चुनाव आते ही मध्य प्रदेश में न्यूज चैनलों की भरमार

टीवी पत्रकारिता किसकदर पैसे वालों की गुलाम हो गई है इसा सीधा सादा उदाहरण मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में देखने को मिल रहा  है….ऐसा लगता है चुनाव करीब आते हैं उद्योगपतियों में न्यूज चैनल खोलने की होड़ लगी हुई…एक के बाद एक चैनल खुलते जा रहे हैं….पर चुनाव के बाद जब ये बंद होंगे तो पता नहीं कितने पत्रकारों को बेरोजगार करके जाएंगे…एक समय ता जब मध्यप्रदेश में सिर्फ दो न्यूज चैनल हुआ करते थे…सहारा और ईटीवी…..2008 में प्रदेश को साधना के रुप में तीसरा चैनल मिला….

यहां तक भी ठीक था पर 2013 में मध्यप्रदेश में एक दर्जन से ज्यादा न्यूज चैनल हो गए हैं और कुछ आने वाले हैं……चुनाव करीब आते हैं नेशनल मीडिया के बड़े नामों ने मध्यप्रदेश में अपने फायदे के लिए पैसा लगा दिया….कई नेशनल चैनल ने रीजनल चैनल खोल दिए…जैसे ZEE न्यूज मध्यप्रदेश…इंडिया न्यूज मध्यप्रदेश….पी-7 मध्यप्रदेश….. इसके बाद पांच साल से जी छत्तीसगढ़ के रुप में काम कर रहे गोयल ग्रुप के चैनल IBC 24 ने भी फायदा देखते हुए इसका विस्तार मध्यप्रदेश में कर दिया…कुकुरमुत्ते जैसे चैनलों का आया यहां भी बंद नहीं  हुआ….बिल्डर और कॉलेज चलाने वाले जिन्हे पत्रकारिता का अ और ब नहीं आता उन्होने भी चैनल खोल लिए…..जैसे बंसल न्यूज…विजन वल्ड…न्यूज वल्ड….

इसके बाद प्रदेश में अखबार चलाने वाले ग्रुप भी चैनल ला रहे हैं…जिनमे राज एक्सप्रेस वालों का राज इंडिया…..फाइन न्यूज पेपर वालों का फाइन न्यूज….TRUE SOLDER NETWORK वालों का TSN न्यूज शामिल हैं… सहारा..ईटीवी..साधना…जी और इंडिया न्यूज को छोड़कर बाकी सारे चैनल नियमों को ताक पर रखे  हैं….चैनलों में 5-10 हजार में पत्रकार बंधुआ मजदूरी कर रहा है….सरकारी नियम केमुताबिक न पीएफ काटा जाता न ही टैक्स दिया जाता…सही मायने में चैनल ऑन रिकार्ड ये बता ही नहीं रहा कि उसकी संस्था में कितने कर्मचारी है….कोई सिस्टम ही नहीं है…सहारा..ईटीवी.साधना…जी और इंडिया न्यूज को छोड़कर बाकी सारे चैनल सिर्फ सरकार का गुणगान करते हैं…जनसंपर्क से विज्ञापन चलाने के लिए मोटी रकम मिल जाती है…..और फिर दिनभर पत्रकारिता के नाम पर नंगा नाच किया जाता है और मुख्यमंत्री की तारीफों को पुल बांधे जाते हैं….

चुनाव के पहले चैनल लाने के पीछे मकसद भी यहीं होता है कि चुनावी सीजन में पैसा कमा लें….बाद में चैनल रुपी दुकान बंद कर देंगे….रही बात पत्रकारों के बेरोजगार होने की तो होने दो…पत्रकार तो फुटबाल बन गया है जो चाहे लात मार दे…. फिलहाल इन चैनलों में कई चुनावी कार्यक्रम चालू हो गए हैं…जैसे कौन बनेगा विधायक…किसकी होगी सरकार…..सरकार का रिपोर्ट कार्ड….अब जनता की बारी है…..इन कार्यकर्मों को भी धंधा बना लिया गया है…विधायक और मंत्रियों के मोटी रकम लेकर उनका इंटरव्यू दिखाया जाता है…और साथ में खुद का पीआर बनता है सो अलग….. मैं भड़ास के माध्यम से सिर्फ ये अनुरोध करना चाहता हूं कि मध्यप्रदेश की तरफ चुनाव आयोग और इंडियन प्रेस काउंसिल थोड़ा ध्यान दें…चुनाव के पहले न्यूज चैनल नेताओं की जागीर बन गए हैं….चाहे तो दूरसंचार मंत्रालय से मध्यप्रदेश का रिकॉर्ड निकवा लें तो आपको पता चल जाएगा कुछ चैनल तो सिर्फ मुख्यमंत्री और जनसंपर्क मंत्री के तलवे ही चाटते रहते हैं…फिलहाल मध्यप्रदेश के पत्रकारों की बल्ले बल्ले हैं….घर से बुला बुलाकर नौकरी दी जा रही है…पर चुनाव बाद जब ये चैनल बंद होंगे तो इनको पूछने वाला कोई नहीं होगा…..

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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