छत्तीसगढ़ : संजय पांडे का मंत्र और खबर कवर न करने की कसक

अखबार से सीढी लगाकर झारखंड के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार होने के नाम पर आसमान पर चढा दिया गया। मुख्यमंत्री गए। राजपाट गया, तो आसमान से गिरा और टीवी में पहुंचा। खबर की समझ थी। परदे पर उतारने की तरकीब तलाश रहा था। बेजोड़ दबाव के दिन थे। 2004 लोकसभा चुनाव कवरेज के लिए छत्तीसगढ़ भेजा गया। संजय पांडे जूनियर काम आए। हंसमिजाज संजय ज़ी न्यूज़ के एलेक्शन डेस्क के प्रभारी थे। उनको मेरी मुसीबत की ज्यादा समझ थी। चुटकी में निदान बताया कि बस सुनहरे विजुअल कैद करूं। तमाशा एलीमेंट को पकडूं। विश्लेषण वाले मिजाज को रद्दी की टोकरी में फेंक दूं।

जबतक टीवी में रहा पांडे जी के जुमले को घुट्टी की घोल की तरह जेहन में उतार लिया। सटीक निर्देशन का आभारी हूं। टीवी में ही विजुअल बोलता है। अगर वजुअल न मिले तो तथ्य के बजाए वर्चुअल यानी काल्पनिक विजुअल तैयार किया जाता है। टेक्स प्लेट के जरिए बताई गई बात आकर्षक नहीं होती। मसलन टीवी के लिए रंग बिरंगे पताके, इंद्रधनुषी छटा, गीत, संगीत,लुभावने चेहरा और भौंचक करने वाले तमाशे की तलाश जरूरी है। इसलिए टीवी पत्रकार के तौर पर बस इसी फेर में लगा रहा।

दुविधा नहीं रही कि टीवी में विजुअल गंभीरता से कही जाने वाली किसी भी बात से ज्यादा महत्वपूर्ण है। टिप्स के भरोसे छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी से ज्यादा महत्वपूर्ण डॉ. रेणु जोगी का चेहरा लगा। विद्याचरण शुक्ल (जिन्हें “विद्या भैय्या” कहा जाता रहा) से ज्यादा उनकी पार्टी का प्रचार कर रहीं पंडवानी गायिका तेजन बाई लगीं। छत्तीसगढी नाट्क कलाकारों के जरिए राजनीतिक दलों के प्रचार को दर्शकों के बीच परोसना जरूरी लगा। निरंतर खबर की मौलिक समझ से बेबूझ होने का स्वांग रचता रहा। नाच-गाने, ढोल-थाप की आवाज और तमाशाई तस्वीरों को पकडता रहा। तेजन बाई पांडवों की करूण दशा बांचने के साथ जोश में भरे श्रोताओं को विधानसभा चुनाव के वक्त रह रहकर कलाई पर बंधी “घड़ी” की ओर इशारा करती थीं। तब विद्या भैय्या एनसीपी में थे। जग्गी हत्याकांड से उमड़ी संवेदना को वोट में तब्दील नहीं कर पाए तो जोगी से लोहा लेने के लिए लोकसभा चुनाव के वक्त वापस बीजेपी में लौट आए थे। पद्मभूषण तेजन बाई की कलाई से इस बार विद्या भैय्या के लिए “घड़ी” गायब थी, अब सुनने जुटी भीड को “फूल” की महत्ता बयान करती।

दिल्ली भेजे जाने वाली खबरों में राजनीतिक दलों के पताकों से अटा पंडाल और तमाशे बेस्ट विजुअल का एवार्ड जीतते रहे। सतरंगी विजुअल के बीच से भेजा पीस टू कैमरा का हिट होना मेरे अंदर के पत्रकारिता के विष को मारने के लिए काफी था। रायपुर पहुंचते ही छत्तीसगढ़ी फिल्मों के वितरक से संपर्क किया। उनसे नामचीन कलाकारों का विवरण लिया, जो अलग अलग पार्टिंयों के लिए अलग अलग इलाके में स्टेज शो कर रहे थे। नृत्यांगना डॉली तोमर को ढूंढ निकाला। जोगी की पार्टी से लगाव रखने वाले फिल्म वितरक ने बताया कि उनका एक भाई फिल्म का हीरो तो दूसरा प्रतिद्वंदी बीजेपी कार्यालय का पदाधिकारी है। टीवी की समझ के तहत रंगारंग छटा पेश करने वाली इस परिवार पर ही एक रिपोर्ट दिल्ली भेज दी। मामला फीट हो गया।

पत्रकार के तौर पर सबसे बेबस हादसे में घायल अजीत जोगी की हालत बयां करते वक्त आया। स्क्रीन पर दर्द से ज्यादा खुशी परोसने का रिवाज है। रिवाज में ढलने को मजबूर था। जांबाज जोगी के हादसे में बच निकलने को वैसे ही कम करके रिपोर्ट किया जिस तरह से विद्या भैय्या के सहयोगी रामावतार जग्गी की राजनीतिक हत्या को अंडरप्ले करने को मजबूर हुआ था।

दिल्ली से चलते वक्त दीपक डोभाल की रिपोर्टिंग का फोलोअप भेजने की तमन्ना थी। अजीत जोगी ने अक्टूबर 2003 में हारी बाजी को जीत में तब्दील करने के लिए भाजपा विधायक खरीद कांड किया था। दीपक ने अरुण जेटली की डी ब्रीफिंग से उसे कैमरे पर उतारने में अद्भूत सफलता हासिल की थी। लोकसभा चुनाव तक तमाशाई तत्व के अभाव में विधायक खरीदकांड बेमतलब की बात करार दी गई थी। बताया गया था कि दर्शक की यादाश्यत छोटी होती है इसलिए ज्यादा पुरानी बात न की जाए।

इरादा था कि छत्तीसगढ़ चुनाव कवरेज के लिए अबूझमांड के इलाके में जाऊंगा। बस्तर जाकर नक्सली झुकाव वाले विधायक मनीष कुंजाम से मिलूंगा। पता लगाऊंगा कि कौन रोक रहा है भोले आदिवासियों को मतदान प्रक्रिया का हिस्सा बनने से? मुख्यमंत्री रहते अजीत जोगी के किए विकास की ढेरों कहानियां सुनी थी, पत्रकार के तौर पर आंकना चाहता था कि विकास करने वाले किसी नेता को भूलना या याद रखना लोकतंत्र में बेमानी क्यों होता जा रहा है?

आईडिया लेकर निकला था कि ग्रामीण क्षेत्र में चिकित्सक पहुंचाने के जोगी के अनोखे तरकीब का क्या हुआ ? जिसमें उन्होने छत्तीसगढ में डाक्टरी की पढाई के लिए दशक बीताने के बजाए अल्पावधि कोर्स चलाने का प्रावधान किया था। युवाओं को हुनरवान बनाने के लिए उच्च शिक्षा के लिए थोक के भाव निजी विश्वविद्यालयों को लाइसेंस दिया था। रिपोर्टर के नाते जानने की इच्छा थी कि इन लोकलुभावन फैसलों पर आयुर्वेद के डॉक्टर से मुख्यमंत्री बने राजनेता रमन सिंह की राय क्या है? याद है कि रमन सिंह से एक मुलाकात रायपुर के गेस्ट हाउस में हुई थी। जोगी के खिलाफ तल्ख बयान देने से वो तब भी बच रहे थे, जैसे आज बचा करते हैं। टीवी रिपोर्टिंग में इसे बयां नहीं करने का कसक आज भी कायम है। यकीन है कि अखबारनबीसी के लिए छत्तीसगढ गया होता तो यह कसक नहीं रहती।

अखबार में रिपोर्ट करता कि शासन से गए पांच महीने बीत जाने के बावजूद 2004 के लोकसभा चुनाव के वक्त अजीत जोगी की प्रशासन पर पकड दिख रही थी। जातीय समीकरण की वजह से पार्षद से मुख्यमंत्री बने सीधे सरल डॉ रमन सिंह छत्तीसगढ पर ज्यादा वक्त तक काबिज रहेंगे, इस पर तब ज्यादातर लोगों को यकीन क्यों नहीं था? तब रमन सिंह सरकार के गृहमंत्री बृजभूषण अग्रवाल को मुख्यमंत्री से ज्यादा अनुभवी होने के कारण ज्यादा प्रतिभावान माना जा रहा था।

तमाशाई विजुअल की कमी से खुली आंख से दिख रहे इस सच को रिपोर्ट करने से रह गया कि तब पूर्व मुख्यमंत्री के पुत्र अमित जोगी के बाचालपन की कहानी गली सडकों पर बिखरी पड़ी थी। बखूबी याद है कि अक्टूबर में सत्ताच्युत हो गए अमित का आकाश केबल नेटवर्क का 2004 के फरवरी तक एकछत्र राज था। लोगों को आज के सच पर भरोसा नहीं हो रहा था कि पिता-पुत्र की कुशाग्र जोड़ी का राज आने दस साल तक नहीं लौटने वाला है।

एक बार फिर छत्तीसगढ में विधानसभा चुनाव हो रहा है। दस साल पुरानी याद को समेटकर लिखने की कोशिश कर रहा हूं, तो राज्य में गरीबी की समस्या में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। खदान का दायरा बढ गया है। बाल्को के साथ जिंदल ने जमीन मजबूत की है। नक्सली हिंसा का प्रकोप बढ़ा है। सीन से परलोक सिधार गए विद्या भैय्या गायब हैं। नक्षत्र बनने की कवायत में लगे नंदकुमार पटेल नहीं हैं। नक्सलियों के आंख की किरकिरी “बस्तर के शेर” महेंन्द्र कर्मा नहीं हैं। निजी नुकसान के बावजूद बीजेपी के शानदार पैरोकार बलिराम कश्यप और जोगी के चाल के शिकार बने दिलीप सिंह जूदेव दुनिया से विदा ले चुके हैं। तीसरा मोर्चा के तौर पर जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के झंडे को थामे तो रखा है,पर कांग्रेस और बीजेपी के आमने सामने की टक्कर में खुद को बचा पाएंगे इसमें शक है। चुनावी संग्राम में हस्तियों की गैरमौजूदगी से रिक्तता आई है। इसे भरने की जिम्मेदारी विधानसभा चुनाव के नतीजों पर है।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने 'आज', 'देशप्राण', 'स्पेक्टिक्स इंडिया', 'करंट न्यूज', होम टीवी, 'माया', दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक काफी समय से समाज सेवा, पर्यावरण सक्रियता, मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं. उनसे संपर्क aloksamay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


आलोक का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

राजनीति और पत्रकारिता : विश्वास का संकट

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *