जनसत्ता निकलने के करीब दस साल बाद तक जनसत्ता का पर्यायवाची आलोक तोमर होता था

Shambhunath Shukla : कुछ यादें आलोक तोमर की! जनसत्ता ज्वाइन करने हम और राजीव शुक्ला एक अगस्त सन् १९८३ को गोमती एक्सप्रेस से दिल्ली आ गए। एक नई जगह और जानने वाला कोई नहीं। कहने को तो जनसत्ता डेस्क पर सबसे सीनियर श्री देवप्रिय अवस्थी कानपुर के ही थे लेकिन उनके अंदर कनपुरियों को लेकर कोई उत्साह नहीं था। उनसे हमने कहा कि कहीं सस्ते में ठहरने का इंतजाम करवा दीजिए तो उन्होंने कह दिया कि दिल्ली में सस्ते में तो खाना भी नहीं मिलता। लेकिन प्रभाष जी ने राजघाट के गेस्ट हाउस में पांच रुपये प्रति आदमी के हिसाब से कमरा दिलवा दिया।

तब वहां खाना तो सस्ता था ही कमरा दफ्तर के बहुत पास था। हम टहलते हुए बहादुरशाह जफर मार्ग स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग के अपने दफ्तर में चले जाते। साढ़े तीन रुपये में खाना मिलता जिसमें दाल, रोटी, चावल व एक सब्जी के अलावा मीठा भी रहता। मेरे और राजीव के बाद वहां लाइन लग गई। जिनमें सत्य प्रकाश त्रिपाठी और परमानंद पांडेय भी थे। दफ्तर के करीब होने तथा अखबार के तब तक न निकलने के कारण प्रभाष जी के भाषण से बचने के लिए अक्सर वहां आ जाते तेज तर्रार रिपोर्टर आलोक तोमर। उम्र में हम सबसे छोटे लेकिन कलम में अद्भुत जादू। और किस्सागोई में माहिर। एक दिन आते ही बोले-
    
इंटर द सिट डू एवरीथिंगा, कीपिंग इन द हार्ट कोशलपुर किंगा।
    
पहले तो समझ में ही नहीं आया कि इसका मतलब क्या है फिर उन्होंने ही बताया कि – प्रवसि नगर कीजे सब काजा। हृदय राखि कोशलपुर राजा।।
    
जब हम और राजीव शुक्ला राजघाट छोड़कर लोदी कालोनी रहने चले गए तो वहां भी आलोक अक्सर आ जाते। एक दिन बोले कि अपने एक साथी अच्छेलाल प्रजापति का नया नाम है- गुडरेड पब्लिक हजबैंड। ऐसे ही औरंगजेब का अंग्रेजी में नाम बताया- एंडकलरपाकेट। ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी आलोक का बहुत कम उम्र में ही निधन हो गया। आज अचानक एक पुरानी किताब मिल गई जिसमें लिखा था आलोक।
    
जनसत्ता निकलने के करीब दस साल बाद तक जनसत्ता का पर्यायवाची आलोक तोमर होता था। आप कहीं भी बताएं कि आप जनसत्ता में काम करते हैं तो यह जरूर कहा जाता था कि अच्छा आलोक तोमर के अखबार में। तमाम यादें हैं आलोक की। मेरी तीनों बेटियों का प्रवेश केंद्रीय विद्यालय में होना था। साथी अंबरीश कुमार के एक मित्र अजय मेहरोत्रा चंद्रशेखर सरकार के शिक्षा मंत्री राजमंगल पांडेय के अतिरिक्त निजी सचिव थे। उन्होंने राजमंगल पांडेय से बेटियों को केंद्रीय विद्यालय में प्रवेश के लिए संस्तुति करवा दी। पर अगले ही रोज चंद्रशेखर सरकार गिर गई। केंद्रीय विद्यालय संगठन के आयुक्त ने कहा कि प्रवेश तो अब जुलाई में होगा। मैंने कहा कि तब तक नई सरकार आएगी पता नहीं क्या नियम बना दे इसलिए आप अभी प्रवेश ले लो। लेकिन वे बोले कि नहीं कोई भी सरकार आए पुराने शिक्षा मंत्री के आदेश थेाड़ी ना बदले जाएंगे। मैं भी मान गया।

सरकार बदल गई और नई नरसिंह राव सरकार में मानव संसाधन मंत्री बने अर्जुन सिंह। उन्होंने केंद्रीय विद्यालय में प्रवेश के नियम बदलवा दिए। अब बड़ी मुश्किल। पुराने स्कूल वाले अब नई एडमिशन फीस मांग रहे थे जो कि तीनों बेटियों की करीब ५० हजार रुपये पड़ रही थी और मेरी पगार तब मुश्किल से चार हजार रुपये रही होगी। केंद्रीय विद्यालय संगठन के आयुक्त महोदय अब मिलने का भी समय न दें। मुझे पता था कि आलोक की अर्जुन सिंह तक पहुंच है। मैंने आलोक से कहा तो बोला कि जरूर हो जाएगा। आखिर मेरी भी तो भतीजियां हैं, एक एप्लीकेशन लिखकर दे दो। मैंने दे दिया। इसके बाद जो भी सुने वही कहे कि शंभूजी आप ५० हजार रुपये देकर वहीं एडमिशन करवा लो वर्ना आलोक के चक्कर में बेटियों का साल चला जाएगा। सांसत में मैं भी था पर आलोक ने जिस तरह कहा था उससे लगता नहीं था कि आलोक ने झूठ कहा होगा।

एक दिन चीफ रिपोर्टर सुशील सिंह ने तो कह दिया कि शंभूजी आप दिल्ली प्रशासन के स्कूलों में एडमिशन करवा लो, मैं करवा दूंगा। आलोक ने आज तक किसी का काम नहीं करवाया है। इसके दो या तीन दिन के बाद आलोक मंत्री का आदेश लेकर आ गया। और कुल पांच रुपये महीने की फीस में एडमिशन हो गया। जब मैं कोलकाता में था तब आलोक को कई बार कोलकाता आने का निमंत्रण दिया। बोला हां अपनी ससुराल जरूर आऊँगा पर (आलोक की पत्नी बंगाली जो हैं) आलोक कभी नहीं आए। अलबत्ता एक बार जब मैं दिल्ली आया तो आलोक के घर गया। उसने बताया कि बाजपेयी जी के साथ गोआ घूम कर आया हूं। मैंने पूछा कि कौन बाजपेयी जी बोला-अटल बिहारी बाजपेयी। उसके प्रधानमंत्री से बड़े ही घनिष्ठ संबंध थे लेकिन क्या मजाल है कि आलोक ने अपने संबंधों के आधार पर किसी से कोई फायदा उठाया हो। आलोक जैसे पत्रकार अब नहीं होते। यहां तक कि डेनिश कार्टूनिस्ट का कार्टून छापने के अपराध में जब दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने उसे गिरफ्तार करवाया तब भी आलोक ने कोई सरकारी मदद नहीं ली।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ला के एफबी वॉल से साभार.

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