चुनाव सर्वेक्षण की हेरा-फेरी और पाबंदी के तर्क

ओपिनियन पोल करने वाली कपंनियां पहली बार इस तरह कठघरे में खड़ी हुई हैं। मीडिया और संपूर्ण पत्रकारिता की निंदा में लगे लोगों को यह ध्यान रखना होगा कि जो सच आपने देखा, उसे भी एक टीवी चैनल के पत्रकारों की टीम ने ही उजागर किया। चुनाव सर्वेक्षण और उसका गोरखधंधा जिस तरह से हमारे लोकतंत्र और मीडिया का एक सच है, उसी तरह उसका भंडाफोड़ करने वाला स्टिंग ऑपरेशन भी एक सच है।

सर्वेक्षण करने वाली कई कंपनियां हमारे यहां सक्रिय हैं, जिनके काम की ईमानदारी और नैतिकता पर हमेशा से ही सवाल उठते रहे हैं। कभी नीयत पर प्रश्न उठते रहे हैं और कभी बाजार की स्पर्धा में मुनाफा कमाने के लिए किसी भी हद तक चले जाने की प्रवृत्ति पर। जवाब में ये कंपनियां अपनी साख की बात करती हैं। साख की सतर्कता टीवी के ताजा खुलासे में भी झलकती है। इनमें ज्यादातर कंपनियों ने 2-3 प्रतिशत तक ही मार्जिन देने या 10 को 13 सीट दिखा देने तक की बात की। कुछ ने पूरे सर्वेक्षण में दो तीन को बेहतर दिखाने के आग्रह को भी ना-नुकर के बाद स्वीकार किया। यह भी कहा कि हमारी साख का प्रश्न है, इसलिए हम एकदम एकपक्षीय नहीं दिखा सकते। हालांकि कुछ ने मन-माफिक परिणाम दिखाने की बात स्वीकार कर ली, उसके तरीके भी बताए।

सर्वेक्षण में हेराफेरी एक तरह का पेशेवर अपराध है। यह हेराफेरी भले ही मामूली हो, लेकिन इससे अपराध छोटा नहीं हो जाता। यह खुलासा हमें इसलिए ज्यादा भयभीत करता है, क्योंकि चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राणवायु हैं और उसे विकृत करना लोकतंत्र के प्रति अपराध है। यह अपराध चाहे धन के लिए हुआ हो या अन्य किसी कारण से। जो जीतने वाला है, उसे हारने वाला और जो हारने वाला है, उसे जीतने वाले बता देते हैं, तो इसका असर मतदाताओं पर पड़ता है, और पार्टियों पर भी। और शायद चुनावी गठजोड़ पर भी। लेकिन सिर्फ इस आधार पर जनमत सर्वेक्षणों को प्रतिबंधित करने की मांग से सहमत होना कठिन है। भ्रष्टाचार, बेईमानी, चालबाजी का अर्थ उस विधा का गला घोंट देना नहीं है। अपराध करने वाले को सजा देना जरूरी है, लेकिन जनमत सर्वेक्षण पर रोक अंत में लोकतंत्र के लिए भारी साबित हो सकती है।

सर्वे पर पाबंदी की बात कई बार चुनाव आयोग ने की है, लेकिन उसके पीछे कोई ठोस तर्क नहीं रहा। न्यायालय भी इसकी संभावना को नकार चुका है। दुनिया के सभी सफल लोकतंत्रों में ऐसे सर्वे होते हैं। व्यक्तियों या कुछ संगठनों की बुराई को पूरी प्रक्रिया की बुराई मान लेना बहुत बड़ी गलती होगी। जरूरी यह है कि सर्वेक्षण और उसे करने वाली कंपनियों के लिए मानक बनाए जाएं। योग्यता तय हो, रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था हो, ताकि अपराध साबित होने पर मान्यता रद्द की जा सके। पूर्ण पाबंदी का तर्क तो पूरी तरह लोकतंत्र विरोधी है।

लेखक अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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