चीनी प्रधानमंत्री के आश्वासन हैं कितने भरोसे लायक!

चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग के दोस्ताना रुख से यूपीए सरकार को फौरी राहत मिलती दिखाई पड़ने लगी है। क्योंकि, ली की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह काफी मजबूती से अपना पक्ष चीन के सामने रखने में कामयाब रहे हैं। भारतीय दबाव के चलते ही कई विवादित मुद्दों पर चीन ने सकारात्मक रुख अपनाया है।

ब्रह्मपुत्र नदी में बनने वाले विवादित बांधों सहित कई मुद्दों पर पड़ोसी देश ने परस्पर संवाद करने की सहमति जताई है। यहां तक कि सीमा-विवाद के मामलों में भी चीनी प्रधानमंत्री ने कह दिया है कि इसके लिए एक विशेष दल बनेगा, जो कि समय-समय पर विवादित मुद्दों को सुलझाने के रास्ते तलाशेगा। पिछले दिनों लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में चीन के सैनिकों ने घुसपैठ कर ली थी। भारतीय सीमा में करीब 19 किमी अंदर आकर चीनी सैनिकों ने पांच कैंप तक लगा लिए थे। दो सप्ताह पहले ही विवादित कैंप हटाए गए हैं। इस प्रकरण को लेकर दोनों देशों के रिश्ते काफी तल्ख होने लगे थे। लेकिन, चीन के ताजा रुख में काफी बदलाव देखा जा रहा है।

चीन के नए प्रधानमंत्री ली केकियांग ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को ही चुना। वे रविवार को दिल्ली आए थे। रविवार की शाम चीनी प्रधानमंत्री ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अनौपचारिक बातचीत की थी। पहली मुलाकात के दौरान ही मनमोहन सिंह ने चीनी प्रधानमंत्री से भारत की चिंता के मुद्दे स्पष्ट कर दिए थे। साफ-साफ कह दिया था कि जब तक सीमा-विवाद सुलझाने का कोई कारगर इंतजाम नहीं होता, तब तक भारत-चीन के रिश्तों के बीच संशय की एक दीवार जरूर बनी रहेगी। ऐसे में जरूरी है कि दोनों देश औपचारिक रूप से यह संकल्प जताएं कि फिर से सीमा-विवाद इतने उग्र नहीं होने दिए जाएंगे कि रिश्तों में तमाम कड़वाहट घुल जाए। इस पर चीनी प्रधानमंत्री का रुख काफी नरमी का रहा।

सोमवार को दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच औपचारिक बातचीत हुई। इसमें भी मनमोहन सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि सीमा-विवाद हल करने के लिए कोई पुख्ता सिस्टम बना दिया जाए। जिससे कि विवाद के मुद्दों पर ‘संवाद’ का रास्ता खुला रहे। कुछ ऐसी नदियां हैं, जो दोनों देशों में बहती हैं। इनमें खासतौर पर ब्रह्मपुत्र नदी पर बनने वाले कुछ बांधों को लेकर भारत की चिंता रही है। क्योंकि तिब्बत क्षेत्र में चीन ने इस नदी पर कुछ बड़े बांध बना लिए हैं। इससे पूर्वोत्तर राज्यों में नदी जल का बहाव गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। विरोध जताने के बाद भी चीन का रुख ठीक नहीं रहा। आम तौर पर भारत को यही जबाव मिलता रहा कि जो बांध बनाए जा रहे हैं, वे चीन की सीमा में हैं। ऐसे में, भारत इन पर सवाल नहीं उठा सकता। लेकिन, दिल्ली की इस ताजा यात्रा के दौरान चीन का रुख बदल गया है।

कल, दोनों देशों के बीच 8 महत्वपूर्ण मुद्दों पर समझौता हो गया है। ये मुद्दे वीजा, जल संसाधन व कारोबार से जुड़े हुए हैं। समझौते का जो करार हुआ है, उसमें ब्रह्मपुत्र नदी पर बने नए बांधों का खास तौर पर हवाला दिया गया है। चीनी प्रधानमंत्री ने भारत को स्पष्ट रूप से आश्वासन दे दिया है कि तिब्बत इलाके में बने जिन बांधों पर आपत्ति की जा रही है, उन पर भी चीन पूरी जानकारी देगा। करार में यह भी व्यवस्था की गई है कि अब कोई नया बांध बनाया जाएगा, तो चीन बाकयदा भारत को पूरी सूचना देगा। वह यह आश्वासन भी देगा कि इन परियोजनाओं से भारत के हितों का कोई नुकसान नहीं होगा।

चीनी प्रधानमंत्री ने दोनों देशों के बीच कारोबार बढ़ाने के लिए ज्यादा जोर दिया। उन्होंने यह इच्छा जाहिर की कि 2015 तक दोनों देशों के बीच व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुंचे, तो अच्छा रहेगा। पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच 66 अरब डॉलर का व्यापार हुआ है। जबकि, 2011 में व्यापार का यह आंकड़ा 74 अरब डॉलर रहा था। दरअसल, रिश्तों को सुधारने के पीछे चीन का खास एजेंडा अपना व्यापार बढ़ाने का रहा है। क्योंकि, उसे अपना तमाम माल खपाने के लिए भारत एक बड़ा बाजार दिखाई पड़ता है। जबकि, चीन से बढ़े व्यापार को लेकर सरकार से लेकर भारत का औद्योगिक जगत तक चिंतित है। क्योंकि, इधर लगातार चीन से होने वाला आयात बढ़ रहा हौ। जबकि, भारत से इसकी तुलना में काफी कम निर्यात हो रहा है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2011 में भारत-चीन के बीच जो व्यापार हुआ, उसमें भारत को 27 अरब डॉलर का व्यापारिक घाटा रहा। जबकि, पिछले साल भारत का व्यापारिक घाटा 29 अरब डॉलर तक पहुंच गया। क्योंकि, भारत के बाजार में चीन का माल ज्यादा आया। जबकि निर्यात में बढ़ोत्तरी नहीं हो पाई। सोमवार को कारोबारी मुद्दे पर जो करार हुआ है, इसमें कुछ ऐसी व्यवस्था की गई हैं कि नए क्षेत्रों में भी भारतीय कंपनियों को चीन में निर्यात का ज्यादा सुगम रास्ता मिले। इसके लिए चीन ने काफी उदारता का रुख भी अपनाया है।

जल संसाधन और कारोबारी मुद्दों पर करार के अलावा पाक और अफगानिस्तान से जुड़े कुछ रणनीतिक मामलों में भी आपसी समझदारी बढ़ाने की बात हुई है। उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान से पश्चिमी देशों की सेनाएं अगले साल तक वापस हो जाएंगी। इस स्थिति को लेकर भारत के साथ चीन भी सुरक्षा मुद्दों को लेकर चिंतित है। दरअसल, आशंका यह की जा रही है कि पश्चिमी देशों की सेना हटने के बाद कहीं अफगानिस्तान में फिर से आतंकवादी ताकतों का बोलबाला दोबारा न हो जाए। चीन भी इस मामले में चिंतित माना जा रहा है। क्योंकि, अफगानिस्तान में हालात खराब हुए, तो उसके मुस्लिम बाहुल्य राज्य केकियांग की स्थिति प्रभावित हो सकती है। चीन ने पहल की है कि पाक, अफगानिस्तान, बांग्लादेश व म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों के मामलों में दोनों देश रणनीतिक साझेदारी करने का मन बनाएं। भारत ने भी चीन की इस इच्छा का विरोध नहीं किया है।

लेकिन, रक्षा मामलों के विशेषज्ञ भरत वर्मा का सवाल है कि भारत को जल्दबाजी में चीन पर इतना विश्वास करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि, अपने तमाम वायदों से मुकर जाने का ‘बीजिंग’ का इतिहास रहा है। वैसे भी चीन में नया नेतृत्व सत्ता में आया है। प्रधानमंत्री ली केकियांग ने भी मार्च में ही अपना पद संभाला है। ऐेसे में, अच्छा यही रहेगा कि नए नेतृत्व की दशा और दिशा को ज्यादा से ज्यादा समझा जाए। ऐेसे में, सीमा-विवाद से जुड़े मामले और कारोबारी मामलों में तेजी से पहल तो की जा सकती है, लेकिन दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी नहीं हो सकती।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार फिर दोहराया है कि सीमा पर शांति, अच्छे रिश्तों की बुनियाद है। उन्होंने चीनी प्रधानमंत्री के रुख पर काफी संतोष व्यक्त किया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यब्रत चतुर्वेदी का मानना है कि चीन की हर पहल पर संशय करने की जरूरत नहीं है। लद्दाख क्षेत्र में सीमा-विवाद तो 1950 से चला आ रहा है। ऐसे में, यह कल्पना नहीं की जा सकती कि रातों-रात यह विवाद एक दम हल हो जाएगा। अब यदि चीन इस विवादित मामले में एक समझौता तंत्र बनाने की बात कर रहा है, तो इसे सकारात्मक रूप में ही लेने की जरूरत है। चीनी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता हांग ली ने कल यहां यह कहा कि चीन की यह इच्छा है कि भारत-चीन के बीच रिश्ते ज्यादा बेहतर हों। ताकि, पूरी दुनिया में संदेश जा सके कि ये दोनों महान देश अपने आपसी विवाद समझदारी से निपटाने में सक्षम हैं। वैसे भी दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग के अपार मुद्दे हैं, जबकि विवाद के महज मुट्ठीभर मुद्दे ही हैं।

उल्लेखनीय है कि लद्दाख के दौलत बैग ओल्डी सेक्टर में चीनी सैनिकों की घुसपैठ से भारत में चीन के खिलाफ काफी गुस्सा भड़का था। लेकिन, कूटनीतिक तरीके से भारत सरकार ने यह मामला सुलटा लिया है। चीनी सैनिक 15 दिन पहले वापस चले गए थे। 9 मई को विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद बीजिंग यात्रा पर गए थे। सलमान ने चीन से वापस आते ही कहा था कि विवाद के सभी मुद्दों पर चीन का रुख नरम है। भारत ने चीन से अपनी सभी चिंताएं जता दी हैं। साफ बता दिया है कि सीमा पर विवाद का टंटा बना रहा, तो कारोबारी रिश्तों में भी प्रतिगामी असर जरूर पड़ेगा। चीन के प्रधानमंत्री आज मुंबई पहुंच रहे हैं, वे वहां पर फिक्की सहित कई कारोबारी संगठनों के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे। इस मौके पर चीन से आया एक औद्योगिक प्रतिनिधि मंडल भी इसमें हिस्सेदारी करने वाला है। यहां राजनीतिक और राजनयिक हल्कों में इंतजार है कि मुंबई में दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों को लेकर चीनी प्रधानमंत्री क्या रुख अपनाते हैं? चीनी प्रधानमंत्री ली की पहली भारत यात्रा के साथ ही यह बहस भी शुरू हो गई है कि भारत को दिए चीन के ताजा आश्वासन कितने विश्वसनीय हो सकते हैं?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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