Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

जब तक समाज में बंटवारा है, तब तक साहित्य में भी बंटवारा रहेगा

: दलित बहुजन साहित्य पर राष्ट्रीय सेमिनार : बारा चकिया (मुजफ्फरपुर, बिहार )। देश भर के जाने-माने दलित साहित्यकारों और विद्वानों ने दलित बहुजन साहित्य के सामाजिक सरोकारों पर खुलकर चर्चा की।

: दलित बहुजन साहित्य पर राष्ट्रीय सेमिनार : बारा चकिया (मुजफ्फरपुर, बिहार )। देश भर के जाने-माने दलित साहित्यकारों और विद्वानों ने दलित बहुजन साहित्य के सामाजिक सरोकारों पर खुलकर चर्चा की।

बी.आर.अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय के शिवदेनी राम अयोध्या प्रसाद महाविद्यालय, बारा चकिया में यूजीसी द्वारा सम्पोषित दलित बहुजन साहित्य पर राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन में क्षेत्र के सांसद राधामोहन सिंह, सुपरिचित लेखिका और चिंतक रमणिका गुप्ता, दलित साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय, डा. श्यौराज सिंह बेचैन, बुद्धशरण हंस, पूर्व कुलपति डा. रिपुसूदन श्रीवास्तव, डा. राजेन्द्र प्र. सिंह, डा. ललन प्र. सिंह, प्रो. रमा शंकर आर्य, बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. रिपुसूदन श्रीवास्तव, आकाशवाणी पटना के समाचार संपादक डा. संजय कुमार आदि विद्वान मौजूद थे एवं समापन विधायक श्री कृष्णनन्दन पासवान ने किया। 

24 और 25 मई को सेमिनार के विभिन्न सत्रों में ‘अभिजन बनाम बहुजन साहित्य’, दलित साहित्य के प्रेरणा-स्रोतः फूले, अम्बेडकर, पेरियार, शाहूजी महाराज, अछूतानन्द, चोखामेला, घासीराम आदि, दलित रचनाओं, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक में चित्रित यथार्थ, दलित साहित्य में स्त्री बलात्कार का समाजशास्त्र, पुरुष निर्मित स्त्री छविया- स्वकीया, परकीया, वेश्या और रखैल, सावित्रीबाई, ताराबाई शिंदे, फातिमा शेख, महिला आरक्षण और बहुजन स्त्रिया, दलित साहित्य और मीडियाः जाति, अपराध और भ्रष्टाचार, बहुसंस्कृति और दलित साहित्यः सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम बहुसंस्कृतिवाद, आतंकवाद, नक्सलवाद और आनन्दवाद, स्वान्तः सुखाय का शांतिपाठ बनाम आम आदमी इत्यादि विषयों पर चर्चा हुई।

इस अवसर पर डा. हरिनारायण ठाकुर की पुस्तक ‘दलित साहित्य का समाजशास्त्र’, डा. मनोरंजन सिंह की पुस्तक ‘प्रेमचंद के साहित्य में राष्ट्रीयता’ और शोध-स्मारिका ‘संकल्प’ का लोकार्पण किया गया। सांसद राधामोहन सिंह ने दलित और पिछड़ों के साहित्य को केन्द्र में आने की प्रशंसा की और इसे समय की मांग बताया। बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. रिपुसूदन श्रीवास्तव ने भारत में जाति व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए दलित साहित्य को समय की मांग बताया। विश्वविद्यालय के दूरस्थ शिक्षा केन्द्र के निदेशक डा. कुमार गणेश ने वाल्मीकि और व्यास को भारत के पहले दलित कवि के रूप में चित्रित किया।

बहुजन साहित्य पर बोलते हुए रमणिका गुप्ता ने कहा-‘अभिजन समाज के लोगों ने समाज को बांट के रखा है। जब तक समाज में बंटवारा है, तब तक साहित्य में भी बंटवारा रहेगा। इसी बंटवारे के कारण दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य, स्त्री साहित्य, ओबीसी साहित्य आदि का जन्म हुआ है, जिसका दायरा बहुत बड़ा है और यह पूरी मानवता का साहित्य है। इसने साहित्य के सामने लम्बी रेखा खींचकर तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य (अभिजन साहित्य) को छोटा कर दिया है।

दलित साहित्य पर प्रकाश डालते हुए मोहनदास नैमिशराय ने कहा कि यद्यपि फूले ने स्त्रियों को भी शूद्रातिशूद्र की श्रेणी में गिना था, किन्तु मेरी दृष्टि में सभी स्त्रियों को दलित नहीं माना जा सकता। जो स्त्रियाँ अपने फैसले स्वयं लेती हैं, वे दलित नहीं हैं। दूसरी बात स्त्रियाँ भी जाति निरपेक्ष नहीं होती। दलित साहित्य शुद्ध रूप से अम्बेडकरी विचारधारा पर आधारित साहित्य है, इसमें गाँधी की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। यदि ओबीसी साहित्य गाँधी और बाबा साहब को लेकर कोई सकारात्मक सैद्धांतिकी खड़ा कर सके, तो उसका स्वागत है। दलित साहित्य दलितो द्वारा लिखा गया मानवता का साहित्य है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के वरीय प्रोफेसर डा. श्यौराज सिंह बेचैन ने ‘दलित साहित्य कौन लिख सकता है’ विषय पर बोलते हुए कहा कि कोई अभिजात्य यह क्यों दावा करता है कि वह दलित साहित्य लिख सकता है, जबकि स्वानुभूति और सहानुभूति जनित साहित्य में पर्याप्त अन्तर है। गैर-दलित साहित्यकारों द्वारा लिखा गया दलित विषयक साहित्य दोहरे चरित्र का साहित्य है।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए दलित साहित्य के प्रथम कहानीकार बुद्धशरण हंस ने कहा कि आज जब दलित अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का बयान कर रहे हैं, तो अभिजात्य वर्ग के लोग इसे भूल जाने की बात करते हैं। मैं कहता हूँ भूलने का माहौल तो पैदा करो, आखिर दुख के दिनों को कौन याद करना चाहता है। दलित उत्पीडन और अत्याचार तो आज भी जारी है। पटना विवि के दलित विचारक प्रो. रमा शंकर आर्य ने दलित साहित्य के प्रेरणा-स्रोत के रूप में महात्मा फूले और बाबा साहब डा. अम्बेडकर के विचार-दर्शन पर विस्तार से प्रकाश डाला। शोधार्थियों और वक्ताओं ने सावित्रीबाई, शहूजी महाराज, पेरियार, घासीराम और चोखामेला के जीवन पर भी प्रकाश डाला।

ओबीसी साहित्य पर बोलते हुए सासाराम से आये सुपरिचित भाषाविद् डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने कहा कि कामगार किसान, कारीगर, मजदूर और पशुपालकों का साहित्य ही ओबीसी साहित्य है। यदि भारतेन्दु से लेकर प्रसाद, रेणु और आज के ओबीसी कवि साहित्यकारों तक के विपुल साहित्य का अध्ययन किया जाये, तो उनका अन्तिम निष्कर्ष और चिन्तन ब्राह्मणवाद का विरोधा करता है। ओबीसी साहित्य का दायरा बड़ा है और हिन्दी साहित्य के सभी कालखण्डों में इसकी पहचान की जा सकती है।

ओबीसी साहित्य की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए आरा से आये डा. ललन प्रसाद सिंह ने कहा कि 5042 जातियों वाले साहित्य को ही हम ओबीसी साहित्य कहेंगे। संस्कृत में वैदिक साहित्य एवं लौकिक साहित्य के दो विभाजन है। वैदिक साहित्य ब्राह्मणों का है, जबकि लौकिक साहित्य (प्राकृत और अपभ्रंश सहित) ओबीसी का है। अभिजन साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र से कबीर और रेणु के साहित्य का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। ओबीसी साहित्य जातिवाद और वर्णवाद का विरोध करता है। प्राचीन मगध साम्राज्य का सम्पूर्ण साहित्य ओबीसी साहित्य है। मौर्यों के बाद अभिजनों ने भारत की एकता छिन्न-भिन्न कर दी।

दलित साहित्य और मीडिया पर विचार रखते हुए आकाशवाणी पटना के समाचार संपादक डा. संजय कुमार ने कहा कि जब मीडिया में दलित है ही नहीं, तो दलित साहित्य को जगह कौन देगा? मीडिया या तो दलित इश्यू उठाता ही नहीं, या उठाता भी है, तो दलितों की गलत तस्वीर पेश करके। हारकर दलितों ने अपना वैकल्पिक मीडिया खड़ा कर लिया है। फारवर्ड प्रेस, बयान, अपेक्षा, युद्धरत आम आदमी, दलित साहित्य, बहुजन इंडिया सहित आज दलित-पिछड़ों के दर्जनों दैनिक, मासिक, पाक्षिक, त्रौमासिक और वार्षिक पत्र-पत्रिकाएँ हैं। कई इलेक्ट्रानिक चैनेल है। इनकी संख्या और बढ़ेगी। मीडिया में दलितों की उपेक्षा के कारण ही ऐसा हुआ है।

बहुसंस्कृति और दलित साहित्य पर बोलते हुए समारोह के आयोजक और सुपरिचित लेखक हरिनारायण ठाकुर ने कहा कि भारत संस्कृति नहीं, संस्कृतियों का देश है। यहाँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा चल ही नहीं सकती। क्योंकि भारत सहित दुनिया का कोई देश आज राष्ट्र नहीं है। एक भाषा, एक साहित्य, एक संस्कृति, एक धर्म, एक आचार-विचार की सोच ने इस देश का बहुत नुकसान किया है। अनेकता में एकता का आकर्षक नारा तो दिया गया, किन्तु व्यवहार में सभी धर्मों, वर्गों, भाषा और संस्कृतियों का आदर नहीं किया गया। फलतः अनेक भाषा और संस्कृतियाँ मरती चली गयी। अनेक जातियाँ और समूह हाशिये पर चले गये। दलित, आदिवासी, स्त्री, अल्पसंख्यक और अब ओबीसी साहित्य इन्हीं हाशिये के लोगों का साहित्य है।

यौन हिंसा और बलात्कार, वेश्या, रखैल और काल गर्ल पर मोहनदास नैमिशराय, रमणिका गुप्ता, प्रो. अर्चना वर्मा, प्रो. सुनीता गुप्ता, प्रो. पूनम सिंह, डा. पुष्पा गुप्ता आदि ने विचार रखे। बलात्कार के मनो-सामाजिक पहलुओं की खोज की गयी और इसके समाधान की आवश्यकता बताई गयी। भारत में अधिकतर दलित-पिछड़ी औरतें ही इन घटनाओं और परिस्थितियों की शिकार होती हैं। सेमिनार के सत्रों का सफल संचालन डा. अरुण कुमार एवं संयोजन डा. मनोरंजन सिंह ने किया।

सेमिनार के अंतिम दिन सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये- 1. विगत दस वर्षों से बी.आर.अम्बेडकर बिहार विवि के स्नातकोत्तर कक्षाओं में अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाये जा रहे ‘दलित साहित्य’ को हाल ही में ‘वैकल्पिक विषय’ के खाते में डाल दिया गया है। इसे फिर से अनिवार्य विषय बनाया जाये। 2. देश के सभी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में ‘दलित सहित्य’ को अनिवार्य विषय बनाया जाये। 3. यूजीसी ‘नेट’ की तरह देश के तमाम विश्वविद्यालयों की शोधापूर्व परीक्षाओं में दलित-पिछड़ों को प्राप्तांक में ग्रेस एवं सीटों में आरक्षण दिया जाये। 4. देश के तमाम कल्याण छात्रावासों के नाम डा. अम्बेडकर और बिरसा मुंडा के नाम पर रखा जाये। 5. विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभागों में नियुक्ति एवं स्थानान्तरण में सरकारी आरक्षण के अनुरूप ‘पोस्ट-रोस्टर’ लागू किया जाये। 6. कुलपतियों, प्रतिकुलपतियों, कुलसचिवों की नियुक्ति में दलित-पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू किया जाये। 7. दलित और बहुजन साहित्य और मीडिया के लेखन और प्रकाशन को प्रोत्साहित करने के लिए लेखक/ संपादक और पत्रकारों को सरकारी अनुदान दिये जायें। 8. आदिवासी अस्मिता की रक्षा की जाये। 8. इन प्रस्तावों को यूजीसी, एच.आर.डी. भारत सरकार, प्रांतीय सरकार, विश्वविद्यालय के माननीय कुलाधिपति एवं कुलपतियों को सूचनार्थै एवं आवश्यक कार्यार्थ प्रेषित किया जाये। (प्रेस रिलीज)

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...