छंटनी के दिन आईबीएन आफिस में मैनेजमेंट ने बाउंसर बहाल कर रखा था

Vineet Kumar : IBN7 के हमारे एक साथी ने बातचीत के दौरान एक साथी ने साझा किया कि जिस दिन उनलोगों से इस्तीफा( जाहिर है बिना उनकी मर्जी के) लिया जा रहा था, उस दिन मैनेजमेंट ने ऑफिस परिसर में बाउंसर बहाल कर रखे थे. मैनेजमेंट को भी पता था कि हम गलत कर रहे हैं और हो न हो इसका विरोध मीडियाकर्मी करेंगे. अब ऐसे में इधर विरोध शुरु करें कि उधर हमारे बाउंसर उन्हें उसी तरह धकिया देंगे, कूटना शुरु करेंगे जैसे इज्जतदार सभाओं में गुंडे-मवालियों के घुसने पर किया जाता है. आप जरा सोचिए कि इस चौथे खंभे की दूकान चलानेवालों की निगाह में दिल-दिमाग को कहीं और छोड़कर, बैल की तरह खाप लगाकर उनके मुताबिक काम करनेवाले मीडियाकर्मी उनकी निगाह में क्या हैं और वो उनके लिए किस स्तर पर जाकर सोचते हैं ?

Vineet Kumar : जितने पैसे देकर लोग मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थानों की मीडिया दूकान में पत्रकार बनने की ट्रेनिंग लेते हैं, उसे अगर बैंक में जमा कर दें और सालभर किसी सरकारी संस्थान से पढ़ाई करें तो कोर्स खत्म होते-होते सिर्फ ब्याज के पैसे से एक ठीक-ठाक पत्रिका निकालने की हैसियत में होंगे. मेनस्ट्रीम मीडिया के मीडिया स्कूल अपने छात्रों को ट्रेनिंग और फर्स्ट हैंड एक्सपीरिएंस के नाम पर उन्हें बंधुआ मजदूर बनाकर छोड़ देते हैं. उनसे लाखों में फीस लेते हैं और आए दिन जो उनके कार्यक्रम होते हैं, अपने अखबार या चैनल की टीशर्ट पकड़ाकर जमकर काम लेते हैं. माफ कीजिएगा, इसमे सबसे ज्यादा बुरी हालत गर्ल्स स्टूडेंट की होती है. उनका काम आए अतिथियों,मंत्रियों को बुके देने, चाय-नाश्ते का इंतजाम करने और मोमबत्ती जलाने के लिए माचिस आगे बढ़ाने से ज्यादा का नहीं होता. उनसे ऐसे कोई भी काम नहीं कराए जाते जो कि पत्रकारिता के हिस्से में आते हों और जो आगे चलकर उन्हें इसकी बारीक समझ विकसित करे. उन्हें प्रशिक्षु पत्रकार की नहीं, निजी कंपनी में रिस्पेशसनिस्ट या एटेंडर की ट्रेनिंग दी जाती है. ये काम तो वो स्कूल के ही दिनों से करती आयीं होती है और फिर इस तरह की सेवाटहल का काम तो सदियों से उसके जिम्मे में थोप दिया गया है.

Vineet Kumar : मेनस्ट्रीम मीडिया के अखबारों औऱ चैनलों ने मीडिया स्कूल की जो दूकान खोली है, आप कोशिश करके एक सूची बनाएं कि अब तक किस संस्थान ने कितने छात्रों को मीडियाकर्मी की ट्रेनिंग दी है और उनमे से कितने लोगों को नौकरी पर रखा.आपको प्रोफशनलिज्म और हन्ड्रेड परसेंट प्लेसमेंट के बड़े-बड़े दावों के बीच का सच निकलकर सामने आ जाएगा. आपको लगता है कि ये अखबार और टीवी चैनल के धंधे में लगे संस्थान जब मीडिया स्कूल नाम से दूसरी दूकान खोलते हैं तो प्रोफेशनल पैदा करते हैं जिन्हें खबर, कैमरे,प्रोडक्शन आदि की बेहतरीन समझ होती है..वो क्या ट्रेनिंग देते हैं,ये तो हमें स्क्रीन और अखबार के पन्ने पर दिखाई देता ही है लेकिन वो एकमुश्त बेरोजगारों की फौज खड़ी करते हैं. मसलन पिछले बैच में टीवी टुडे नेटवर्क ने कुल 35 लोगों को टीवीटीएमआई में दाखिला लिया और सिर्फ 4 लोगों को प्लेसमेंट दी. इस बार कुल 95 लोगों को लिया है, अभी उनके कोर्स शुरु होने के एक ही दिन हुए हैं कि वहां भी भारी छंटनी की संभावना जतानी शुरु हो गई है. ऐसे में इन 95 का क्या भविष्य है, आप समझ सकते हैं.

Vineet Kumar : मीडिया महंत जब ये कहते हैं कि हम तो अच्छे पत्रकार खोजते रहते हैं लेकिन मिलते ही नहीं तो लगता है अपने ही सिर के बाल नोच लूं.. उनका निशाना आइआइएमसी,जामिया,डीयू और ऐसे शैक्षणिक संस्थानों की तरफ होता है जहां वो खुद घुसने के लिए मार किए हुए हैं. अग्गा-पिच्छा करके डिग्रियां बटोरने में लगे हैं..भायजी, गोली मारिए इन संस्थानों को एक वक्त के लिए..ये जो आपके मेनस्ट्रीम मीडिया ने अपनी-अपनी मीडिया स्कूल की जो दूकानें खो रखी हैं, वो आपके काम के नहीं हैं क्या ? कहां गया टीवीटीएमआई, ट्रेनिंग दोगे दर्जनों को और रखोगे कुल चार..सरकारी संस्थान अगर मीडियाकर्मी तैयार करने के नाम पर कबाड़ पैदा कर रहा है तो आपके यहां लाखों रुपये फीस देने के बाद प्रतिभाएं कबाड़ क्यों हो जा रही है, उन्हें मौका दो न सरजी..

Vineet Kumar : क्या ये संभव नहीं है कि हम टीवी स्क्रीन पर थोड़ा कम चीखें, अखबारी कागजों पर थोड़ा कम बौद्धिक वमन करें लेकिन जिंदगी के प्रति खामोशी, गलत के प्रति की चुप्पी सड़क पर आवाज बनकर गूंजे, संज्ञा, सर्वनाम, सहायक क्रियाओं की ठीक-ठीक समझ का पाठ समझने-समझाने के बीच थोड़ा वक्त निकालकर जिंदगी का व्याकरण दुरुस्त करें. कार्पोरेट मीडिया की डिक्शनरी से इत्मिनान शब्द को डिलीट करें और अपनी जिंदगी में प्रतिरोध, दखल, संघर्ष जैसे मद्धिम होते, घिसते जा रहे शब्दों की रोशनाई थोड़ी और गाढ़ी कर लें.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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