चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं को ‘दृश्यांतर’ ने दी तगड़ी चुनौती

अजित राय बहुत साहसी, गुणी और संवेदनशील पत्रकार और संस्कृतिकर्मी हैं। सबसे बड़ी बात है कि कला और संस्कृति जगत की सारी विधाओं में उनकी दिलचस्पी और दखल रहती है, चाहे सिनेमा हो, रंगमंच हो, ललित कला हो, नृत्य-संगीत से लेकर साहित्य तक हर मोर्चे पर वे कहीं न कहीं अपनी भागीदारी करते दिखाई दे जाते हैं। लंबे समय तक उन्होंने साहित्य-संस्कृति के सभी पहलुओं की गहमागहमी को अंतरंग होकर समझा है।

समकालीन वरिष्ठ लेखकों, फिल्मकारों, पेंटरों और रंगकर्मियों के अंदर-बाहर को उन्होंने बार-बार झांककर देखा है। वे चाहें तो समसामयिक भारतीय संस्कृति की गहमागहमी के पर्दे के पीछे चलने वाले रंगारंग अभिनय को औपन्यासिक रूप में लिखकर बवंडर खड़ा कर सकते हैं, पर वे मित्रताओं और निजताओं का संवेदनशील सजगता और संयम के साथ निर्वाह करते हैं। ऐसे पत्रकार हिंदी में दुर्लभ हैं। ऐसी बहुमुखी प्रतिभा को दूरदर्शन ने अपनी मासिक पत्रिका दृश्यांतर का संस्थापक संपादक बनाकर एक तरह से जग जीत लेने जैसा काम किया है। सरकारी पत्रिकाएं तमाम संसाधनों के बावजूद जिस अधकचरेपन और मूक उपस्थिति को जाहिर करने को अभिशप्त हो जाती हैं, वह हाल दृश्यांतर का नहीं होने जा रहा है। हम आनेवाले समय में देखेंगे कि 'दृश्यांतर' दिल्ली से निकलने वाली चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं के समक्ष किस तरह की कठिन चुनौती पेश करती है।

वैसे अजित राय की जैसी बहुआयामी दिलचस्पी की झलक दृश्यांतर में दिखाई पड़ रही है, उसमें इसकी तो तुलना ही किसी से नहीं है। इसमें एक तरफ श्याम बेनेगल का साक्षात्कार, वही असगर वजाहत का अद्भुत नाटक- पाकिटमार रंगमंडल जो रंगमंच की दुनिया के अभाव और अंतरंग को व्यंग्यात्मक तरीके से सामने लाकर हमारी संवेदनाओं को झकझोर डालता है। यह नाटक रंगकर्मियों की बेचैनी, दुविधा, वेदना और जुगाड़ को जिस तरीके से उजागर करता है, वैसा प्रयास अब तक नहीं दिखाई पड़ा है। पिंजर और मोहल्ला अस्सी के बहाने मशहूर फिल्मकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी न सिर्फ सिनेमा और साहित्य के द्वंद्व और फिल्म निर्माण की बारीकियों को सामने लाते हैं बल्कि इन कृतियों में छुपे एक अनूठे पाठ को भी स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं।

सी. रामचंद्र और अनारकली से संबद्ध यतीन्द्र मिश्र का लेख भी हमें एक नये तरह के अनुभव से समृद्ध करता है। देवेन्द्रराज अंकुर ने रामगोपाल बजाज पर क्या खूब लिखा है, जो उनकी विकास यात्रा और स्वभाव को समझने में मदद करता है। कुल मिलाकर हर रचना बेजोड़ है। शिवमूर्ति जी ने अपनी माँ की बीमारी और निधन , फिर अपनी बीमारी पर लिखते हुए जीवन और मौत के दार्शनिक पक्षों को समझते दिखाई पड़ते हैं। पहली बार शिवमूर्ति जी की कलम से इतनी दार्शनिकता और वो भी संस्मरण के माध्यम से सामने आयी है। इसके कारण इस पत्रिका को तो लोग संभालकर रख लेंगे और अपने निराशा के समय में बार-बार पढ़ेंगे। विनोद भारद्वाज तो जब भी कोई चीज लिखते हैं, उसमें इतना जीवंत आवेग होता है कि उसे पढ़ते हुए सिनेमा देखने का अनुभव हासिल होता है। वे सचमुच हिंदी के आधुनिक और बोल्ड लेखक हैं।

अजित राय जी को कभी उनकी रचना प्रक्रिया और जीवन को जीने और समझने के समझने की प्रक्रिया को लेकर अनौपचारिक साक्षात्कार पेश करना चाहिये। तेजेन्द्र शर्मा तो कमाल के लेखक हैं ही। यहाँ उनका उपन्यास अंश पढ़ लीजिये- विल्जडन जंक्शन। आप भी उनके मुरीद हो जाएंगे। अदभुत प्रेम कथा है। और हां अपने राजेंद्र यादव जी को देखिये। भूत में वे औरत और मर्द के रिश्ते को जिस साहस से व्यक्त कर रहे हैं- ऐसा तो कोई भी युवा लेखक या लेखिका भी नहीं कर पा रही है। सत्येंद्र प्रकाश, उमेश चतुर्वेदी और मंजीत ठाकुर के लेख भी बहुत अच्छे हैं।

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की डायरी भी है, जिससे उनकी अलग ही संवेदनशीलता प्रकट होती है- उनकी राजनीतिक सजगता का यह रूप मैं पहले नहीं समझ पाया था। सचमुच बधाई के पात्र हैं अजित राय जी, पर इतना बेहतर काम करके वे बहुत से विघ्नसंतोषी पैदा कर लेंगे। बहुत लोग जिनका रचनात्मकता से कोई लेना-देना नहीं है, जो किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाते हैं या किसी लेखक संगठन में झंडा लिये साहित्य के मसीहा बने फिरते हैं- वे सब जरूर ही अजित राय के सामने भी बाधाएं पैदा करेंगे। उनसे भी साहस के साथ उन्हें जूझना होगा। कोई भी पत्रिका मैं इस तरह एक झटके में नहीं पढ़ पाता पर दृश्यांतर ऐसी पत्रिका ही है जिसे आप एक झटके में पढ़े बिना रह ही नहीं सकते।

लेखक हरे प्रकाश उपाध्याय युवा कवि और पत्रकार हैं. इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स में फीचर एडिटर के बतौर कार्यरत हैं. उसके पहले कादंबिनी समेत कई पत्रिकाओं-अखबारो में कार्य कर चुके हैं.


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