‘जगजीत सिंह को बाबू के गुजरने के बाद अपने कांधों पर फूट-फूटकर रोते देखा’

जगजीत इतना कुछ गाकर चले गये हैं कि उन्हें सुनते-सुनाते कभी यह महसूस ही नहीं होता कि वे इस दुनिया-ए-फानी में नहीं हैं। रूमानी ग़ज़लें जगजीत ने खूब गायी हैं। ग़ज़लों में आर्केस्ट्रा का बेहतरीन इस्तेमाल भी किया है। पर एक दौर ऐसा भी आया जब लगने लगा कि अब वे टाइप्ड होते जा रहे हैं। गाने के अंदाज में एकरसता-सी आने लगी व आर्केस्ट्रा के साथ पश्चिमी वाद्यों का प्रयोग कुछ ज्यादा ही नजर आने लगा।

इसी दौर में उनके साथ एक बड़ी दुर्घटना हुई। उनके एकमात्र बेटे विवेक उर्फ बाबू ने मुंबई में एक कार हादसे में अपनी जान गंवा दी। चित्रा-जगजीत के लिये यह हादसा असहनीय था। चित्रा तो आज तक इससे उबर नहीं पायीं, उन्होंने गाना ही छोड़ दिया। दूसरी तरफ इस हादसे ने जगजीत के दिलो-दिमाग को भी कुछ तरह झिंझोड़ा कि उनकी गायकी में कुछ परिवर्तन साफ तौर पर नजर आने लगे।

ऐसा नहीं है कि जगजीत ने पहले कभी भजन न गाये हों। चित्रा के साथ उनके गाये भजन पहले ही काफी पापुलर थे। खासतौर पर वह अलबम जिसमें उन्होंने गुरूनानक की वह मशहूर पंक्तियां गायी थीं- "हे गोविंद, हे गोपाल, हे दयाल यार…।" लेकिन विवेक के चले जाने के बाद उन्होंने सूरदास से लेकर कबीर तक के भजनों में खुद को डुबोया। इसी दौर में उनकी ग़ज़लों में सूफियाना कलाम की छाप भी दिखाई पड़ने लगी -"मुझमें जो कुछ अच्छा है सब उसका है, मेरा जितना चर्चा है सब उसका है।" यह ग़ज़ल उन्होंने बाबू के चले जाने के बाद समाज सेवी संस्था "क्राई" के लिये तैयार किये गये अल्बम में शामिल की थी।

इसी अल्बम में एक ग़ज़ल और थी, जिसका जिक्र मैं वर्तमान संदर्भ में खासतौर पर करना चाहता हूं और शायद जगजीत के गायन के इस पहलू की चर्चा कुछ कम ही हुई है। यह जगजीत के गायन का जनवादी पहलू है-

"अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूं,
अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पाता हूं "

सुनें…

अथवा

"भूखे बच्चों की तसल्ली के लिये,
मां ने फिर पानी पकाया देर तक"

सुनें…

पिछले दिनों सुविख्यात बांसुरी वादक रोनू मजुमदार से इत्तिफाकन मुलाकात हुई तो उन्होंने भी मेरी इस बात पर सहमति जाहिर की कि "हां, बाबू के गुजरने के बाद जगजीत के गायन में अध्यात्म की झलक स्पष्ट देखी जा सकती है।" रोनू कहते हैं कि मैंने बेहद संजीदा जगजीत को अपनी शादी के स्वागतोत्सव में भांगड़ा करते हुए भी देखा था और उन्हें बाबू के गुजरने के बाद अपने कांधों पर फूट-फूटकर रोते हुए भी देखा। कलेजे को चीर देने वाली उनकी हूक "चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन-सा देश, जहां तुम चले गये" में सुनाई पड़ी थी।

जगजीत की एक खासियत और थी- ग़ज़लों अथवा गीतों का उनका चुनाव बेहतरीन होता था। उन्हें शायरी की समझ थी और इसका कारण शायद यह था कि कालेज के दिनों में उनकी सोहबत सुदर्शन फाकिर जैसे शायरों से थी, जिनकी "बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी" को उन्होंने सबसे पहले रेकार्ड किया था। जगजीत के सबसे ज्यादा पापुलर गीतों में "हम तो हैं परदेस में, देश में निकला होगा चांद" एक तरह से मील का पत्थर है। वे यूरोप, अमेरिका, कैनेडा-आदि  में खूब कंसर्ट करते रहे और उन्हें पता था कि बाहर रहने वालों का कलेजा अपनी मिट्टी के लिये किस तरह कलपता है। यह गीत उन्हीं लोगों के दर्द को बयान करता है। बाद में गायन में उनके समकक्ष-समकालीन कलाकार नीना-राजेन्द्र मेहता  (एक प्यारा-सा गांव, जिसमें पीपल की छांव) व कनिष्ठ कलाकार पंकज उधास (चिटृठी आई है) ने भी अपने गायन में कुछ इसी तरह का रंग देने का प्रयास किया पर इन गीतों में वो बात नजर नहीं आयी जो जगजीत के "हम तो हैं परदेस में" में थी।

जाहिर है कि जब जगजीत जैसा कलाकार जनगीत जैसी चीजों को अपनी आवाज देगा तो यहां भी उनके चयन की गुणवत्ता साफ नजर आयेगी। पहली ग़ज़ल "धूप" फिल्म से है :

हरेक घर में दिया भी जले अनाज भी हो
अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो

हुकुमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं
हुकुमतें जो बदलता है वो समाज भी हो

सुनने के लिए यहां क्लिक करें-

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/702/media-music/har-ek-ghar-mein.html

दूसरा गाना बिल्कुल ही दौरे-हाल का है। नवउदारवाद की आंधी ने सामाजिक विषमता की खाई को बहुत चौड़ा कर दिया है। संपन्नता मुट्ठीभर हाथों में सिमटकर रह गयी है। मजदूरों को उचित पैसे तो दूर, अब काम मिलना भी बंद हो रहा है। दलित-आदिवासी उत्थान के तमाम नारों के बावजूद हाशिये पर जा रहे हैं। इस परिदृश्य को अपने गाने में प्रतिबिंबित करने का साहस कोई आम व्यावसायिक कलाकार नहीं कर सकता जो जगजीत ने किया :

यह कैसी आजादी है
चंद घराने छोड़ के भूखी नंगी हर आबादी है

जितना देस तुम्हारा है ये
उतना देस हमारा है
दलित, महिला, आदिवासी , सबने इसे संवारा है

ऐसा क्यों है कहीं ख़ुशी है
और कहीं बर्बादी है

यह कैसी आजादी है….

अंधियारों से बाहर निकलो
अपनी शक्ति जानो तुम
दया- धरम की भीख न मांगो
हक अपना पहचानो तुम
अन्याय के आगे जो रुक जाये वो अपराधी है

यह कैसी आजादी है….

जिन हाथों में काम नहीं है
उन हाथों को काम भी दो
मजदूरी करने वालों को , मजदूरी के दाम भी दो
बूढ़े होते हाथों -पांव को, जीने का आराम भी दो
दौलत का हर बंटवारे में, मेहनतकश का नाम भी दो
झूठों के दरबार में, अब तक सचाई फरयादी है

यह कैसी आजादी है
चंद घराने छोड़ के भूखी नंगी आबादी है

सुनने के लिए यहां क्लिक करें-

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/701/media-music/ye-kaisi-aazadi-hai.html

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं. सरकारी नौकरी से कुछ समय पहले रिटायर हुए. उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. दिनेश के लिखे से साक्षात्कार के लिए यहां क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश


(सुनें)

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