जरूरी और मजबूरी के मंथन से निकले उपाध्यक्ष और अध्यक्ष

 

भूमिका बांधने या इधर-उधर की हांकने की अपेक्षा सीधे मुद्दे पर ही आ जाते हैं. जयपुर की ऐतिहासिक व रणबांकुरों की धरती पर कांग्रेस के रणबांकुरों ने २०१४ के आम चुनावों की तैयारी और अपने युवराज राहुलगांधी को महत्वपूर्ण रोल या पद देने व भविष्य के प्रधानमंत्री के नाते तैयार करने के लिए कांग्रेसजनों की पुरजोर अपील को अमलीजामा पहनाने के लिए चिंतन-मंथन का शिविर लगाया और राष्ट्रीय अध्यक्षा के एकलौते पुत्र को उपाध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया. आवश्यकता तो इस बात की थी कि यदि वह अतिमहत्वपूर्ण हैं तो उन्हें अधिक महत्वपूर्ण दायित्व भी दिया जाता. दायित्व का अर्थ यह है कि सफलता के साथ-साथ असफलता भी उनके सर मढी जाए. 
२००९ के लोकसभा के चुनावों में उत्तर प्रदेश में २२ सीटों पर विजय पाने वाली कांग्रेस के नेता जिस प्रकार इस विजय का श्रेय राहुल गांधी को देने में सौभाग्य समझते हैं उसी प्रकार २०१२ में उत्तर प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस की पराजय का ठीकरा भी उन पर फोड़ा जाता. परन्तु ऐसा कभी नहीं होगा. जब राहुल के बदले पराजय की जिम्मेवारी लेने व शहीद होने के लिए अनेक अन्य नेता व पदाधिकारी उपस्थित हों तो इसमें राहुल की क्या गलती? अनेक विषम परिस्थितियों व समस्याओं से जूझते देश को सत्ताधारी दल द्वारा जयपुर में आयोजित चितन-मंथन से बहुत ही आशाएं थीं. देश को लगता था कि चाहे २०१४ के आम चुनावों की तैयारी के नाते ही सही, कांग्रेस देश में बढ़ रही महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आर्थिक मंदी, बढते अपराध व दिल्ली में दामिनी बलात्कार के विरोद्ध में छात्र-छात्राओं द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन में उठाई गई मांगों व कारगर उपाय तलाशने के लिए ही तीन दिवस का चिंतन-मंथन शिविर करने जा रही है. परन्तु दुर्भाग्य इस देश का कि जो कार्य महज चार पंक्तियों के आदेश द्वारा दिल्ली से ही जारी किया जा सकता था, उसके लिए इतने खर्चीले-भड़कीले मंथन की आवश्यकता क्यूँ? देश के आमजन की समझ से यह बहुत दूर है. हाँ, देश को इतना तो समझ में आता है कि इस मंथन का नाटक कांग्रेस के लिए जरूरी था क्यूँ कि किसी साधारण व्यक्ति की पदोन्नति ना होकर राजपरिवार के एक सदस्य की ताजपोशी थी जिसके लिए एक बड़े तामझाम की आवश्यकता थी. इसके साथ ही कांग्रेसजनों के साथ-साथ देश को यह सन्देश देना भी जरूरी था कि मनमोहनसिंह को अब कभी भी प्रधानमंत्री के पद से हटाया जा सकता है और २०१४ के आम चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में ही लड़ा जायेगा.
 
कभी वह समय भी था जब राष्‍ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों में प्राथमिक सदस्य से लेकर राष्ट्रीय पदाधिकारी बनने में कार्यकर्ताओं को पचासों वर्ष लग जाया करते थे, तब भी उन पदों पर आसीन होने को अनेकों तरसते रह जाते थे. अब पैराशूट का जमाना आ गया है. कब कौन ना जाने कहाँ से आकर प्रदेश या राष्ट्रीय संगठन के किस पद पर सुशोभित हो जाये पता ही नहीं चलता. यही हाल चुनावों के समय टिकटों के आबंटन का है. शीर्ष नेतृत्व या अन्य नेताओं से जुगाड बैठा कर जुगाडू किस्म के लोग टिकट प्राप्त कर लेते हैं और कर्मठ व जमीनी कार्यकर्ता देखते रह जाते हैं. यह प्रवृती केवल कांग्रेस में ही है ऐसा नहीं है. लगभग सभी दलों में प्राय ऐसा ही हो रहा है. मजे की बात तो यह है कि राहुल गांधी ने इस पर रोक लगाने की बात कही है, जो स्वयं ही राजघराने से सम्बन्ध रखने के कारण ही उपाध्यक्ष के पद पर पहुँचने में सफल रहे हैं. क्या वह इसको रोक पाएंगे…?
 
दूसरी ओर २०१४ के लिए कमर कस कर बैठी भाजपा की राष्ट्रीय अंतर्कलह समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही है. मुख्य विपक्षी दल होने के नाते सरकार को राष्‍ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर उसकी अनेक विफलताओं के लिए घेरने की अपेक्षा भाजपा अपनी अंतर्कलह से ही नहीं उभर पा रही है. जिसके चलते ऐसे तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों जिन पर सरकार को घेरा जा सकता था, महज रिवायती वक्तव्यों व धरने-प्रदर्शन से औपचारिकता का निर्वाह किया जा रहा है. दूसरी पंक्ति के शीर्ष नेतृत्व में बढ़ती गुटबाजी के कारण ही गडकरी जैसे कनिष्ठ व्यक्ति को राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर बैठाया गया था, जिसको राष्ट्रीय संगठन के किसी पद पर कार्य करने का अनुभव तक नहीं था. वास्तव में कारण कुछ भी रहे हों परन्तु इस अनुभवहीनता के कारण ही गडकरी के कार्यकाल की असफलताएं अधिक बताई जा रही हैं. उत्तराखंड में अकारण व असमय मुख्यमंत्री निशंक को हटाकर खंडूरी को बैठना जिसके कारण उत्तराखंड में चुनावों में भाजपा की पराजय हुई और यह राज्य कांग्रेस के हाथों में चला गया. दूसरे, उसी दौरान हिमाचल में भी पार्टी में अंतर्कलह की धधकती आग में आरोप-प्रत्यारोपों के दागे जानेवाले गोले इसे जंगल की आग में बदलने को आतुर हो रहे थे. 
 
बढ़ती गुटबाजी और अनुशासनहीनता को समय रहते किसी कद्दावर राष्ट्रीय नेता द्वारा बीच-बचाव कर काबू करने के लिए कोई परिश्रम नहीं किया गया. उलटे प्रदेश भाजपा के संस्थापक सदस्य, पूर्व सांसद व प्रदेशाध्यक्ष कुल्लू के महेश्वरसिंह को ललकारने के लिए उनके गृह जिले कुल्लू में ही रैली कर गडकरी धूमल की पीठ थपथपा कर असंतोष को विद्रोह में बदलने का कार्य कर गए और महेश्वर सिंह ने भाजपा से किनारा कर अपने अलग दल का गठन कर लिया. दूसरी ओर कांगड़ा-चम्बा के सांसद डा. राजन सुशांत की नाराजगी भी अनसुनी की गई और उन्हें निलंबित कर दिया गया. तीसरे, पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी प्रदेश संगठन और सरकार में अनदेखी के चलते यदा-कदा अपने व्यंग बाण छोड़ कर प्रदेश की सरकार व संगठन को सांसत में डाले रहते थे. हिमाचल प्रदेश के इन तीन बड़े नेताओं की अनदेखी ने ही चुनावों में भाजपा के मिशन रीपीट को डिफीट में बदल दिया और यहाँ कांग्रेस की सरकार बन गयी. क्या गडकरी प्रदेश के इन तीन बड़े नेताओं के असंतोष को समय रहते दूर नहीं कर सकते थे? इसी प्रकार गडकरी ने कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे येद्दुरप्पा को भी नाराज किया, जिसके अथक प्रयत्नों से ही दक्षिण में पहली भाजपा की सरकार बनी थी. गडकरी के अड़ियल रवैये के चलते ही येद्दुरप्पा भाजपा से बाहर अपना ठिकाना बनाने को विवश हुये. क्या कोई बीच का मार्ग निकल नहीं सकता था?
 
मजे की बात तो यह है कि जिन आरोपों के चलते येद्दुरप्पा को मुख्यमंत्री का पद त्यागने को मजबूर किया गया था, ऐसी ही अनियमतताओं के आरोप स्वयं पर लगने पर गडकरी को स्वयं ही राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ देना चाहिए था. परन्तु इसके ठीक विपरीत “परउपदेशक बहुतेरे” वाली कहावत चरितार्थ करते हुये गडकरी दूसरे कार्यकाल की अपेक्षा लगाये बैठे थे. अंततः उनको जाना ही पड़ा और अब भाजपा को मजबूरी में राजनाथ सिंह की राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताजपोशी करनी पड़ रही है. मजबूरी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह संगठन के लिए कितने कारगर साबित होंगे यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है. परन्तु इतना तो स्पष्ट है कि जरूरी या मजबूरी में बनाये गए पदाधिकारिओं द्वारा ना तो सुचारू रूप से संगठन ही चलाये जा सकते हैं और ना ही चुनावों की वैतरणी ही पार लांघी जा सकती है. ऐसे में २०१४ के चुनावों के नतीजे क्या होंगे इसका अंदाजा सरलता से लगाया जा सकता है. नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए २४ जनवरी से राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय गृहमंत्री शिंदे के हिंदू या भगवा आतंकवाद पर दिए गए विवादित बयान के विरोद्ध में चलाये जानेवाले आन्दोलन से अधिक आवश्यक और महत्वपूर्ण है भाजपा की कर्नाटक सरकार और संगठन को बचाने की. यदि समय रहते कुछ त्वरित कर्बी नहीं की गई तो कर्नाटक में भाजपा का वर्तमान और भविष्य दोनों ही संकट में दिखाई दे रहे हैं. २०१४ में होनेवाले लोकसभा के चुनावों में इन दोनों बड़े दलों की सीटें अवश्य ही घटनेवाली है….जिसे कोई नहीं रोक सकता.
 
लेखक विनायक शर्मा विप्र वार्ता के संपादक हैं.  

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