छोटे और मझोले अख़बारों को बचाने के लिए एकजुट हों

छोटी-छोटी पूँजी से संञ्चालित होने वाले लघु एवं मध्यम समाचार पत्र देश में पत्रकारिता की प्राण-आत्मा हैं. इन्हीं में सही तरीके से आज भी देश की बहुतायत ग्रामीण जनता, किसानों और आम आदमी की समस्याओं और पीड़ा को स्थान मिलता है. व्यवस्था से शिकायत के साथ उसके प्रति आम लोगों के आक्रोश, क्षोभ, गुस्से तथा कुण्ठा का बिना लाग-लपेट इज़हार होता है. उन पर ज़ुल्म-ओ- सितम और अन्याय की बातें बिना ‘टिल्ट’ या ‘ट्विस्ट’ हुए छपती हैं. यही सरकार के विकास कार्यक्रमों की सही झलक आम जनता को दिखलाते हैं और उसकी बात को सही तरीके से जनता के समक्ष रखते हैं. अनेक अवसरों पर राज्य सरकार के नुमाइन्दों के अलावा केन्द्र सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों ने भी यह बात खुद ही न केवल स्वीकारी है बल्कि अपनी ओर से भी कही है.
 
हमारे राष्ट्रीय दिवसों- छब्बीस जनवरी, पन्द्रह अगस्त, गांधी जयन्ती के अलावा कुछ और महत्वपूर्ण दिवसों, अवसरों पर राज्य और केन्द्र सरकार नियमित प्रकाशित होने वाले लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों को परम्परागत रूप से ऐसे विज्ञापन देती रही है जिनमें आम  आदमी को बधाइयों, प्रासंगिक सन्देशों के साथ सरकार की प्रमुख नीतियों और कार्यक्रमों का ज़िक्र होता आया है. इन विज्ञापनों से छोटे  अख़बारों और पत्रिकाओं को बड़ी राहत मिलती है क्योंकि वे उनकी सार्वजनिक व सरकारी मान्यता के सनद बनते हैं. इस बार स्वतंत्रता दिवस पर न तो राज्य सरकार के सूचना और जन सम्पर्क विभाग और न ही केन्द्र सरकार के विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय ने ही बहुतायत छोटे व मझोले अख़बारों को विज्ञापन दिये. इस सम्बन्ध में कुछ साल पहले तक विज्ञापन प्रकाशित करने के  आदेश (R.O.) राष्ट्रीय दिवसों के कई दिन पूर्व ही छोटे अख़बारों के स्वामियों-प्रबन्धकों को मिल जाया करते थे. अबकी न मिलने पर  छोटे अख़बारों के द्वारा जब सम्बन्धित प्राधिकारियों से सम्पर्क किया गया तो उन्हें बताया गया कि बजट नहीं है. यह अत्यन्त आश्चर्य  तथा ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय है ! उल्लेख जुरूरी है कि इसी अवसर पर बड़े तथा कॉरपोरेट घरानों के द्वारा सञ्चालित-सेवित ‘बड़े’  समाचार पत्रों को सरकारी विज्ञापनों से भर दिया गया. अभी 20 अगस्त को राजीव गांधी की जयन्ती पर तो अनेक अख़बारों में ख़बरों के  लिए जगह तलाशनी पड़ी.
 
दरअसल, आज केन्द्र ही नहीं, राज्य सरकार भी ‘कॉरपोरेट घरानों की रखैल’ की तरह हो गयी ही जो उन्हें स्वयं या अपने एजेण्टों के  ज़रिये उसे चला रहे हैं. इन सरकारों पर पूँजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों का कब्ज़ा हो चुका है. इससे छोटे-छोटे अख़बारों और पत्रिकाओं  के सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है. इस ओर किसी का ध्यान नहीं है और अधिसंख्य लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्र  अपनी समस्याओं से ही मुक्ति नहीं पा रहे हैं.
 
बड़े अख़बारों को देश की आम आबादी और ग्रामीण जनता की ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. वे सिर्फ़ मुठ्ठी भर शहरी युवाओं को पूरा भारत मान  बैठे हैं और कथित तौर पर उन्हें स्मार्ट बनाने के नाम पर न केवल देश की भाषा और संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट कर रहे हैं बल्कि युवाओं  की क्षमता और मेधा का दुरुपयोग भी कर रहे हैं. उन्होंने बड़े चैनलों की तरह समूची शहरी जनता को ‘अपने मनोरञ्जन’ का विषय बना  दिया है और अपनी भौंड़ी प्रस्तुति से उसकी मानसिकता को बदलने के लिए ‘मीठे ज़हर’ (Sweet Poison) का काम कर रहे हैं. देश  की बहुतायत आबादी- ग्रामीण जनता और किसानों की समस्याएं उनकी चिन्ता का विषय नहीं है. हाँ, प्रायोजित आधार पर कभी-कभी वे  संस्थान और उनके लोग गाँव-गिरांव के लिए घड़ियाली आँसू बहाते ज़ुरूर दिख जाते हैं जिन्होंने गांवों में शायद ही कभी कदम रखा हो और दिन-रात काटी हो. 
 
आज़ादी की लड़ाई के दौरान राष्ट्रीयता की अलख जगाने में देश के छोटे-छोटे अख़बारों-पत्रिकाओं का अहम योगदान रहा है. उनकी इस  महत्ता को देखते हुए ही पहले कहा जाता रहा:- “खींचो न कमानों को न शमशीर निकालो. ग़र तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो.” मुमकिन है कि किन्हीं मजबूरियों और सामाजिक दुर्बलताओं के चलते कुछ छोटे अख़बार आज वैसा न कर रहे, अथवा न कर पा रहे हों,  क्योंकि और बड़े पत्रकारों की भांति छोटा पत्रकार भी इसी समाज की देन है. मगर हमारा भी तो यह सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व है कि  हम उनकी समस्याओं को पहचानें, उनका पथ-विचलन रोकें. आज देश चतुर्दिक संकट में है. हर जगह दलालों और ‘मीडिएटर्स’ की पैठ बन चुकी है, इस पर देश की सर्वोच्च अदालत ने भी हाल ही में भारी चिन्ता जतायी है.
 
इसलिए देश-प्रदेश के सभी छोटे एवं मझोले अख़बारों के सञ्चालकों, मालिकों, प्रबन्धकों, कार्यकर्ताओं जागो, उठो और आगे बढ़ो, किसी  को नेता बनाने के लिए नहीं अपितु अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए. अपने हक़-ओ-हुकूक के लिए. आपको उचित छाया देने के लिए जर्नलिस्ट्स फ़ोरम आपके साथ है. याद रखिये, देश को वर्तमान में किसी से अगरचे, आशा की थोड़ी-बहुत किरण दिखती है तो मीडिया, ख़ासकर छोटे-छोटे भाषायी अख़बार  और पत्रिकाएं ही हैं. सो, आइये खुद नेतृत्व लीजिए अपने हाथों में और अपनी एकता से दिखा दीजिये कि कोई भी ताक़त आपको नज़रन्दाज़ कर सुरक्षित नहीं रह सकती.
 
 
ध्यान दें मनीष तिवारी और उनकी सरकार… ज्ञान, बुद्धि, युक्ति, कौशल, विवेक और संघर्ष से बनता है पत्रकार… जाहिर है सिर्फ़ शिक्षा से हो सकती है इनकी भरमार
 
कदाचित, पत्रकारिता देश में हर समय यौन सुखेच्क्षुक कोटि के कुछ लोगों को ‘हस्त क्रीड़ा’ की तरह लगती है. दुर्योग से इस तरह के  लोगों की आज राजनीतिक और कथित तौर पर सम्मानित समझे जाने वाले प्रशासनिक क्षेत्र में भरमार हो गयी है. लिहाज़ा वे पत्रकारिता  क्षेत्र में सक्रिय लोगों को किसी न किसी तरह से काबू करना, दाब-दबाव में रखना और अपने इशारे पर चलाना चाहते हैं. इन्हीं में से  एक शख्स मनीष तिवारी भी जान पड़ते हैं. साहब ने फ़रमाया है कि पत्रकार लाइसेंसधारी होने चाहिए. गोया, लाइसेंस लेकर कोई कार्य  और उसे करने वाला जायज़ हो जाता है. … बदनीयती की ‘बू’ आती है ऐसे सोच पर और नफ़रत होती है इस ख़याल पर !! यह  व्यापक और निरपेक्ष भाव से लोकहित को लेकर चलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने से भी कहीं बहुत आगे- उसे  रौंदने का एक खतरनाक ख़याल है, जिसे अवसरपरस्तों तथा सत्ता-सुखेच्क्षुओं का व्यापक समर्थन मिल सकता है !!!
सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी को लगता है कि जिस तरह वकील लाइसेंसधारी होते हैं वैसे हो पत्रकार भी लाइसेंसधारी होने चाहिए.  
 
यह ख़याल तो ब्रिटिश हुकूमत में कभी फिरंगियों के मन में भी नहीं आया होगा जिनके द्वारा लादी गयी मानसिकता की एक विशिष्ट उपज मनीष तिवारी भी हैं. मनीष (तिवारी)जी आप देश के मंत्री हैं, पहले खोजिए, सर्वेक्षण कराइए और जनता तथा समाज को बताइए की विभिन्न क्षेत्रों में कितने फ़ीसद लोग ‘असल लाइसेंस’ लेकर किस स्तर तक वैध और जनहितैषी कार्य कर रहे हैं ! अरे मनीष बाबू ! देश में जितने काले कोट वाले हैं, या लाइसेंसधारी होकर काम कर रहे हैं उनमें भी सभी उसकी पात्रता नहीं रखते.  बाकी के बारे में सोच और कहकर तो मैं अपना तथा इस पोस्ट के विचार को समर्थन देने वालों का वक़्त नहीं जाया करना चाहता. कहते  हैं कि समझदार को इशारा ही काफ़ी होता है. 
 
हे देश और व्यवस्था के लाइसेंसधारी ‘भाग्य-विधाता’ ! पत्रकार भी उसी समाज का उत्पाद है जिसके उत्पादन आप जैसे ‘मनीषी’ हैं.  पत्रकार किसी और कार्यशाला में नहीं बनाये जाते. अन्तर है तो सिर्फ़ इतना कि एकाध अपवादों को छोड़ दें तो ज़ियादातर पत्रकार विपरीत  परिस्थितियों से लड़कर स्वरूप धारण करते हैं, ज्ञान, बुद्धि, युक्ति, कौशल एवं विवेक से अपनी हैसियत बनाते हैं और अपने संघर्षों से  खड़े होते हैं जबकि आप सियासत के जिस क्षेत्र में हैं वहां तो अब अपवादस्वरूप ही कोई संघर्ष से बनकर अस्तित्वमान हैं. आपके पहले  की पीढ़ी के कुछ लोग जिनमें माया, ममता, मुलायम, लालू, कल्याण, उमा और इन जैसे लोगों का नाम मैं प्रमुखता से लेना चाहूँगा,  ही विपरीत परिस्थितियों में अपना मक़ाम बना सके हैं, बाकी तो आपके राजनीतिक क्षेत्र की भांति बपौती, ‘भयौती’ तथा रिश्तौती जैसी  विरासत और धनबल व उसकी महिमा की उपज हैं.
 
मुमकिन है कि पत्रकारिता क्षेत्र में आज भी कुछ लोग कम पढ़े-लिखे रह गये हों, पर किसी जिला या तहसील स्तर पर रहकर छोटे से  छोटा अख़बार या पत्रिका निकाल रहा अथवा ख़बरों के लिए किसी अख़बार के लिए नुमाइन्दगी करटे हुए अपने अस्तिस्व के लिए खून- पसीना एक किये दिन-रात तड़प रहा एक साधारण सहाफ़ी भी अपने स्तर के किसी सियासतबाज़ और अनेक मामलों में तो आपकी ज़मात  के बहुतायत कानून निर्माताओं से बेहतर ख़याल रखता है. यही नहीं, वह हर समय उसका बेहतर इस्तेमाल करने के लिए प्रयत्नशील  और लोकतंत्र को बचाये रखने को उद्यत रहता है. उस समय भी जब देश की 95 फ़ीसद से अधिक आबादी टांग-से टांग चिपकाकर  बहुआयामी सपनों में गोते लगा रही होती है. 
 
सो, हे मंत्रिवर ! पहले यह सुझाव दीजिए कि ऐसा पत्रकर निरपेक्ष भाव से अपने द्वारा स्वयं ओढ़े गये दायित्व को किस तरह से सरलता और कम से कम इस सुविधा की निश्चिन्तता के साथ अंज़ाम देता रहे कि उसके बच्चे की फ़ीस उसके बिना भी भरी जा सकेगी,  पत्नी और मां-बाप तथा अन्य परिजनों के पेट की भूख मिटती रहेगी, उमर होने पर उसकी बहन या बिटिया की मांग सूनी नहीं रहेगी.
 
 
Dr Matsyendra Prabhakar
 
जर्नलिस्ट्स फ़ोरम
journalistsforum92@gmail.com 
pmatsya1965@rediffmail.com

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