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चैनल झऊआ भर मगर खबर कहीं नहीं दिखती

कमोवेश ये स्थिति उत्तर प्रदेश की तो है ही. हर जिले में थोक के भाव से चैनलों के माइक आईडी किसी न किसी कैमरामैन के झोले में मिल जायेंगे. पहले इन्हें स्ट्रिंगर कहते थे, मगर अब तो ज्यादातर इस नाम के लायक भी नहीं. जो हाल जिले स्तर पर कभी साप्ताहिक या संध्या दैनिक अखबारों का हुआ करता था, आज वही हाल टीवी चैनलों का हो चला है.

कमोवेश ये स्थिति उत्तर प्रदेश की तो है ही. हर जिले में थोक के भाव से चैनलों के माइक आईडी किसी न किसी कैमरामैन के झोले में मिल जायेंगे. पहले इन्हें स्ट्रिंगर कहते थे, मगर अब तो ज्यादातर इस नाम के लायक भी नहीं. जो हाल जिले स्तर पर कभी साप्ताहिक या संध्या दैनिक अखबारों का हुआ करता था, आज वही हाल टीवी चैनलों का हो चला है.

सुबह होते ही एक कैमरामैन झोले में एक कैमरा और 7-8 टीवी चैनलों की आई डी लेकर निकल पड़ता है. सुबह की शुरुआत डीएम दफ्तर के बाहर से शुरू होती है. और शाम किसी कैफे से ख़त्म होती है. कैमरामैन का काम वीडियो शूट करना है, खबर से कोई पंचायत नहीं. होली दिवाली कभी कोई हंगामा का शाट बन गया तो चैनल की फटाफट खबरों में चल गया वर्ना सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के अलावा कोई नतीजा नहीं.

चार साल पहले की बात है. बड़े चैनलों पर क्षेत्रीय खबरों का प्रतिशत अच्छा खासा होता था. आजतक, जीन्यूज़, आईबीएन7, एनडीटीवी, इंडिया टीवी जैसे चैनलों में दो चार जिलों में एक रिपोर्टर/स्ट्रिंगर होता था. खबर के लिए रिपोर्टर गाँव गली से लेकर कई जिलों के मुख्यालयों की दौड़ लगा देता था. कई दिन तक खबर पर शोध और शूटिंग करता था. कई सौ किलोमीटर की दौड़ मोटर साइकिल से कर मौका वारदात से विजुअल इकट्ठे करता और स्टोरी करता था. कभी ये स्टोरी चैनलों पर हंगामा मचाती थीं. गाँव का दर्द झलकता था. तब भुगतान भी अच्‍छा खासा मिलता था.

सभी बड़े चैनल 1200 से लेकर 2500 रुपये प्रति स्टोरी देते थे. अब कीमत 200 से 500 रह गयी है. वो भी मिलेगी या नहीं इसका भी भरोसा नहीं. लिहाजा छोटे कस्बो या जिलों के गंभीर पत्रकारों ने भी अब इस टीवी के पेशे से मुंह मोड़ लिया है. शादी विवाह में कैमरा चलाने वाले कई स्ट्रिंगर टीवी के पत्रकार हो गए हैं. क्या होगा कल के टीवी का भविष्य. कभी छोटे कस्बों और जिलों में टीवी चैनल का खूब कर्ज बढ़ा था, मगर अब दौर बदल चुका है.

लेखक पंकज दीक्षित पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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