छठे चरण में अजीत सिंह, अनुराधा चौधरी व मायावती की ताकत का होगा फैसला

  : भट्टा-परसौल, हरित प्रदेश जैसे मुद्दे गायब, नसीमुद्दीन का भ्रष्‍टाचार चर्चा में : गंगा-यमुना के दोआब वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 13 जिलों सहारनपुर, प्रबुद्धनगर (शामली), मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, पंचशीलनगर (हापुड़), गौतमबुद्धनगर (नोयडा), बुलंदशहर, अलीगढ़, महामायानगर (हाथरस), मथुरा और आगरा की 68 सीटों पर छठे चरण का मतदान 28 फरवरी को है। इस चरण में कांग्रेस की राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) से दोस्ती के अलावा रालोद के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह, उनके पुत्र जयंत चौधरी, लोकदल से बगावत करके समाजवादी पार्टी का दामन थामने वाली अनुराधा चौधरी, समाजवादी पार्टी को ठेंगा दिखाकर कांग्रेस के पक्ष में खड़े रसीद मसूद, बसपा के ब्राहमण चेहरे सतीश मिश्र और मंत्री रामवीर उपाध्याय की ताकत और भाग्य का फैसला भी होना हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र भी यहीं है। उनके प्रबल प्रतिद्वंदी रहे कल्याण सिंह के दमखम की परीक्षा भी यहीं होनी हैं। लोध बाहुल्य जिले अलीगढ़ व बुलंदशहर उनका गढ़ रहा हैं। अलीगढ़ की अतरौली सीट से कल्याण सिंह की बहू तथा वर्तमान विधायक प्रेमलता और बुलंदशहर की ढिबाई से उनके पुत्र राजवीर सिंह राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के टिकट से मैदान में हैं। भाजपा को धूल चटाने का दम भरने वाले कल्याण ने इस क्षेत्र से मात्र 13 प्रत्याशी ही उतारे हैं। बसपा सुप्रीमों मायावती का पैतृक घर भी इसी क्षेत्र (दादरी विधान सभा का बादलपुर गांव) में है। इसके अलावा उनका ड्रीम प्रोजेक्ट समझे जाने वाली यमुना एक्सप्रेस वे और कांशीराम स्मृति विहार योजना भी यहीं हैं। कांशीराम स्मृति विहार पिछले दिनों चुनाव आयोग के हाथी की मूर्तियां ढंकने के फरमान के बाद खूब चर्चा में रहा था।

जाट-गूजर-मुस्लिम-लोध और दलित बाहुल्य इस क्षेत्र में वैश्य मतदाताओं की भी अच्छी संख्या हैं। दिल्ली से सटे गाजियाबाद जिले के भट्टा पारसौल और अलीगढ़ जिले में टप्पल में भूमि अधिग्रहण पर माया सरकार के विरूद्ध किसानों का जबर्दस्त आंदोलन, यमुना का प्रदूषण, मुस्लिम और जाट आरक्षण, हाईकोर्ट बेंच, आलू किसानों की दुर्गति और गन्ना मूल्य का भुगतान जैसे तमाम मुद्दे इस चुनावी समर में लगभग गायब हैं। माया के करीबी रहे शराब माफिया पोंटी चड्ढा की सल्तनत और जेपी ग्रुप का साम्राज्य भी इसी क्षेत्र में स्थापित है। बसपा के थिंक टैंक माने जाने वाले सतीश मिश्रा के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले और ब्राह्मणों पर उनकी पकड़ की परीक्षा भी यहीं होनी है। ब्राह्मण बाहुल्य मथुरा-वृंदावन और महामायानगर में उनकी प्रतिष्ठा इस बार दांव पर है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अजित सिंह अपनी पुश्तैनी जागीर समझते हैं। पिछले कुछ वर्षो में यहां बसपा ने अपनी जड़े मजबूत की हैं। इस इलाके में पूरे उत्तर प्रदेश से इतर राजनीति का अलग रंग देखने को मिलता है। पुराने समीकरणों में उलटफेर का दावा करने वाली यूडीएफ की मनपसंद रणभूमि भी यहीं है। मुसलमानों के नाम पर बनी यूडीए के नेता हाजी याकूब कुरैशी के दावे की परख भी इसी क्षेत्र में होनी है। वह कांग्रेस-रालोद गठबंधन के साथ हैं।

पश्चिमांचल में अगर इस बार कोई नारा पूरी तरह गायब हैं तो वह हरित प्रदेश का है। अजीत सिंह के केन्द्र में मंत्री बनने के साथ ही यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया हैं। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में बसपा के नसीमुद्दीन सिद्दीकी के भ्रष्टाचार और लोकायुक्त के फैसले ने माहौल गर्मा दिया है। राजनैतिक पंडितों को इसमें जरा भी संशय नहीं है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे कठिन और संघर्षपूर्ण मुकाबला होने जा रहा हैं। जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर अजित सिंह अपने सांसद बेटे जयंत चौधरी को मथुरा की मांठ सीट से चुनाव लड़ाकर मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल कराने को आतुर हैं। जयंत, मथुरा से ही सांसद हैं। उनका मुकाबला तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी और वर्तमान विधायक श्याम सुंदर शर्मा से है। मांठ क्षेत्र से कम से कम एक विधायक या सांसद की हार निश्चित है। अजित यही चाहेंगे कि चुनाव के बाद हालात कुछ ऐसे बन जाएं, जिससे उनका बेटा यूपी की सत्ता पर काबिज हो सके। भट्ठा पारसौल (नोयडा का गांव) में भी इसी चरण में मतदान है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने 2010 के अंत में भट्ठा पारसौल की घटना को माया सरकार के खिलाफ खूब रंग दिया था। युवराज ने यहां किसानों पर हुए जुल्म के खिलाफ न केवल पद यात्रा की थी, बल्कि भूमि अधिग्रहण के मामले में संसद में नया कानून बनाने के बड़े-बड़े दावे किए थे। लेकिन इस मुद्दे पर लोकसभा में वह कभी नहीं बोले। जबकि उत्तर प्रदेश में नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाकर लागू भी हो गया।

भट्ठा पारसौल कांड में चर्चा में आए किसान नेता मनवीर तेवतिया, जिनके खिलाफ माया सरकार ने कई गंभीर आरोपों में मुकदमा चलाने के साथ उन्हें फरार भी घोषित कर रखा था, वह भी चुनावी मैदान में हैं। कभी 50 हजार के इनामी रहे तेवतिया जनता दल यू के टिकट से जेवर सीट से से किस्मत आजमा रहे हैं। मनवीर इन दिनों जेल में है। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ भट्ठा पारसौल ही नहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में किसान आंदोलन की आग फैली थी। टप्पल में तो पीएसी के एक जवान को गांव वालों ने बेरहमी से काट डाला था। 2007 के चुनाव में मुलायम सरकार के खिलाफ नोयडा का निठारी कांड (तमाम गरीब बच्चों से बलात्कार और उनकी दर्दनाक तरीके से हत्या करने का मामला) मुसीबत बनकर आया था। ठीक उसी तरह की परेशानी माया के लिए भट्ठा पारसौल और टप्पल खड़े कर रहे है। कौरव-पांडवों की भूमि हस्तिनापुर में चुनावी रंग शबाब पर दिख रहा है। सभी दलों के स्टार प्रचारक यहां अपनी आमद दर्ज करा चुके हैं।  

बात अतीत की कि जाए तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कभी चौधरी चरण सिंह का बोलबाला था। वह जाटों के सवर्मान्य नेता थे। उनके बाद यह विरासत बेटे अजित सिंह और पौ़त्र जयंत संभाले हुए है। किसी जमाने में बागपत का पूरा इलाका बूथ कैप्चरिंग के लिए कुख्यात था। जाट वोटों पर अजित की मजबूत पकड़ अन्य दलों को उनके साथ गठबंधन के लिए लुभाती रही है। 2007 का विधानसभा चुनाव छोड़कर अधिकतर चुनाव रालोद ने गठबंधन के साथ लड़े। अजित को कभी किसी के साथ जाने में परहेज नहीं रहा। वह नए-नए प्रयोग करते रहते हैं। विगत एक साल वह कई बड़े दलों के साथ मिलने की जुगत भिड़ा रहे थे। अंत में  कांग्रेस से गठबंधन कर चुनाव मैदान में हैं। 2002 की सरकार में मायावती और फिर मुलायम सिंह की सरकार में रालोद सत्ता का साझेदार रह चुका है। छोटे चौधरी उत्तर प्रदेश का बंटवारा करके हरित प्रदेश बनाने के लिए वर्षों से मुहिम चलाए हुए हैं, लेकिन उनके विरोधियों का कहना है कि अजित सिंह ‘हरित प्रदेश’ बनाने के लिए नहीं बल्कि इसके जरिए राजनीति करने पर ज्यादा तवज्जो देते हैं। अजित सिंह को अब इस प्रश्न का भी जवाब देना पड़ रहा है कि उन्होंने कांग्रेस से हाथ मिलाते समय माया सरकार द्वारा पारित किए गए हरित प्रदेश के प्रस्ताव पर केन्द्र सरकार से समर्थन की मोहर लगवाने के लिए दबाव क्यों नहीं डाला।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वैसे तो कुल 20 जिले और 122 विधान सभा सीटें हैं, लेकिन छठे चरण में 13 जनपदों की 68 सीटों पर ही मतदान है। जिसमें 1103 उम्मीदवारों (1017 पुरूष और 86 महिला) के भाग्य का फैसला करीब पौने दो करोड़ मतदाता करेंगे। यह क्षेत्र समाजवादी पार्टी के लिए हमेशा कमजोर रहा हैं। सपा को सत्ता में आने के लिए इस क्षेत्र में भी अच्छा प्रदर्शन करना होगा। तो अजीत सिंह को अब अपनी ताकत बढ़ानी होगी। भाजपा का भी यह मजबूत गढ़ रहा है। यदि वह रालोद-कांग्रेस गठबंधन को नहीं पिछाड़ सकी, तो 2007 के मुकाबले अपनी ताकत को बढ़ाने की भाजपा की तमन्ना को तगड़ा झटका लगेगा। 2007 के चुनाव में इन 13 जिलों में 67 सीटें थीं। परिसीमन के बाद 18 पुरानी सीटें खत्म कर 19 नई बनीं। अब कुल 68 सीटें है। 2007 में 67 सीटों में बसपा को 35, भाजपा को 12, राष्ट्रीय लोकदल को 10, सपा को तीन, कांग्रेस दो तथा अन्य को पांच सीटें मिली थीं। इससे पहले 2002 में यहां की 58 सीटों पर चुनाव हुआ था, जिसमें  बसपा ने 15 सीटें जीती थीं। भाजपा- रालोद गठबंधन ने 21 (10 भाजपा और 11 रालोद), सपा 8 तथा कांग्रेस को 6 सीटों पर कामयाबी मिली थी। बाकी पांच सीटों पर निर्दलीय सफल रहे थे। 2007 के विधानसभा चुनाव में यहां बसपा बड़ी ताकत बनकर उभरी थी। तब पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसे 70 सीटें मिली थीं। रालोद को 10, सपा को 12 भाजपा को 11 तथा कांग्रेस के हाथ 2 सीटें आयी थी।

2002 के चुनाव में सपा ने अजित सिंह के खास रहे समरपाल सिंह को अपने पक्ष में किया था, तो इस बार अजित सिंह की खास रहीं पूर्वमंत्री अनुराधा चौधरी रालोद छोड़ सपा के साथ हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धाकड़ सपा नेता किरन पाल सिंह इस बार रालोद के साथ हैं। हाजी याकूब कुरैशी सहित कई मुस्लिम नेताओं को अपने साथ लेकर अजित सिंह इस बार जाट-मुसलमान गठजोड़ का नया समीकरण बनाने की कोशिश में हैं। इस बार के चुनाव में 49 मौजूद विधायक मैदान में डटे हैं। 18 विधायक टिकट नहीं मिलने या अन्य कारणों से मैदान के बाहर हो गए हैं। सभी दलों में जीत के लिए हाहाकार मचा है। जीत के चक्कर में नैतिकता किनारे चली गयी है। सभी दलों ने अपराधियों, भ्रष्टाचारियों तथा दागियों को टिकट देने में परहेज नहीं किया। कई करोड़पति भी मैदान में हैं। इन सबमें कांग्रेस और रालोद सबसे आगे है। समाजवादी पार्टी दूसरे और भारतीय जनता पार्टी तीसरे पर है। कौमी एकता पार्टी चौथे स्थान पर है। कुल 128 प्रत्याशियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की पुष्टि शपथ पत्र में की है। इनमें 52 पर हत्या, डकैती, हत्या की कोशिश, अपहरण, बलात्कार, जबरन वसूली जैसे संगीन अपराध शामिल हैं।

टाप टेन उम्मीदवारों की बात की जाए तो जेवर क्षेत्र से जदयू के मनवीर सिंह तेवतिया के खिलाफ 31 मामले, मथुरा से बसपा प्रत्याशी पुष्पा शर्मा के खिलाफ 19, पूर्व बसपाई और अब सपा के टिकट डिबाई से खड़े भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित के खिलाफ 13, धौलाना से बसपा के ही असलम के खिलाफ 23, सरधना से अतुल के खिलाफ 19, बागपत से पीस पार्टी के जय भगवान के खिलाफ 8, बुलंदशहर से बसपा के मोहम्मद अलीम खान के खिलाफ 3, मीरपुर से पीस पार्टी के उम्मीदवार बिल्लू उर्फ जयसिंह के विरूद्ध 8 यहीं से सपा के मेहराजुद्दीन के खिलाफ 7 और चरथावल से बसपा के नूर सलीम राना के खिलाफ पर 4 मुकदमें चल रहे हैं। इसके अलावा कांग्रेस-रालोद गठबंधन के बाहुबली प्रत्याशी मदन भैया लोनी से और पीस पार्टी के दबंग उम्मीदवार योगेश शर्मा हस्तिनापुर से मैदान में हैं। टॉप टेन अपराधियों की सूची में नबंर वन मनवीर तेवतिया का मुकाबला माया सरकार के मंत्री वेदराम भाटी, सपा के विजेन्द्र सिंह, भाजपा के सुंदर सिंह राणा और कांग्रेस के ठाकुर धीरेन्द्र सिंह से हैं।

छठे चरण में अपराधियों के साथ-साथ दर्जनों करोड़पति उम्मीदवारों के बीच एक अरबपति भी मैदान में है। बसपा के सर्वाधिक 68 में से 59, भाजपा के 67 में से 42, सपा के 68 में 42, कांग्रेस के 34 में 27, रालोद के 32 में से 24, जदयू के 34 में 9, पीस पार्टी के 46 में 7 उम्मीदवार करोड़पति की लिस्ट में शामिल हैं। बात अरबपति उम्मीदवार की कि जाए तो आगरा दक्षिण से कांग्रेस के नाजिर अहमद ने अपने शपथ पत्र में एक अरब 41 करोड़, 39 लाख रूपए से अधिक की सम्पति का खुलासा किया है। 20 करोड़ से अधिक सम्पति वाले 10 उम्मीदवारों में डिबाई से बसपा प्रत्याशी विनोद कुमार के पास 45.19 करोड़, नोयडा के भाजपा प्रत्याशी महेश शर्मा के पास 37.45 करोड़, खतौली से रालोद प्रत्याशी करतार सिंह के पास 26.30 करोड़, नोयडा से कांग्रेस उम्मीदवार डा. वीएस चौहान के पास 22.12 करोड़, सादाबाद से सपा उम्मीदवार देवेन्द्र अग्रवाल के पास 21.19 करोड़, बागपत से बसपा उम्मीदवार हेमलता चौधरी के पास 20.76 करोड़, साहिबाबाद से बसपा उम्मीदवार अमर पाल के पास 20.57 करोड़, सरधना से भाजपा उम्मीदवार संगीत सिंह सोम के पास 20.22 करोड़ और किठौर से बसपा उम्मीदवार लखीराम नागर के पास 19.73 करोड़ रुपए की सम्पति है।

बात मौजूद विधायकों की सम्पति में इजाफे की करे बिना पूरी नहीं होगी। इस बार विभिन्न दलों के 49 विधायक चुनावी समर में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। पिछले पांच वर्षो में इनकी सम्पति में औसत वृद्धि 2.12 करोड़ की देखी गई जो कि करीब 168 फीसदी है। इसमें नंबर वन पर किठौर विधान सभा क्षेत्र से बसपा विधायक लखीराम नागर हैं। पांच वर्षो में लखीराम की सम्पति में 11.31 करोड़ की वृद्धि हुईं। नंबर दो पर रहे मथुरा के बलदेव विधान सभा क्षेत्र से विधायक रहे पूरन प्रकाश की सम्पति में 6.63 करोड़, बाह विधान सभा क्षेत्र से बसपा के उम्मीदवार और मौजूद विधायक मधुसूदन शर्मा की सम्पति में 4.95 करोड़ रुपए की बढ़ोत्तरी देखी गई। बसपा के दादरी से उम्मीदवार और मौजूदा विधायक सतवीर सिंह गुर्जर की सम्पत्ति में 3776 प्रतिशत की बढ़त आई। 2007 के विधान सभा चुनाव में दाखिल किये गये शपथ-पत्र में सतवीर ने अपनी कुल सम्पति 2.51 लाख बताई थी, जो 2012 के शपथ पत्र में बढ़कर 97.48 लाख है। इसके बाद बलदेव क्षेत्र से विधायक और रालोद उम्मीदवार पूरन प्रकाश का नाम आता है। 2007 में पूरन की कुल सम्पति 27.01 लाख थी, जो 2456 फीसदी बढ़कर अब 6.9 करोड़ हो चुकी है। छठे चरण में जो प्रमुख चेहरे मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, उसमें हुकुम सिंह, छत्रपाल सिंह, हाजी याकूब कुरैशी, बलवीरसिंह, रामसिंह, जयवीरसिंह, रामवीर उपाध्याय, कोकब हमीद, जयंत चौधरी, भगवान शर्मा, चौधरी बाबू लाल, शाहिद मंजूर, रामसखी कठेरिया, साध्वी प्राची, कल्याण सिंह की बहू प्रेमलता वर्मा और पुत्र राजवीर सिंह प्रमुख हैं।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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