जब मज़दूरों का गुस्सा फूटा तो सारे दलाल वकील-पत्रकारों ने फौरन कंपनी के पक्ष में मोर्चा संभाल लिया

Shahnawaz Malik : ठीक 11 महीने पहले 18 जुलाई 2012 को मारूती सुजुकी कंपनी के मानेसर प्लांट में मज़दूरों ने विद्रोह किया था। कंपनी मजदूरों से इस कदर काम ले रही थी कि वे इंसानों की शक्ल में मशीन जैसे हो गए थे। अमानवीय हालात में लगातार खटने और पिसने के बाद जब मज़दूरों का गुस्सा फूटा तो सारे सफेदपोश कंपनी का भोंपू बन गए। दलाल वकील-पत्रकारों ने फौरन मोर्चा संभाल लिया।

आखिरकार विद्रोह कुचल दिया गया और तमाम मजदूर हिंसा भड़काने के आरोप में जेल में ठूंस दिए गए। सभी राजनीतिक दलों ने अपने मुंह पर ताला लटका लिया। मजूदर बड़ी उम्मीद के साथ आम आदमी के नए 'मसीहा' केजरीवाल से दर्जनों बार मिले लेकिन वो असहयोग और सत्याग्रह आंदोलन करते रहे। कल जब पाणिनी आनंद पीयूडीआर की परिर्चचा में इन सारी बातों का ज़िक्र कर रहे थे तो मेरे भीतर का कवि जाग उठा। कवि बार-बार एक ही रट लगाए था कि 'आम आदमी कौन है, टीम केजरीवाल मौन है'. ख़ैर इस दौरान Panini Anand ने एक निहायत संजीदा कविता सुनाई। मारूती सुजुकी जैसी कंपनियों की शिनाख्त के लिए इसे बार-बार पढ़ा जाना चाहिए…

आग किसी को नहीं पहचानती है
और न किसी एक की बपौती होती है
पहले होती थी
जब ठकुराइन के घर आग मांगने आती थी नाउन
अपना चूल्हा जलाने के लिए
बदले में बुझाने पड़ते थे शरीर
ठकुराइन के नाखून काटने पड़ते थे

पर अब आग शहर चली आई है
और शहर में बाज़ार ने आग बिखेर रखी है
इस बिखरी आग पर चल रहे हैं लोग,
नंगे पांव

पत्रकार शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से.

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