्रकारिता महान है।

वरिष्‍ठ पत्रकार जीतेंद्र दीक्षित एफबी वॉल से साभार.

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