चीन की इस धींगामुश्ती का मतलब!

पड़ोसी मुल्क चीन बीच-बीच में धींगामुश्ती पर उतारू हो जाता है। लेकिन, इस बार चीन की ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ (पीएलए) ने लद्दाख सीमा में घुसपैठ की तमाम हदें पार कर दी हैं। भारतीय सीमा में करीब 10 किलोमीटर अंदर आकर यह घुसपैठ की गई। खतरनाक बात यह है कि इस बार पीएलए के घुसपैठिए भारतीय सीमा से वापस लौटने को तैयार नहीं हैं। 10 दिन हो गए हैं।

भारत सरकार चीन के हुक्मरानों से तमाम अनुरोध कर रही है। लेकिन, ‘ड्रैगन’ का रवैया मैत्रीपूर्ण नहीं है। पिछले दिनों दो बार लद्दाख की सीमा क्षेत्र में दोनों फौजों के कमांडर ‘फ्लैग मीटिंग’ कर चुके हैं। लेकिन, ये बेनतीजा रही हैं। क्योंकि, चीनी सेना के हुक्मरान इस बात पर ही अड़े हैं कि घुसपैठ वाला क्षेत्र उनकी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के अंदर आता है। पड़ोसी की इस उलटबासी ने दिल्ली की चिंता ज्यादा बढ़ा दी है।

दरअसल, 15-16 अप्रैल की रात में पीएलए की एक टुकड़ी ने लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी (डीओबी) सेक्टर में घुसपैठ करनी शुरू की थी। भारतीय सीमा की निगरानी कर रही आईटीबीपी (इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस) की एक टुकड़ी ने इन्हें रोकने के लिए फायरिंग भी की थी। लेकिन, घुसपैठिए पूरी सैन्य तैयारी से आए थे। ऐसे में, इन्हें रोका नहीं जा सका। अगले दिन मिलिट्री खुफिया सूत्रों ने दिल्ली जानकारी भेजी कि पीएलए के करीब 40 हथियारबंद जवानों ने डीओबी सेक्टर में तीन बड़े टेंट लगा लिए हैं। ये सब वहीं पर जमे हैं। इस जानकारी के बाद केंद्र सरकार के कान खड़े हुए।  उसने राजनयिक चैनल का इस्तेमाल करके बीजिंग से अनुरोध किया कि पीएलए के घुसपैठियों को तुरंत वापस कराया जाए। वरना, दोनों देशों के रिश्ते खराब हो सकते हैं।

18 अप्रैल को दोनों फौजों की कमांडर स्तर की पहली फ्लैग मीटिंग भी हुई। लेकिन, इसमें कोई बात नहीं बन पाई। जब मीडिया में इस गंभीर घुसपैठ की तमाम विस्तार से जानकारी आई, तो भारत के अंदर भी राजनीतिक हलचल तेज हुई। इसके चलते भारत ने अपना दबाव बढ़ाने की कोशिश की। रक्षामंत्री ए के एंटनी ने बयान जारी किया कि वे पड़ोसी मुल्क के दादागीरी वाले अंदाज को बर्दाश्त नहीं करेंगे। अच्छा यही रहेगा कि चीन जल्द से जल्द अपनी गलती सुधार ले। यहां उम्मीद की जा रही थी कि दूसरी फ्लैग मीटिंग में यह मामला एक हद तक सुलझ जाएगा। मंगलवार को लद्दाख के चुथुल के पास दूसरी फ्लैग मीटिंग हुई। इसमें भारत की तरफ से एक बिग्रेडियर रैंक के अधिकारी ने नेतृत्व किया। जबकि, चीन की ओर से यह भूमिका एक वरिष्ठ कर्नल ने निभाई।

हैरानी की बात यह है कि इस मीटिंग में भी चीनी कमांडरों ने यही कहा कि भारत की दावेदारी गलत है। जिस क्षेत्र में पीएलए के टेंट लगे हैं, वह चीन के नियंत्रण में पहले से ही रहा है। ऐसे में, घुसपैठ का कोई मामला है ही नहीं। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने भी यही दोहरा दिया है कि भारतीय सीमा में कोई घुसपैठ नहीं की गई है। इस अड़ियल रवैए से भारत सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। हालांकि, विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद यही कह रहे हैं कि यह मामला द्विपक्षीय बातचीत से सुलझा लिया जाएगा। उन्हें बीजिंग के हुक्मरानों की नीयत पर कोई संदेह नहीं है। विदेश मंत्री ने यह भरोसा जरूर जताया है। लेकिन, विपक्षी दल के नेता सरकार के इस लचर रवैए से खुश नहीं हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने यही कहा है कि देश की सीमाएं हर हाल में सुरक्षित रहनी चाहिए। देश की जनता से वास्तविकता छिपाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उनका आरोप है कि यूपीए की सरकार हर मोर्चे पर विफल हो रही है। इसी के चलते चीन भी धींगामुश्ती करने का दुस्साहस कर रहा है। जरूरी हो गया है कि पड़ोसी मुल्क को कड़ा संदेश दिया जाए।

भारत-चीन की नियंत्रण रेखा करीब 4057 किलोमीटर लंबी है। जबकि, चीन कई बार इस जमीनी हकीकत को नकारकर कह देता है कि भारत-चीन की सीमा महज 2000 किमी तक सीमित है। दरअसल, वह कश्मीर से लगी सीमा के बारे में गलतफहमी फैलाने की कोशिश करता है। पीएलए ने भारतीय सीमा में कोई पहली बार घुसपैठ का कारनामा नहीं किया है। इसके पहले भी कई बार घुसपैठ की गंभीर कोशिशें हो चुकी हैं। 1986 में अरुणाचल के सुंदराग चू सेक्टर में पीएलए ने बड़ी घुसपैठ की थी। कई किमी के क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने कब्जा जमा लिया था। उल्लेखनीय है कि चीन के हुक्मरान बीच-बीच में अरुणाचल की जमीन पर अपना दावा जताते रहते हैं। वे इसे दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताते हैं। लंबी जद्दोजहद के बाद 1995 में चीन ने अरुणाचल का अपना अवैध कब्जा खुद खाली किया था। उस दौर में यहां दावा किया गया था कि भारतीय कूटनीति की यह ऐतिहासिक विजय है। लेकिन, 1995 के बाद भी घुसपैठ की घटनाएं लगातार जारी रही हैं।

चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ दिसंबर 2010 में भारत की यात्रा पर आए थे। दिल्ली में उन्होंने सच्ची दोस्ती की तमाम दुहाई दी थी। यह भरोसा दिया था कि सिक्किम, अरुणाचल व लद्दाख सेक्टरों की सीमाओं में कोई बड़ा विवाद नहीं होने दिया जाएगा। छोटे-छोटे विवाद सेना के कमांडर्स फ्लैग मीटिंगों में ही तय कर लेंगे। उन्होंने दिल्ली को पक्का आश्वासन दिया था कि भारत के लोग बीजिंग पर पूरा भरोसा कर सकते हैं। यह बात चीनी नेता ने   उस दौर में कही थी जबकि दोनों देशों के बीच ‘स्टेपेल्ड वीजा’ के बहुचर्चित विवाद पर काफी तनाव हो चुका था। उल्लेखनीय है कि 2005 में दोनों देशों के बीच एलएसी के सभी विवादों को निपटाने के लिए एक द्विपक्षीय करार हुआ था। लेकिन, चीनी ‘ड्रैगन’ लगातार इस समझौते की अवमानना करता आया है।  

रिटायर मेजर जनरल जीडी बख्शी का मानना है कि इस बार घुसपैठ के मामले में चीन का जो रवैया है, वह काफी खतरनाक है। अब जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार इस कठिन चुनौती को मजबूती से निपटाने का दमखम दिखाए। वरना, चीन इससे भी बड़ी हरकत पर उतारू हो सकता है। 1962 में चीन ने ही सीमा के सवाल पर भारत के ऊपर युद्ध थोपा था। उससे समय भी चीन के नेता ‘भाई-भाई’ का जुमला उछालकर झांसा देते रहे थे। अच्छी बात यह है कि रक्षामंत्री एंटनी ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। सेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह ने लद्दाख क्षेत्र का दौरा करके जायजा भी ले लिया है।  

पिछले दिनों इटली के नौसैनिकों के बहुचर्चित मामले में भारत सरकार ने काफी दमदारी दिखाई थी। हालांकि, इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट का काफी दबाव था। लेकिन, भारतीय दबाव के चलते इटली सरकार को झुकना पड़ा था। उसने आरोपी नौसैनिकों को भारत वापस भेज दिया था। उम्मीद करनी चाहिए कि भारत सरकार ‘ड्रैगन’ की ताकत से ज्यादा हिचकेगा नहीं। क्योंकि यह मुद्दा सीमाओं की सुरक्षा से जुड़ा है। यह अलग बात है कि चीन की सैन्य तैयारी हमारे मुकाबले काफी ज्यादा है। हमारे यहां सैन्य ताकत करीब 13,25,000 की है। जबकि, पड़ोसी मुल्क में यह संख्या 22,55,000 की है। हमारे यहां परमाणु हथियारों की संख्या 50-70 के बीच मानी जाती है। जबकि, बीजिंग की यह ताकत 200 से ज्यादा वारहेड की मानी जाती है। इस सच्चाई के बावजूद हम इतने सक्षम तो हैं ही कि अपनी सीमाओं की रक्षा ताकतवर चीन से भी कर सकें। जरूरत इस बात की है कि मनमोहन सरकार इस मुद्दे पर किसी तरह का लचर रवैया न अपनाए। ऐसे में, केंद्र सरकार की अग्नि परीक्षा है कि वह फुफ्कार रहे ‘ड्रैगन’ की हरकतों को काबू में करे। वरना, देर हो सकती है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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