जब पता चला कि लड़का मेरा भतीजा है तो लोग अपने स्कोर सेटल करने लगे

जीवन में काफी कुछ महत्वपूर्ण अनायास ही होता रहा है इसी क्रम में जेल यात्रा भी अनायास ही हो गई वह भी ऐसे अपराध में जो मैंने किया ही नहीं था। किशोरावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक छात्र, किसान मजदूर, अध्यापक, पत्रकार और जनांदोलनों में सक्रिय भागीदारी करता रहा और अनेक बार गिरफ्तारी भी दी कई बार जेल यात्रा भी की मगर जो यह जेल यात्रा हुई इसके अपने ही अनुभव रहे। 
 
हुआ यह कि मेरे छोटे भाई का लड़का अपने एक मित्र के साथ कांधला के पास एक गांव में गया। वहां उसकी आंखें एक युवती से चार हो गईं और दोनों के बीच प्रेम का अंकुर फूटने लगा तो मोबाइल पर लंबी-लंबी बातें होने लगीं। कभी लड़की लड़के को कांधला बुला लेती तो कभी लड़का उसे दादरी बुला लेता इस प्रकार यह प्रेम कहानी चलती रही और एक दिन यह प्रेमी युगल गायब हो गया। यहां जो इस प्रेम कहानी का खतरनाक पहलू था वह यह कि लड़की हिंदू थी और लड़का मुसलमान था। लड़की का परिवार एक सप्ताह तक अपने तौर पर खोज करता रहा मगर जब कोई सुराग न मिला तो थाने में लड़की की एक सहेली, लड़के के एक मित्र और वह लड़का इन तीनों के नाम से रपट दर्ज करा दी और चूंकि मामला दो सम्प्रदायों से जुड़ा था इसलिए रपट के साथ ही गांव के सैकड़ों लोगों ने थाने पर धरना आरंभ कर दिया जिस में स्थानीय नेता भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने लगे।
 
पुलिस पर लड़की की बरामदगी का दबाव बढ़ा तो पुलिस ने लड़के के परिवार वालों को उठाना शुरू कर दिया। यह यूपी पुलिस का पुराना तरीका है मगर प्रेमी युगलों के बारे में यह कामयाब नहीं होता। इस बीच लोगों को यह भी पता चल गया कि लड़का मेरा भतीजा है तो कई लोग मुझसे अपने पुराने स्कोर सैटिल करने के लिए सक्रिय हो गए। लड़की के गांव के एक नेता जो मुझे जानते थे अपनी राजनीति चमकाने के लिए पुलिस पर मुझे अरेस्ट करने का दबाव बनाने लगे। इस मामले का जांच अधिकारी दबाव में नहीं आया तो उन्होंने थानेदार पर दबाव बनाया और एक दिन थानेदार अंधेरा होने पर पुलिस बल के साथ गांव आया। मैं और मेरा छोटा पुत्र घर के आगे हवा में बैठे थे। पुलिस की जीप हमारे पास आ कर रूकी और उसमें से सिपाही उतरे और मुझे तथा मेरे पुत्र को जीप में डाल लिया और जब तक कोई कुछ समझता जीप रवाना हो गई। जीप रवाना होते ही मैं थानेदार से उलझ गया कि मुझे क्यों और कहां ले जाया जा रहा है। थानेदार ने मुझे पकड़ तो लिया था मगर वह घबराया हुआ था उस पर कोई जवाब नहीं बन रहा था। मैं रास्ते भर पुलिस से उलझता रहा आधी रात के आस-पास जीप कांधला आ गई थानेदार हमें सिपाहियों के सुपुर्द कर जाने लगा तो मैंने उसे रोक कर कहा कि रात में आप मेरे साथ जो व्यवहार करें स्वतंत्र हैं मगर कल का दिन आपको भारी पड़ेगा।
 
हमें हवालात में नही डाला गया। आफिस में ही एक दरी पर लेटने का प्रबंध कर दिया गया। उधर मेरे बड़े लड़के ने रात में ही फोन से कुछ परिचित पत्रकारों को इस बारे में सूचित कर दिया था। दिन चढ़ते ही थाने में पत्रकार आने लगे तो थानेदार घबरा गया और थाना छोड़ कर जिला मुख्यालय चला गया साथ ही दारोगा को कुछ हिदायत दे गया। दारोगा बार-बार मुझसे माफी मांग कर बताता रहा कि इसमें उसका कोई हाथ नहीं है। उसी ने मुझे बताया कि आपको जेल भेजा जा रहा है हालांकि ऐसा पहले कुछ नहीं था मगर थाने में पत्रकारों की आवाजाही के चलते यह करना पड़ रहा है। कागजात तैयार किए गए और दोपहर बाद हमें थाने से अस्पताल लाकर मेडिकल कराया और मुजफ्फरनगर के लिए रवाना हो गए। मुझ पर आरोप लगाया गया कि मैने लड़की को अपने घर में शरण दी थी इस बारे में दो गवाहों के फर्जी बयान भी तैयार कर लिए गए। मेरे जेल जाने के अगले दिन अखबारों ने मेरी गिरफ्तारी के विरोध में शोर मचाना आरंभ कर दिया अखबारों की रपट के आधार पर प्रेस काउंसिल आफ इंडिया ने स्वतः संज्ञान लेकर सरकार को नोटिस जारी कर दिया। दिल्ली में डीयूजे ने प्रदर्शन किया। एक खुशखबरी जो मुझे मिली वह यह थी कि दिल्ली में झुग्गी झोंपड़ी संघर्ष मोर्चा ने भी मेरे लिए प्रदर्शन किया था। इधर सहारनपुर मंडल के अखबार विरोध कर रहे थे तो उधर लखनऊ में भी कुछ पत्रकार मित्र सरकार से लिखा पढ़ी कर रहे थे। इस बीच बिहार के एक सांसद ने यह मामला लोकसभा में उठा दिया था।
 
जेल के अपने अनुभव रहे। एक महीने बाद जमानत पर बाहर आए। प्रेमी युगल का किसी को कोई पता नहीं था। आशंका यह भी व्यक्त की जा रही थी कि मामला चूंकि मुजफफरनगर जिले का है इसलिए हो सकता है दोनों को साफ कर दिया हो चूंकि इस जिले में आए दिन ऐसे मामले होते रहते हैं मगर ऐसा नहीं हुआ। डेढ साल बाद प्रेमी युगल इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रकट हो गया और उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर निरस्त करने की फरियाद की इस पर अदालत ने मुजफ्फरनगर में चल रहे मुकदमे पर स्थगन आदेश जारी कर अभियोजन को नोटिस जारी कर दिया। 2009 से यह मामला अब स्थगन आदेश में लटका हुआ है। इधर मुजफ्फरनगर में मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी थी कि प्रेस काउंसिल का नोटिस पहुंच गया उसका जवाब सरकार को देना था मगर किसी गवाह ने मेरा नाम ही नहीं लिया था तो प्रशासन के सामने संकट आ गया तो सरकरी वकील से सलाह ली गई। सरकारी वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देकर एक और गवाह पेश करने की अर्जी लगा दी। अभियोजन का मकसद इस गवाह से मेरा नाम लिवाना था मगर उससे पहले स्थगन आदेश आ गया।
 
हालांकि पता तो पहले भी था मगर इस मुकदमे में प्रत्यक्ष देखा कि पुलिस किस तरह की कहानियां बनाती है और गवाहों से किस तरह झूठे बयान दिलवाती है। पांच साल हो गए मुकदमा अभी भी लंबित है और उधर प्रेमी युगल इस सबसे बेपरवाह मौज कर रहा है। पता यह भी चला है कि अब वे बाल बच्चेदार भी हो गए हैं।

 

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207

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