चिराग तले उजाला कभी नहीं होता लेकिन चिराग के बिना अंधेरा मिट नहीं सकता

दिल्ली दरियागंज यूं तो बेहद गतिशील इलाका जहां ठहराव का नामोनिशान तो दूर-दूर तक नजर नहीं आता है. लेकिन मुझे तो वहीं ठहरना था, मिलना था ऐसे इंसान से जिसकी कलपना में चमक-दमक भरी दुनिया का शोरगुल नहीं, जिसकी तपस्या में समन्दर सी गहराई तो दिखी लेकिन कोई मेनका नहीं. उसकी सोंच अर्जुन की तरह अपने लक्ष्य पर टिकी थी. उसमें ना तो बादशाह बनाने की ख्वाहिश दिखी और न ही गुलाम बनकर जिंदगी जीने की आदत दिखी.
 
बहरहाल जब मैने फोन किया भाई साहब मुझे आपसे मिलना है तो उन्होंने कहा कल मिलते हैं. मैंने कहा मैं दरियागंज में हूँ तो उन्होंने कहा ठीक है पास वाली गली में आप बैंक के पास चले आइए मैं आपसे मिल लेता हूँ. मुलाक़ात हुई साथ में चाय पिया. चाय पीने के दौरान हम लोग बात करते रहें चाय ख़त्म हो गई और हम चहल कदमी करते हुए पहुँच गए एक पान की दुकान पर उसने बिना कुछ कहे एक पान खिलाई और एक बांध दिया. बाते करते हुए हमलोग पहुँच गए भाई साहब के दौलत खाने में. पहली नजर में समझ में आ गया क्या क्या नायाब चीज छुपा रखा है. इनके दौलत खाने में छोटा सा दफ्तर, बालकनी के सामने निर्जीव क़स्बा और अन्दर सिंगल बेड कई कहानियां बयां कर रही थी. बार-बार सवालों के तीर भेदने पर वह गंभीर विषय पर तो चर्चा करते रहें लेकिन न तो चेहरे के भाव में कोई परिवर्तन दिखा, न ही आवाज़ में कोई बदलाव नज़र आया. बातों-बातों में गुजरे हुए समय में उन पलों में कहीं खो जाते हैं. जिसका दुःख तो है लेकिन अफसोस नहीं. शायद कोई आम आदमी इतना कुछ गवां कर कब का जहाने पानी को अलविदा कह देता लेकिन उनकी रूहानी सोंच जिंदगी को जीने और गम को पीकर आगे बढ़ने के लिए हौंसला देती रही. 
 
बात-बात में उन्होंने अपने जीवन के ऐसे स्मृतियों का भी जिक्र किया जिसको मैं चाह कर भी यहां नहीं लिख रहा हूँ ऐसा नहीं कि मुझे मना किया गया हो लेकिन मुझे लगता है कुछ चीजें यदि पर्दे में रहें तो ज्यादा खूबसूरत होती हैं. "लोग कहते है यह शहर है लेकिन मेरा दिल है जो कभी इस बात को मानता ही नहीं, मुझे तो यह क़स्बा सा लगता है”. मोहब्बत कभी हुई नहीं और दुश्मनी के लिए वक्त ही नहीं. इन चंद लफ्जों में मानों उन्होंने अपनी जिन्दगी की दास्तां को समेटने कि कोशिश की हो. अक्षरधाम मंदिर से लौटकर जिस शीर्षक को चुना वह कब मकसद बन गया और मकसद कब मिशन बन गया पता ही नहीं चला. इसे वह इत्फ़ाक मानते तो आज मंजर कुछ और ही होता, लेकिन न तो उनका मन इसे इतफ़ाक मानने को तैयार है और नहीं कुदरत ने अब तक उनके जीवन में ऐसा कोई करिश्मा ही किया जो उनके इरादे को डगमगा दे. वैसे भी नींव की ईंट को न तो उजाला नसीब होता है और न ही तारीफ़. हां जब निर्जीव कौम अपने किए कर्मों में उलझ जाती है तब इतिहास इन्हें टटोलता है और इन्हीं नींव की ईंटो में अपने बेजान सवालों को ढूंढता है, तब उसे कंगूरे की खूबसूरती याद नहीं आती, याद आता है तो बस अंधेरे में डूबी नींव जिस पर टिका होता ख्वाहिंशो का महल. वैकल्पिक मीडिया को शोषित समाज की आवाज़ बनाने के लिए बहुत कुछ करना अभी बाकी है. क्योंकि यदि सही दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो कब यह मीडिया भी शोषित समाज से छिन जाएगा पता ही नहीं चलेगा.
 
वैकल्पिक मीडिया के चमत्कार के बारे में बात करते वक्त उनकी आँखों में फ़तह की चमक दिखी मानो यह संजीवनी बहुत बड़ा चमत्कार कर सकता है. लेकिन दूसरे पल इस मीडिया का गलत इस्तेमाल किए जाने की सोंच ने उनके माथे पर लकीरें खींच दी. चेहरे पर ऐसा बदलाव तब नहीं दिखा जब बातें कर रहे थे, अपने निजी जीवन की. यह तपस्या है, प्रेम है, या कर्म मुझे नहीं मालूम लेकिन जब मैंने पूछा आखिर संजय तिवारी की मंजिल क्या है तो जवाब था वैकल्पिक मीडिया को शोषित समाज की आवाज़ बनाने के लिए शिद्दत से कोशिश करना, बीच में टोकते हुए जब मैंने सवाल किया विस्फोट डॉट कॉम की मंजिल क्या तो जवाब मिला विस्फोट होकर इतने टुकरे में बिखर जाए के जहां मेरी नजर पड़े वहां शोषित समाज की आवाज़ बुलंद हो. मुझे विस्फोट के टुकड़े होने पर उतना गम नहीं होगा जितना वैकल्पिक मीडिया के विकास पर ख़ुशी होगी. बातों बातों में वक्त कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला हम लोग फिर उसी चाय की दुकान पर आ गए और चाय पी अब चाय का मजा भी बदल चुका था और मेरा मिजाज भी मिलने का वायदा कर जब चला तो यह गीत के बोल सुनाई दी- प्यार से भी जरुरी कई काम है, प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए. कुदरत का निजाम समझने के लिए इशारा काफी होता है. यानी रौशनी देने वाले चिराग के तले उजाला कभी नहीं होता लेकिन चिराग के बिना अंधेरा मिट भी नहीं सकता.
 
अब्दुल रशीद पत्रकार हैं. इनसे सम्पर्क aabdul_rashid@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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