चैनल बन रहे शांति-सुरक्षा के लिए खतरा, टीआरपी के लिए भावनाएं भड़का रहे

क्या न्यूज चैनल, सचमुच, लोकतंत्र और इस उपमहाद्वीप में शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बनते जा रहे हैं? यह सवाल पिछले दिनों जब भारत-पाक सीमा पर दो भारतीय सैनिकों के सिर काटे जाने की बर्बर घटना के बाद चैनलों पर पाकिस्तान के खिलाफ युद्धोन्माद चरम पर पहुँच गया था, तब प्रतिष्ठित जर्नल ‘इकनामिक एंड पोलिटिकल वीकली’ (ई.पी.डब्ल्यू) ने अपने संपादकीय में उठाया था.

यह सवाल इस सन्दर्भ में उठाया गया था कि चैनलों की पाकिस्तान के खिलाफ उत्तेजक, दुराग्रह की हद तक आक्रामक, अतार्किक, भावुक और अंध-राष्ट्रवादी एजेंडे से प्रेरित रिपोर्टिंग और प्राइम टाइम बहसों/चर्चाओं के कारण देश में एक ऐसा विषाक्त जनमत तैयार हो गया है कि उसके साथ तनावपूर्ण संबंधों को सामान्य बनाने की गुंजाइश कम से कम होती जा रही है. इसकी ताजा मिसाल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ की अजमेर की निजी यात्रा की न्यूज चैनलों पर कवरेज के दौरान देखने को मिली. अशरफ परिवार सहित अजमेर-शरीफ की जियारत पर आए थे.

हालाँकि जयपुर हवाई अड्डे पर पाक प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए कोई केन्द्रीय मंत्री या राज्य के मुख्यमंत्री मौजूद नहीं थे लेकिन प्रोटोकॉल के तहत भारतीय विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद ने जयपुर के एक होटल में उनका स्वागत किया और उन्हें दोपहर भोज दिया. लेकिन अधिकांश न्यूज चैनलों को यह पसंद नहीं आया. चैनलों की शिकायत यह थी कि पाकिस्तान ने अभी तक दो भारतीय सैनिकों के सिर नहीं लौटाए हैं. ऐसे में, पाक प्रधानमंत्री का स्वागत कैसे किया जा सकता है?

यही नहीं, टी.आर.पी के पैमाने पर हिंदी के टाप तीन चैनलों में से एक की सवालिया सुर्खी थी कि राजा अशरफ का होटल में हाथी-घोड़ों से स्वागत किया गया. इसी तरह की सुर्खियाँ और भी चैनलों पर थी. आखिर मुकाबले में कोई पीछे कैसे रह सकता है? नतीजा, चैनलों ने पाक प्रधानमंत्री की इस निजी यात्रा के खिलाफ हल्ला सा बोल दिया. खबरों में बार-बार दो सैनिकों के सिर काटे जाने से लेकर मुंबई में २६/११ के आतंकवादी हमले और ताजा हैदराबाद ब्लास्ट को उछाला जाता रहा. दूसरी ओर, चैनलों के चर्चाकार पाकिस्तान से दोस्ती की बात तो दूर उससे किसी भी तरह के संबंध के खिलाफ तर्क पेश करते रहे.

मजे की बात यह है कि एक ओर चैनल पाकिस्तान निंदा में जुटे थे और पाक प्रधानमंत्री के सीमित स्वागत से भी नाराज थे, वहीँ दूसरी ओर उनकी यात्रा की व्यापक कवरेज के लिए सुबह से ही दिल्ली और जयपुर से लेकर अजमेर तक अपने वरिष्ठ संवाददाताओं को उतार रखा था और स्टूडियो में विदेश नीति और रक्षा विशेषज्ञों को बैठकर यात्रा के अर्थ खोजने में जुटे थे. सवाल यह है कि अगर वे इस यात्रा से सहमत नहीं थे तो उसे इतनी कवरेज देने की क्या जरूरत थी? उन्होंने इस यात्रा का बहिष्कार क्यों नहीं कर दिया? जाहिर है कि वे खुद के बनाए पाकिस्तान विरोधी माहौल को भुनाने में पीछे नहीं रहना चाहते थे.

असल में, चैनलों के लिए यह देशहित और राष्ट्रवाद से ज्यादा त्वरित टी.आर.पी का मामला है. उन्हें मालूम है कि देश में पाकिस्तान विरोधी माहौल बना हुआ है जिसमें पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक रिपोर्टिंग और बहसों से अच्छी टी.आर.पी मिल सकती है. यह सही है कि पाकिस्तान में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है. यह भी सही है कि वहां ऐसे तत्वों की संख्या अच्छी-खासी है जो भारत विरोधी भावनाएं भड़काकर अपनी रोटी सेंकते और राजनीति चलाते हैं. लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही सही है कि वहां आम जनता और सिविल सोसायटी का एक बड़ा हिस्सा भारत से दोस्ती और अमन-चैन के हक में है. हालाँकि यही बातें कमोबेश भारत पर भी लागू होती हैं लेकिन चिंता और अफ़सोस की बात यह है कि भाजपा-शिव सेना जैसे दलों और हिंदी-अंग्रेजी के कई बड़े चैनलों ने पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान के खिलाफ अहर्निश अभियान से उसकी इकहरी छवि बना दी है.

इससे देश के अंदर ऐसा विषाक्त जनमत बन गया है जिसमें पाकिस्तान के साथ तनाव घटाने या संबंधों को सुधारने के लिए कोई नई कूटनीतिक पहल करने की गुंजाइश लगातार सिकुड़ती जा रही है. सवाल यह है कि इससे किसे फायदा हो रहा है? क्या यह स्थिति इस उप-महाद्वीप की शांति-सुरक्षा को खतरे में नहीं डाल रही है? सवाल यह भी है कि मौजूदा माहौल में आखिर दो परमाणुशक्ति संपन्न देश कब तक इस तनाव के हाथ से निकलने के खतरे को टाल सकते हैं? अफ़सोस चैनल टी.आर.पी से आगे देखने को तैयार नहीं हैं. 

लेखक आनंद प्रधान आईआईएमसी में प्रोफेसर हैं.

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *