छंटनी के शिकार पत्रकारों की तरफ से विरोध या संगठित होने की कोई योजना नहीं

Saroj Kumar : भारी पैमाने पर हुई छंटनी के शिकार पत्रकारों में केवल दो-तीन से ही मेरी बात होती है. छंटनी ग्रस्त पत्रकारों की ओर से किसी प्रकार के विरोध या किसी योजना का पता नहीं चला है और इसके कारणों को शायद समझा भी जा सकता है. लेकिन उनकी ओर से ऐसी कोई योजना न सही लेकिन सांकेतिक रूप से विरोध जताने या बातचीत करने तो हम जुट ही सकते हैं. आज रात कुछ दोस्तों ने इस मामले पर बातचीत के लिए जुटने का प्रस्ताव रखा है-कल रविवार(18 अगस्त) दोपहर 2 बजे जंतर-मंतर. मैं कल पहुंच रहा हूं. आप भी आइए…रविवार दोपहर 2 बजे जंतर-मंतर…

Alok Nandan : जब पत्रकार अपनी जमीन छोड़कर आसामान में पतंग बनकर उड़ेंगे तो भुकाटा कभी हो सकता है….पत्रकारिता बड़ी पूंजी की खेल में फंसी हुई है, बड़े-बड़े प्लांट में काम करने वाले लोग सिर्फ तकनीकी स्तर पर खबरों की कांट-छांट करते हैं…खबरों की कांट छांट करते हुये उनके प्रतिरोध की क्षमता कब खत्म हो जाती है उन्हें भी पता नहीं चलता… मुल्क में पत्रकारिता की प्लांटवादी व्यवस्था उदारवादी इकोनोमिक की देन है…प्लांटरूपी दानव खुद को बचाने के लिए कभी भी कभी भी इसमें काम करने वाले लोगों को निगल सकता है…वैसे भी इन प्लांटों में काम करने के दौरान लोगों की हड्डियों का चूरमा निकल जाता है…वे जेहनीतौर पर महज जमीन पर रेंगने वाले कीड़े बनकर रह जाते हैं…दानव के लिए इन्हें निगलना और भी आसान हो जाता है…

(सरोज कुमार और आलोक नंदन के फेसबुक वॉल से.)

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