Abhishek Srivastava : (कल एक मित्र के लिए एक पुस्तक खोजते वक्त आलमारी में कहीं दबी पड़ी एक बहुत पुरानी किताब पर नज़र पड़ी। लखनऊ की न्यू जनता प्रेस से 1967 में छपी ''कम्युनिस्ट नैतिकता'' नाम की यह किताब अब आउट ऑफ प्रिंट है। मुझे ल्रगता है कि इसका सार्वजनिक पाठ कई मामलों में आज बेहद प्रासंगिक और बहसतलब होगा। लीजिए, प्रस्तुत है आज का पहला सबक)
''…उस ज़माने में कुछ अति-क्रान्तिकारियों ने 'पानी के गिलास' की एक थ्योरी चलाई थी। वे कहते थे कि, 'कम्युनिस्ट समाज में अपनी यौन इच्छा तथा प्रेम-पिपासा की पूर्ति करने का कार्य वैसे ही सीधा-साधा तथा महत्वहीन है जैसा कि एक गिलास पानी पी लेना होता है।' तभी लेनिन ने क्लारा जेटकिन से कहा था कि 'पानी के गिलास के सिद्धांत को लेकर हमारा युवक वर्ग पागल हो उठा है… यह सिद्धांत अनेक लड़के-लड़कियों के लिए घातक सिद्ध हो चुका है… ऐसे मार्क्सवाद से खुदा बचाए…।' लेनिन ने जेटकिन से आगे कहा: 'निस्संदेह, प्यास बुझनी चाहिए… किन्तु इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू तो सामाजिक है। पानी पीना वास्तव में एक व्यक्तिगत चीज़ है। किन्तु प्रणय में दो प्राणी भाग लेते हैं और एक तीसरे नए प्राणी का जन्म हो जाता है। यही उसमें समाज की दिलचस्पी का कारण होता है। इसलिए सामूहिक समाज के प्रति कत्तर्व्य-भावना का प्रश्न उत्पन्न हो जाता है।'''
(माओवादियों और संघी जमातों में लिव-इन सम्बन्धों पर रोक, समलैंगिकता, इत्यादि के संदर्भ में)
पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.






