जर्नलिस्ट सॉलिडेरिटी फोरम का गठन, परसों बुधवार दिन में दो बजे आईबीएन7 के दफ्तर पर प्रदर्शन

Abhishek Parashar : मीडियाकर्मियों की छंटनी के खिलाफ आज (रविवार को) कॉफी हाउस में हुई बैठक के दौरान जर्नलिस्ट सॉलिडेरिटी फोरम नाम के संगठन को खड़ा किया गया है और इस बुधवार को दोपहर 2 बजे आईबीएन7 के दफ्तर के बाहर विरोध प्रदर्शन करने का फैसला लिया गया है. विरोध प्रदर्शन को मुखर बनाने के लिए तमाम मजदूर संघों और छात्र संघों से इसमें शामिल होने की अपील की गई है. प्रबंधन द्वारा निकाल बाहर फेंके गए पत्रकारों के अलावा अन्य मीडिया संस्थान में काम करने वाले पत्रकार बंधुओं से अपील है कि वह यहां पहुंचे.

यह विरोध प्रदर्शन प्रबंधन और मीडिया मालिकान की जोर जबरदस्ती और मनमाने रवैये के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत की तरह है. जिस तरह से मीडियाकर्मियों को बाहर निकाला गया है उसने संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बीच के भी फर्क को मिटा दिया गया है. बहरहाल बातें और शिकायतें ढेर सारी है लेकिन फिलहाल समय की मांग संगठित और क्रूर प्रबंधन के खिलाफ हमारे संगठित होने की है.

बिजनेस स्टैंडर्ड में कार्यरत अभिषेक पाराशर के फेसबुक वॉल से.

Samar Anarya : जब आप मीडिया में बरास्ते रिलायंस वाले मुकेश अम्बानी आता काला धन नहीं देखेंगे तो फिर कुछ दिन बाद आने वाली पिंक स्लिप्स (बर्खास्तगी) को रोक नहीं पायेंगे. आप हिन्दुस्तान टाइम्स की आलीशान इमारत के सामने सालों से बैठे बर्खास्त कर्मचारियों के लिए लड़ने की जगह वीर सांघवियों को राडियागेट करने देंगे तो आग नेटवर्क18 तक पंहुचने से नहीं रोक पायेंगे. बाकी कम ही लड़ाइयाँ दूसरा मौका देती हैं. इसने दिया है सो छोड़िये मत. आज आपके 350 दोस्त /दुश्मन / रकीब / आशना हैं. कल आप होंगे. सो उसके पहले जर्नलिस्ट सॉलिडेरिटी फोरम के द्वारा बुधवार को दोपहर 2 बजे आईबीएन 7 के दफ्तर के बाहर बुलाये गए विरोध प्रदर्शन में पंहुचिये. पंहुचिये कि आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छायेगा. और हाँ, इस बार बच गए तो अगली बार कलमों का रुख मानेसर से लेकर दुनिया भर के मजदूरों की तरफ़ मोड़ दीजियेगा. कि आपकी कलम आम अवाम के लिए जितना बोलेगी आप भी बस उतना ही सुरक्षित है. मैं दूर हूँ, पर साथ हूँ. आप तय कर लें.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

छंटनी के मसले पर फेसबुक पर प्रतिक्रियाओं का आना जारी है. नीचे कुछ चुनिंदा प्रतिक्रियाएं…


Abhishek Parashar : जिस दिन मुकेश अंबानी भारत के सबसे बड़े बनिया यानी रिटेलर बने उसी दिन नेटवर्क 18 ने 300 से अधिक मीडियाकर्मियों की नौकरी छीनकर उन्हें सड़क पर ला खड़ा किया. (रिलायंस रिटेल का राजस्व चालू वित्त वर्ष की जून तिमाही में 53 फीसदी बढ़कर 3,474 करोड़ रुपये रहा और इसी के साथ मुकेश अंबानी की रिलायंस रिटेल खुदरा क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी बन गई.)

चलते चलते कुछ अन्य तथ्यों पर नजर- भारत के सबसे अमीर व्यक्ति हैं मुकेश अंबानी, रिलायंस इंडस्ट्रीज देश में निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा उद्यम है,विश्व में पॉलिस्टर फाइबर और धागे का सबसे बड़ा उत्पादक है रिलायंस इंडस्ट्रीज, सालाना 3.3 करोड़ टन क्षमता के साथ रिलायंस इंडस्ट्रीज का रिफाइनरी परिसर विश्व में सबसे बड़ा है.

Abhishek Parashar : नेटवर्क 18 में आईएमटी (इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट) के जरिये 4,800 करोड़ रुपये के भारी भरकम निवेश के बाद टीवी 18 नेटवक्र्स की कमान अप्रत्यक्ष रूप से रिलायंस इंडस्ट्रीज के हाथों आने के बाद पुनर्गठन की कवायद…और इसके बाद लागत कटौती की पहल और फिर शुद्घ मुनाफे के तौर पर नेटवर्क 18 में लगभग 300 से अधिक मीडियाकर्मियों की बलि. आईबीएन 7 में तो काम करने वाले सभी मीडियाकर्मी की नौकरी गई है. सीएनएन आईबीएन के भी कुछ लोगों की नौकरी गई है. 300 से अधिकलोगों की नौकरी एक झटके में….मनमोहन-मोंटेक-चिदंबरम का अर्थशास्त्र कमाल की चीज है और उधर गुजरात की अर्थव्यवस्था कॉरपोरेट की रखैल अलग से है. सवाल यह है कि 83,000 करोड़ रुपये की नकदी के ढेर पर बैठी रिलायंस जैसी कंपनी के लिए निवेश का क्या मतलब हो सकता है? जबकि अधिकांश नकदी बैंकों में एफडी के तौर पर जमा सो निर्धारित ब्याज अलग से…..या फिर 4,800 करोड़ रुपये का निवेश किसी को बेरोजगार कैसे कर सकता है?

Mukesh Kumar : ये पत्रकारिता का भी संकट है……. मीडियाकर्मी की कटनी-छँटनी को केवल पत्रकारों के जीवन-यापन के संकट में देखना ग़लत होगा। ये पूरी पत्रकारिता का संकट है। बड़ी छँटनियों के ज़रिए पत्रकारों के मनोबल को तोड़ा जा रहा है। उनमें असुरक्षा की भावना को बढ़ाया जा रहा है ताकि वे जन सरोकारों को भूलकर अपने स्वामियों/कार्पोरेट के प्रति और भी समर्पित भाव से काम करें। वे जितने कमज़ोर होंगे उतनी अच्छी ग़ुलामी करेंगे, ये निहितार्थ है पत्रकारों को कमज़ोर एवं असहाय बनाने के पीछे। इसलिए वे तमाम लोग जो पत्रकारिता को बाज़ार का पहरूआ नहीं लोकतंत्र का स्तंभ या लाइट हाऊस मानते हैं, उन्हें पत्रकारों की चिंता करना चाहिए। अच्छे पत्रकारों की नस्ल को बचाने के लिए क्या किया जा सकता है इसकी योजना बनानी चाहिए।

Urmilesh Urmil : एक मोटे अनुमान के मुताबिक बीते आठ-नौ सालों में देश के विभिन्न मीडिया संस्थानों में हुई छंटनी, जबरन या सुनियोजित तरीके से इस्तीफे लेकर या बंदी के रास्ते तकरीबन 10 हजार से अधिक पत्रकारों-गैर पत्रकारकर्मियों को उनकी सेवा से बाहर किया गया है। टीवी-18 समूह के चैनलों में पत्रकारों की बेदखली से पहले कोलकाता के शारदा ग्रुप के चैनलों-अखबारों के 1500 से अधिक मीडियाकर्मी सड़क पर हैं। इस समूह के हजार से अधिक पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी सड़क पर हैं। श्रमजीवी पत्रकार और अन्य कर्मी कानून-1955 को सरकारों और मीडिया-मालिकों की मिलीभगत से बेमतलब बना दिया गया है। देश के श्रम कार्यालयों और कानूनों के पूरी तरह मृतप्राय होने के चलते पत्रकार-गैरपत्रकारकर्मियों की बेरोजगारी या उनके सेवा से हटाए जाने के बारे में कोई अधिकृत आंकड़ा नहीं आ सका है। मीडिया समूहों में ठेकेदारी व्यवस्था के बढ़ते दबदबे और अपने कुछेक नेताओं की कारगुजारियों के चलते अब यूनियनें भी खत्म हो गई हैं या कंकाल बन गई हैं। सरकार और पक्ष-विपक्ष के राजनेताओं को मीडिया उद्योग के मौजूदा परिदृश्य के बारे में सबकुछ मालूम है पर सच यह है कि वे पत्रकारों या कर्मचारियों के लिए कुछ भी नहीं करना चाहते। वे हमेशा से मालिकों के साथ रहते आए हैं। ऐसे माहौल में संसद के पिछले सत्र में सूचना प्रसारण मंत्रालय से सम्बद्ध संसद की स्थायी समिति की 47 वीं रिपोर्ट की सिफारिशें लागू कराने का सरकार पर दबाव बनाया जाय तो शायद भारतीय मीडिया की फौरी समस्याओं और चुनौतियों को कुछ हद तक संबोधित किया जा सकेगा। संसदीय समिति ने मीडिया संस्थानों में सभी पत्रकारों को ठेके पर रखने की प्रथा को पूरी तरह खारिज किया है।

Arun Sharma : मीडिया फेडरेशन ऑफ़ इंडिया चैनल्स मे हो रही पत्रकारों की बिदाई की और सरकार की गलत नीतियों की कड़ी निंदा और विरोध करती है हमारा सोचना है की अगर मंदी या कटोती के नाम पर किसी को निकाला जाता है तो ऐसा न हो इसका कोई समाधान भी निकल सकता है / मीडिया फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने हमेशा मीडिया प्रबंधको और पत्रकारों के बीच सोहार्द पूर्ण वातावरण को बनाया है हम चाहते हैं की ये सोहार्द पूर्ण वातावरण बना रहे / साथियों अगर आप मेरी बात से सहमत हैं तो अपने विचारों से जरूर अवगत करवाएं /

Arun Sathi : IBN7 से 300 लोगों को निकले जाने पर सब हाय तौबा कर रहे पर हमारे जैसे लाखो ग्रामीण रिपोर्टरों की आवाज कोई नहीं उठाता जो पैसे पैसे का मोहताज़ रह कर भी समाचार के साथ 24 घंटे जीता है और मीडिया हॉउस एक पैसा नहीं देता।

Md Rahmatullah : TV18 ग्रुप से बड़ी संख्या में पत्रकार साथियों का निकाला जाना बहुत ही दुखद और निंदनीय है। यह समझने में अब हमें भूल नहीं करनी चाहिए कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं केवल एक पेशा है। पेशा भी उद्योगपतियों का जो अपने हित की ख़ातिर हम जैसे क़लम के सिपाहियों का इस्तेमाल करते हैं। दुख की इस घड़ी में मैं उन सभी पत्रकार साथियों के साथ हूं जो इस विडंबना के शिकार हुए हैं…

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