जनसंदेश चैनल के स्ट्रिंगरों को महीनों से पैसे का इंतजार

यशवंतजी, जनसंदेश चैनल के स्ट्रिंगरों का हाल बुरा है. चैनल ने पिछले साल जुलाई माह के बाद से अब तक स्ट्रिंगरों का पैसा नहीं दिया है. आश्‍वासन रोज मिलता है कि इस महीने कर दिया जाएगा, उस महीने कर दिया जाएगा, परन्‍तु साल भर होने को आ रहा है अब तक हिसाब-किताब नहीं किया गया. इक्‍का-दुक्‍का खुशनसीब या कहिए प्रबंधन के चहेते स्ट्रिंगरों के अलावा किसी भी स्ट्रिंगर का पूरा हिसाब क्‍लीयर नहीं हुआ है.

जब से चैनल की लांचिंग हुई है, प्रबंधन ने केवल एक बार पैसा दिया है. वो भी जमकर नौटंकी करने के बाद. आपको बता दूं कि चैनल शुरू होने से लेकर पिछले साल जुलाई तक का स्ट्रिंगरों का हिसाब मांगा गया था. स्ट्रिंगरों ने जब अपने बकाया पैसे का हिसाब दिया तो उसे काट-छांटकर आधा से भी कम कर दिया गया. स्ट्रिंगर भी नहीं मिलने से अच्‍छा कुछ मिले के दर्शन पर काम करते हुए आधा पैसा भी लेने को तैयार हो गए. हमलोगों ने भी हामी भर दी. पर प्रबंधन की हरामखोरी देखिए कि इस आधे पैसे को भी पूरा नहीं दिया गया.

प्रबंधन ने इस आधे का भी आधा यानी हमारे बकाया का चौथाई पैसा दिया और अगले महीने देने की कहकर हमलोगों को टाल दिया. अब तक वो अगला महीना नहीं आया है. खबरें छूटने पर इस तरह का व्‍यवहार किया जाता है जैसे हम इनके ही रहमोकरम पर जिंदा हैं. कहा जाता है कि काम करना है तो करो नहीं चलते बनो, सड़क पर बहुत पत्रकार हैं काम करने के लिए. अब समझ में नहीं आ रहा है कि हमलोग क्‍या करें. अगर पैसा क्‍लीयर कर दिया जाता तो शायद छोड़ ही देते, परन्‍तु मेहनत के पैसे डूब जाने के चलते अब भी कोल्‍हू के बैल की तरह पीस रहे हैं. इस उम्‍मीद में कि किसी दिन तो पैसा मिलेगा.

हम लोगों को तो ये भी समझ में नहीं आता कि आखिर प्रबंधन में बैठे और लाखों-हजारों की सेलरी पाने वाले लोग सोचते क्‍या हैं? क्‍या उन्‍हें ऐसा लगता है कि जिलों में या तहसीलों में काम करने वाले पत्रकार-स्ट्रिंगर हवा पीकर काम करते हैं या फिर उन्‍हें लगता है कि सभी पत्रकार दलाली करते हैं. शीशों में बैठकर दुनिया देखने वाले पत्रकारों के चलते ही पत्रकारिता कलंकित हो रही है क्‍योंकि मजबूरी में कुछ स्ट्रिंगर ब्‍लैकमेलिंग करने का भी राह अपनाने से नहीं चूकते हैं. अब आप ही बताइए इसमें दोष किसका है?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

 

 
 

 

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