चलो चलें , क्योंकि समय बहुत कम है और हत्यायें बेहिसाब करनी हैं… (राणा यशवंत की दो कविताएं)

राणा यशवंत आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर रहे हैं. इन दिनों महुआ के ग्रुप एडिटर हैं. समय समय पर वे कविताएं, गीत, ग़ज़ल लिखा करते हैं. पेश है उनकी दो ताजी कविताएं…

1- मैं हत्यारा बनना चाहता हूं

मैं चाहता हूं भरे चौराहे पर उस दरिंदे को गोली मार दूं

जिसने स्कूल से आती

तीन साल की मासूम का बलात्कार किया है.

 

मैं उस बाग वाले की बांह काटना चाहता हूं

जिसने अमरूद की चोरी के लिये

एक टूअर-टापर बच्चे को

पीट पीटकर मार डाला है .

 

मैं उस जुलूसवाले को जिंदा जलाना चाहता हूं

जिसने भूख से लड़ते लोगों की खेप खरीदी

उन्हें उकसाया-भड़काया

और अब उनकी लाश पर अपनी गोटियां सेंक रहा है.

 

मैं उस मिलावटखोर की खाल उधेड़ना चाहता हूं

जिसने दूध को भी ज़हरीला बना दिया

गोद की गोद सूनी हो गई

और उसके फॉर्म हाउस पर रातभर दावत जमी रही.

 

मैं उस खादीवाले का ख़ून करना चाहता हूं

जिसने किसानों की खून-पसीने की मेहनत को

मंडी में कौड़ियों के मोल कर दिया

और दलालों-कारोबारियों से सोने की जूतियां ले गया.

 

मैं उस पुलिसवाले को बम से उड़ा देना चाहता हूं

जिसने एक बेकसूर की रिहाई के लिए

उसकी बेटी की चीख-सनी बोटियां रातभर नोचीं  

खबर छपी- गरीबी से आजिज परिवार ने नहर में कूदकर जान दी.

 

मैं उस हुज़ूर माई-बाप को बचे रहने देना नहीं चाहता

जिसने इंसाफ का बड़ी सफाई से ख़ून कर दिया

आस में उठी आंखें पथरा गईं

और गुनाह के घर में ठ़हाकों से भर गए.

 

हां मैं हत्यारा बनना चाहता हूं

मैं किसी को छोड़ना नहीं चाहता

अगर तुम्हें मेरा इरादा ठीक लगता है तो साथ आओ

हाथ मिलाओ, हथियार उठाओ और चल पड़ो

चल पड़ो क्योंकि हत्यायें ज्यादा करनी होंगी.

दुनिया में ये अपनी तरह की पहली क्रांति होगी

जिसमें हत्यारों से हज़ारगुना ज्यादा मरनेवाले होंगे .

इससे पहले कि हमारे इरादे की उन्हें खबर लगे

इससे पहले कि हमारे चारों ओर सायरन बजे

इससे पहले कि सलाखों के पीछे हमपर बूटें चलें

इससे पहले कि हमपर देशद्रोह का इल्ज़ाम लगे

चल पड़ो – कि आज कुछ कर गुज़रते हैं

सबसे पहले नामर्दी की हत्या करते हैं

भीड़ की मुर्दागीरी को मारते हैं

नपुंसक नारों, गद्दार इश्तहारों को मारते हैं

अपाहिज अवतारों, स्खलित विचारों को मारते हैं

चलो चलें , क्योंकि समय बहुत कम है

और हत्यायें बेहिसाब करनी हैं.


2- फेसबुक

सफेद चोटियों पर अभी अभी सुनहरी धूप गिरी है

टेबल पर रखे प्याले से भाप उठ रही है

बगल की कुर्सी पर एक दोस्त चौड़ा पड़ा है

तस्वीर के नीचे लिखा है- स्विटजरलैंड की वादियों में सुबह की कॉफी

मार्निंग इन पैराडाइज़ !!

रंगीन पत्तियों से लदे पौधों की लंबी कतार है

पीछे की हरी पहाड़ियों पर गहरा धुआं है

बीच की पगडंडी से पति संग इठलाती आती साहिबा हैं

पूछा है – ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है

एक मित्र का मोबाइल गुम हो गया है

सारे नंबर चले जाने पर बेचारा बड़ा रोया है

कई दोस्तों ने तरह तरह का मोबाइल-दर्द सुनाया है

लगे हाथ अपना नंबर भी बताया है

मसूरी में अभी अभी बारिश हुई है

दिल्ली से गये एक भाई की लॉटरी निकल आई है

आलू-प्याज के पकौड़ों संग ग्लास भर चाय की तस्वीर चिपकाई है

किसी महिला मित्र ने लिखा है- यार दिस इज़ नॉट फ़ेयर

कोई आधे सफर में है, कोई नये शहर में है

कोई अर्से बाद गांव पहुंचा है, कोई सगाई करके शहर लौटा है

एक ने हाथों की मेंहदी दिखाई है, दूसरे ने दिल की पीर सुनाई है

कुछ ने बड़े सवाल पर खुली बहस छेड़ी है, कईयों के बीच मेरी तेरी हुई पड़ी है

किसी ने पूछा है इस देश में नेताओं औऱ बाबाओं का क्या किया जाए ?

जवाब आया है – जहाज़ पर चढाकर हिंद महासागर में डुबो दिया जाए

भ्रष्टाचार पर हंगामा खत्म करने का कुछ ने रखा है अनोखा नुस्खा

भई क्या कुछ ले-देकर ये नहीं निपट सकता ?  

एक मित्र ने सालों पुरानी ग्रुप फोटो लगाई है

सालों बाद उन लम्हों की याद आई है

प्राइमरी स्कूल के मेरे मास्टर साहेब कितने बूढ़े हो गये हैं

वो और उनका पोता दोनों मेरे फ्रैंड हो गये हैं

जो छूट गये थे कहीं वो फिर मिल गये हैं

जिनसे मिले नहीं कभी वो भी जुड़ गये हैं

पूछना नहीं है, पता सब रहता है

देखा नहीं लेकिन पहचाना रहता है

हाल और चेहरों का सिलसिला सा चलता है

जगह और रास्तों पर मशविरा सा चलता है

जीत औऱ जश्न की खुशियां यहां साझा हैं

तरक्की और तमगों पर बधाइयां ज्यादा हैं

जिंदगी का हर रंग लिए पल पल बदलता संसार है

फेसबुक, जाने-अनजाने चेहरों, नाम-अनाम रिश्तों का अंतहीन विस्तार है.


राणा यशवंत से संपर्क yashwant71@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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