मेरे पति अमिताभ ठाकुर उत्तर प्रदेश पुलिस के रूल्स एवं मैनुअल ऑफिस में एसपी हैं. वहाँ एक दूसरे एसपी राहुल अस्थाना ने 29 फरवरी की दोपहर ऑफिस के स्टेनो जयप्रकाश कनौजिया को खुलेआम माँ-बहन की गालियाँ दी और जम कर जलील किया. साथ ही वहाँ दफ्तर के सारे ग्लास भी दीवार पर मार कर फोड़ डाले. पूरे दफ्तर में कोहराम मच गया. स्टेनो कनौजिया इस बात से बहुत अधिक आहत हुए और वहीँ दफ्तर में फूट-फूट कर रोने लगे. उन्होंने मेरे पति को पत्र लिख कर तुरंत एफआईआर कराने की मांग की है. यह भी कहा है कि यदि इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं हुई तो वे विभाग में नौकरी नहीं कर पायेंगे. इस सम्बन्ध में मुझे भी जानकारी हुई तो मैंने एक ईमेल कई पत्रकार साथियों को भेजा.
इस पर लखनऊ स्थित कुंवर अशोक एस राजपूत, जो एडिटर/एक्जेक्यूटीव एडिटर/ न्यूज़ डेस्क, द पोलिटिकल एंड बिजनेस डेली हैं और जिनका ईमेल [email protected] तथा मोबाइल नंबर 9335243766 हैं, ने मुझे ईमेल भेजा- “थैंक्स फार मेलिंग मी. गज़ब फैंटेसी लिख मारी है. खबरों में रहने का एक ना एक बहाना मिलना चाहिए. बहुत खूब.”
मुझे इस मेल में जो बात सबसे अजीब और खराब लगी वह यह कि कथित वरिष्ठ पत्रकारगण भी कैसे बिना किसी घटना की सच्चाई को देखे अपना एक निर्णय बना लेते हैं और किसी व्यक्ति के प्रति अपने दिमाग में बनी एक सच्ची या झूठी धारणा के आधार पर खबरों के प्रति निष्कर्ष निकालने में लग जाते हैं. हो सकता है हमें खबरों में रहना अच्छा लगता हो. मैंने तो आज तक ऐसा एक आदमी नहीं देखा जिसे खबरों में रहना बुरा लगता हो, जिसे अखबार में अपना नाम और टीवी पर अपना चेहरा खराब लगता हो. लेकिन मात्र इस आधार पर कि कोई खबरों में बना रहता है, उसकी बात गलत मान ली जाए, क्या यह पत्रकारिता का सच्चा उसूल है?
क्या यह पत्रकारिता के पेशे से सरासर बेईमानी नहीं है? क्या यह अपने कर्तव्य से हटना नहीं है? क्या अशोक राजपूत का यह कर्तव्य नहीं था कि इस घटना के मर्म को समझते, इसकी विधिवत जानकारी लेते? हो सकता है घटना झूठी बताई गयी हो. पर यह भी हो सकता है कि घटना बिलकुल सच्ची हो. ऐसे में यदि यह घटना सच्ची है और एक आदमी को दूसरे आदमी ने सरेआम मात्र इसीलिए गालियाँ दी हैं क्योंकि वह उसका बॉस हैं तो क्या यह मानवाधिकार हनन का बहुत बड़ा मामला नहीं है? अशोक राजपूत ने संभवतः इस घटना के बारे में कोई तहकीकात नहीं की और घर बैठे निर्णय कर लिया.
यहाँ प्रश्न इस घटना और अशोक राजपूत का तो हैं ही, एक बहुत बड़ा प्रश्न पत्रकारिता के सरोकारों और पत्रकारिता के कर्तव्यों का भी है. इसीलिए अशोक राजपूत को मैंने एक ईमेल भेजा है, जिसे मैं आप लोगों के सामने भी रख रही हूँ. मैं जानती हूँ कि यह घटना सौ फीसदी सही है क्योंकि मैंने खुद भी इसकी तहकीकात की है पर मैं यह चाहूंगी कि अशोक भी इस घटना की जानकारी कर के इसके बारे में कुछ कहें. साथ ही मैं यह भी मानती हूँ कि एक पत्रकार के रूप में हमारा यह कर्तव्य होना चाहिए कि ऐसे मानवाधिकार हनन के गंभीर मामलों को जोरदार ढंग से उठाया जाए. अशोक राजपूत को भेजा मेरा ईमेल-
“अशोक जी, मैं आपको ठीक से नहीं जानती पर मुझे यह बात वास्तव में बड़ी अजीब लगी कि एक वरिष्ठ पत्रकार बगैर तथ्यों की जानकारी किये उसे झुठला कर अपने आप को क्या साबित करना चाहता है. मैं आपसे पूछती हूँ कि क्या आपने इस खबर की पुष्टि की? कोई पड़ताल की? यदि नहीं तो कैसे इसे फैंटेसी बता दिया? खबरों में बने रहना का शौक अलग बात है, खबरों की सत्यता अलग. अब अगर हम लोग, मैं और मेरे पति, तमाम काम करते रहते हैं तो खबरें तो बनती ही रहेंगी. लेकिन यदि मेरी भेजी एक बात भी झूठी हो तब ना आप ऐसी बात कहें. मुझे कष्ट हुआ कि आपने उस स्टेनो का दर्द, उसकी तकलीफ जानने की कोशिश नहीं की जिसे एक आईपीएस अधिकारी ने खुलेआम गाली दी और जिसका आज तक मुक़दमा तक दर्ज नहीं हुआ. क्या आपने उससे बात की? आपको उसका दर्द नहीं दिखा? यदि आपको या मुझे कोई इस तरह सरेआम माँ-बहन की गालियाँ दे और ग्लास फोड़े तब शायद बात समझ में आये. ज़रा लोगों का कष्ट भी पहचाना कीजिये, भाई साहब. यदि आप सच्चे पत्रकार हैं तो मैं आपके जमीर को ललकारती हूँ कि जा कर इस खबर की पुष्टि कीजिये, फिर इस तरह की टिप्पणी कीजिये. मुझे आपके जवाब का इन्तेज़ार रहेगा.”
डॉ. नूतन ठाकुर
सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार
लखनऊ






