जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में काम करने वालों को मई महीने की भी सेलरी नहीं मिली

जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ से खबर है कि यहां काम करने वाले कर्मियों को अब तक मई महीने से सेलरी नहीं मिली है. कर्मचारी सेलरी को लेकर परेशान हैं. बच्‍चों की फीस ए‍डमिशन समेत कई जिम्‍मेदारियां इसी महीने उनके ऊपर है लेकिन प्रबंधन ने अब तक उनको सेलरी नहीं दी है, जबकि जुलाई माह भी बीतने वाला है. कर्मचारियों को स्‍पष्‍ट बताया भी नहीं जा रहा है कि उन्‍हें किस तारीख को सेलरी दी जाएगी. ना ही सेलरी देने की कोई डेट फिक्स की जा रही है. 

पिछले कई महीनों से जनसंदेश टाइम्‍स के सभी ब्रांचों में सेलरी लेट-लतीफ आ रही है, जिससे कर्मचारी परेशान हैं. उधार-नगद लेकर वे अपने खर्च मैनेज कर रहे हैं. अवसर कम होने के चलते कर्मचारी चाह कर भी अखबार छोड़ नहीं पा रहे हैं. खबर है की जब से नए जनरल मैनेजर विनीत मौर्या आये हैं तब से ही ये गड़बड़ शुरू हो गयी है. ये भी खबर है कि ये साहब कर्मियों की सेलरी से प्रिंटिंग के लिए सामान खरीद रहे हैं इसीलिए कर्मियों को सेलरी नहीं मिल पा रही है. मैनेजमेंट भी कान मैं तेल डाले बैठा है. उसे तो अखबार छपने से मतलब है. कर्मियों के वेतन की चिंता नहीं है. पिछले दिनों जनसंदेश टाइम्‍स प्रबंधन ने ब्रांडिंग के नाम पर नाच-गाना कराने के लिए कई लाख रुपये खर्च किए, लाखों रुपये प्रधानमंत्री रहत कोष में दिए परन्तु कर्मियों की सेलरी देने के पैसे मैनेजमेंट के पास नहीं है. या ये कहें कि उसे कर्मचारियों की कोई चिंता नहीं है. इस वजह से भी मीडियाकर्मी नाराज हैं.

मीडियाकर्मियों का कहना है कि प्रबंधन के पास नाच-गाना में फूंकने के लिए पैसे हैं लेकिन कर्मचारियों को सेलरी देने के नाम पर उनके पास पैसे का अभाव है. बताया जा रहा है कि जनसंदेश टाइम्‍स लगातार घाटे में चल रहा है, जिसके चलते प्रबंधन इसमें पैसा इनवेस्‍ट करने में ज्‍यादा दिलचस्‍पी भी नहीं ले रहा है. सुभाष राय को प्रधान संपादक के रूप में लाने के बाद भी कंटेंट को लेकर यह अखबार अपनी कोई अलग छवि नहीं बना पाया है. विज्ञापन लाने में भी विनोद वर्मा कोई ख़ास जादू नहीं चला पा रहे हैं. उल्टा कंपनी का खर्च ही ज्यादा कर रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि इस अखबार के अन्‍य यूनिटों का हाल भी ऐसा ही है.

लखनऊ से एक जनसंदेशकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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