चाटुकारों से घिरे राहुल और कांग्रेस के हाथों से फिसलता उत्‍तर प्रदेश

‘कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश को उसका सही स्थान दोबारा प्रदान करेगी।’ विधानसभा चुनाव-2012 के दौरान कांग्रेस द्वारा जारी दृष्टि पत्र विजन डाक्युमेंट के पहले पन्ने की शुरुआत इसी पंक्ति से हुई थी, लेकिन उत्तर प्रदेश को सही स्थान दिलाने के सपने दिखाने वाले कांग्रेस युवराज राहुल गांधी पार्टी को भी सही स्थान दिलाने में सफल नहीं हो पाये। नव उत्तर प्रदेश 2020 नामक 22 पृष्ठों के दृष्टि पत्र में कांग्रेस ने न्याय, अधिकार और विकास की बात की थी, लेकिन दर्द बढ़ता गया, ज्यूं-ज्यूं दवा की तर्ज पर राहुल गांधी ने यूपी में जितना ज्यादा ध्यान लगाया हालात उतने और खराब हुए।

विधानसभा चुनाव के नतीजे इसके गवाह हैं। प्रदेश में निकम्मे नेताओं की टोली से घिरे कांग्रेसी युवराज का मिशन इस कदर फ्लाप रहा कि वो अपनी मां सोनिया गांधी और खुद अपने संसदीय क्षेत्र के कुल दस विधानसभा सीटों में से आठ गंवा बैठे। ये हालात तब है जब विधानसभा चुनाव से पूरे पांच साल पहले वो यूपी को दिन-रात नापे रहे। विधानसभा चुनाव में बहन-बहनोई के अलावा भाजा-भांजी भी मामा और नानी की पार्टी के लिए वोट मांगते दिखे। राहुल की काबिलियत जगजाहिर है। जयपुर चिंतन शिविर ने राहुल को पार्टी में नंबर दो की पोजीशन दिलवाई। अब वो कांग्रेस उपाध्यक्ष की हैसियत से पार्टी के नव निर्माण और ढांचा बदलने की प्रक्रिया में जुटे है, अब उनका निशाना लोकसभा चुनाव हैं। लेकिन दिल्ली की गद्दी का रास्ता जिस राज्य उत्तर प्रदेश से जाता है उसमें पार्टी विधानसभा चुनाव के बाद से ही आईसीयू में लेटी है और युवराज के चाटुकार सिपाहसिलार उन्हें पीएम बनाने के बयान देकर, लैपटॉप में सकरात्मक आंकड़ें जुटाकर उन्हें खुश करने में लगे हैं। राहुल भी शायद हार के करंट से पूरी तरह उबरे नहीं है और उन्होंने खुद को अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी तक बांध रखा है।

राहुल के इलाज से देश के सबसे बड़े राज्य जहां से 80 सांसद संसद का मान बढ़ाते हैं, पार्टी की हालत सुधरने की बजाय बिगड़ रही है। गुटबाज और जमीन से पूरी तरह कटे नेताओं को राहुल की कड़वी दवाई रास नहीं आ रही है और वो उसे गटकने की बजाय कुल्ली कर बाहर उड़ेल रहे हैं। करीब 23 वर्ष पूर्व कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री के नाम पर नारायण दत्त तिवारी का नाम जेहन में उभरता है। उसके बाद से पार्टी प्रदेश की राजनीतिक पटल से पूरी तरह गायब ही है। 1989 के विधानसभा चुनाव में राज्य के 425 सीटों मे से कांग्रेस ने 94 सीटें जीती थीं। उस समय जनता दल 208 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल था। प्रदेश की राजनीति में भाजपा और बसपा ने 1980, और समाजवादी पार्टी ने 1996 में पर्दापण किया था। वो अलग बात है कि बसपा के अलावा भाजपा और सपा के नेता भारतीय जन संघ (बीजेएस) और जनता दल, जनता पार्टी और लोकदल के रूप में प्रदेश की राजनीति से गहरे से जुड़े थे। लेकिन आज राज्य की राजनीति लगभग दो दशक पुरानी सपा और बसपा के इर्द-गिर्द ही घूमती है। और किसी जमाने में राज्य की राजनीति की सिरमौर कांग्रेस वर्तमान में हाशिये पर है।

कमोबेश भाजपा भी निचले पायदान पर है। राम मंदिर आंदोलन के गुबार से सत्ता के सिंहासन तक पहुंची भाजपा का उत्थान और पतन वन टाइम मैजिक था। कांग्रेस ने देश और प्रदेश पर सबसे लंबे समय तक राज किया है। इतिहास के पन्ने खंगाले तो 1969 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 211, 1974 में 215, 1977 में 47, 1980 में 308, 1985 में 269, 1989 में 94, 1991 में 46, 1993 में 28, 1996 में 33, 2002 में 25, 2007 और 2012 में क्रमशः 22 और 28 कांग्रेस विधायक विधानसभा की चौखट लांघ पाए। 1977 में देश भर में कांग्रेस का तख्ता हिलाकर जनता दल ने केन्द्र में सरकार बनायी थी, उसका असर यूपी में भी दिखा था। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र जहां 47 सीटों पर संतोष करना पड़ा वहीं जनता पार्टी के खाते में कुल 425 सीटों में से रिकार्ड तोड 352 सीटें गई। वरिष्ठ पत्रकार और कांग्रेस की राजनीति पिछले लंबे से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप उपाध्याय कांग्रेस के पतन के बारे में टिप्पणी करते हैं कि, असल में भाजपा, सपा और बसपा ने आम आदमी की नब्ज को पकड़ने का काम किया जबकि कांग्रेस का हाथ आम आदमी से दूर होता चला गया। वहीं कांग्रेस की सत्ता का केंद्र लखनऊ की बजाय दिल्ली बन गया और प्रदेश के नेता केन्द्रीय नेतृत्व को लगातार गुमराह करते रहे।

2004 में भारतीय राजनीति में उतरे और अमेठी से सांसद बने राहुल गांधी नेहरू-गांधी परिवार के वंशज होने के साथ देश के सबसे बड़े और अधिक समय तक राज चलाने वाली पार्टी कांग्रेस के उपाध्यक्ष हैं। पार्टी और उनके सहयोगियों के गठबंधन यूपीए की डोर उनके मां और रायबरेली से सांसद सोनिया गांधी के हाथ में है। राहुल के राजनीति में उतरने के ऐलान पर पार्टी और देश की जनता में उत्साह का माहौल था। लेकिन पिछले लगभग एक दशक में पार्टी भले ही देश की सत्ता पर काबिज हो लेकिन राज्यों में पार्टी की पकड़ लगातार कमजोर हो रही है और इस एक दशक में पार्टी की लोकप्रियता का ग्राफ भी गिरा है। देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने के वंशज राहुल से भी देश की जनता विशेषकर युवाओं का बुरी तरह मोहभंग हुआ है। यूपी विधान सभा के दौरान मिशन 2012 की तैयारियों की जिस जोश-खरोश के साथ उन्होंने बिगुल फूंका था वो असर छोडने मे कामयाब नहीं हो पाया। विधानसभा चुनाव के दौरान जारी नव उत्तर प्रदेश-2020 कांग्रेस की दृष्टि पुस्तिका के पृष्ठ संख्या 22 पर राहुल गांधी समेत जिन 12 अन्य नेताओं की तस्वीर प्रकाशित हुई थी उन्होंने मिशन 2012 को मोशन में आने से पहले ही मटियामेट कर दिया।

पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह, सांसद पीएल पुनिया, बेनी प्रसाद वर्मा और सलमान खुर्शीद ने अपने वचनों और कर्मोँ से पार्टी की इज्जत को तार-तार किया। विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी को हटाकर फैजाबाद के सांसद डॉ. निर्मल खत्री को प्रदेश की कमान सौँपने के अलावा कोई बड़ा काम जमीनी स्तर पर नहीं किया है। राहुल और उनकी बहन प्रियंका ने पार्टी की बुरी हालत के बाद भी अमेठी और रायबरेली पर सारा ध्यान लगा रखा है। लोकसभा चुनाव को लेकर जिस तरह सपा और बसपा संजीदा दिख रहे हैं वैसी हलचल दूर-दूर तक कांग्रेस खेमे में दिखाई नहीं देती है। लैपटॉप में आंकड़ें जरूर जोड़े और घटाएं जा रहे हैं। प्रदेश में पार्टी कई गुटों में बंटी हुई है और उठापटक का दौर जारी है। वरिष्ठ पत्रकार एंव राजनीतिक विशलेषक रजनीकांत वशिष्ठ कहते हैं कि, असल में कांग्रेस में जमीनी नेताओं के स्थान पर हवाहवाई नेताओं को तरजीह उसकी इस हालत के लिए जिम्मेदार है, वहीं चापलूसी भी चरम पर है।

वर्तमान में प्रदेश से पार्टी के 22 सांसद है यानी सपा के बराबर। 1999 एंव 2004 में क्रमशः 10 और 9 सांसद थे। यह आंकड़ा कांग्रेसियों की आत्मसंतुष्टि के लिए काफी हो सकता है लेकिन पिछले चार वर्षों में राज्य की राजनीतिक स्थितियां काफी बदली हैं। 2009 में कल्याण सिंह को पार्टी में शामिल करने से समाजवादी पार्टी से प्रदेश के मुस्लिम मतदाता बुरी तरह नाराज थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत की सरकार चला रही है और मुस्लिम वोटर उसके पालने में झूला झूल रहे हैं। वहीं विधानसभा चुनाव में चोट खाई भाजपा ने निकाय चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर खुद को आईसीयू से बाहर निकाला है, वहीं उत्तर प्रदेश के राजनाथ को पार्टी की कमान सौंपकर भाजपा ने राज्य के राजनीतिक समीकरण बदलने की चाल चली है। कल्याण सिंह भाजपा में आने का ऐलान कर चुके हैं, और वरूण गांधी पर पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भड़काऊ भाषण देने के मामले में बरी हो चुके हैं। उमा भारती, विनय कटियार और योगी आदित्यनाथ की टीम आम चुनाव के लिए तैयार की जा रही है।

बसपा भी आम चुनाव में कोई कसर छोडने के मूड में नहीं है। सोनिया गांधी के खिलाफ उम्मीदवार की घोषणा कर वो अपने इरादे साफ कर चुकी है। समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव की नजर तो दिल्ली के तख्त पर उसी दिन से टिकी है जिस दिन उन्होंने प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार की कमान अपने पुत्र अखिलेश को सौंपी थी। अखिलेश ने प्रदेश के तमाम दूसरे युवा नेताओं को लोकप्रियता के मामले में पीछे छोड़ा है और वो युवा नेता के तौर पर प्रदेशवासियों विशेषकर युवाओं की प्रथम पसंद बनकर उभरे हैं। लबोलुबाब यह है कि राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए मुश्किलें दिन ब दिन बढ़ रही है और जमीनी हकीकत से आंखें मूंदे राहुल फिलवक्त भी अमेठी को अमेरिका बनाने की घोषणाएं करने से बाज नहीं आ रहे हैं। प्रदेश में आखिरी कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री रहे वरिष्ठतम कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी मुलायम-अखिलेश की आवभगत का पिछले कई महीनों से लुत्फ उठा रहे हैं और मुंह बंद रखकर भी कांग्रेस की फिजां बिगाड़ने का काम कर रहे हैं।

प्रदेश के कई कांग्रेसी नेता दबी जुबान में बताते हैं कि राहुल गांधी और पूरी गांधी परिवार को प्रदेश के कुछ नेताओं ने अपने प्रभाव में ले रखा है और राहुल ऊपरी तौर पर जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को तरजीह देने की बात तो करते हैं लेकिन टिकट वितरण से निर्णय लेने तक हर मामले में हवाहवाई नेताओं की ही सुनवाई होती है। जमीनी नेता और कार्यकर्ता नारे लगाने, झण्डा फहराने, दरी, कुर्सी बिछाने तक ही सीमित है। विधानसभा चुनाव में पार्टी पर्यवेक्षकों द्वारा तैयार रिपोर्ट ने राहुल और सोनिया के संसदीय क्षेत्र की दस में आठ सीटें गंवा दी बावजूद इसके राहुल चापलूस, हाईटेक और आंकड़ेबाज नेताओं की भीड़ से घिरे हैं। राहुल और कांग्रेस ने हाईकमान ने चाहे जानबूझकर स्थितियों से आंखें फेर और बंद कर रखी हैं लेकिन प्रदेश के नेता इससे अनजान नहीं है। पार्टी के कई वर्तमान सांसद सुरक्षित सीटें ढूंढने और कांग्रेस की डूबते जहाज से कूदकर साइकिल और हाथी की सवारी करने की तैयारी में हैं।  

प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि, असल में राहुल अपने वादों के पक्के नहीं है, वहीं जब भी देश के सामने कोई बड़ा संकट आया वो परिदृश्य से पूरी तरह गायब ही रहे। उनकी राजनीतिक समझ उतनी ही है जितनी उनके आसपास रहने वाले नेता उन्हें अपने फायदे के लिए समझाते-पढ़ाते हैं। कांग्रेस में कारपोरेट कल्चर हावी है जमीन से उसका दूर-दूर तक नाता नहीं है। राहुल ने विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तेवर के साथ विरोधी दल के घोषणा पत्र को फाडने का नौटंकी की बजाय उन तेवरों को प्रदेश की जनता की भलाई में लगाते तो शायद तस्वीर कुछ और होती। आम चुनाव की घंटी कभी भी बज सकती है लेकिन प्रदेश की राजधानी लखनऊ में माल एवेन्यू स्थित पार्टी कार्यालय में छायी मायूसी और उदासी से इसका रती भर अंदाजा भी नहीं लगता है। राहुल पार्टी की प्रदेश में खोई जमीन वापस पाने के लिए कौन सी योजना बना रहे हैं वो तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन फिलवक्त तो बाजी उनके हाथ से फिसलती लग रही है।

लेखक‍ डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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