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जलेस अध्यक्ष डॉ. शिवकुमार मिश्र को याद कर रहे हैं उद्भ्रांत

‘‘आज सुबह यह दुखद समाचार मिला कि जलेस अध्यक्ष डॉ. शिवकुमार मिश्र नहीं रहे। जनवाद के लिए वे सदैव संघर्षरत रहे। जनवादी आंदोलन की ये अपूरणीय क्षति है।’’ गत 21 जून को जब प्रातः दस बजे जलेस की दिल्ली इकाई के सचिव डॉ. बली सिंह का यह एसएमएस मिला तब मैं टी.वी. के विभिन्न चैनलों में दिखाई जा रही उत्तराखंड की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी के दिल हिला देने वाले मंज़र भारी मन से देखता और बीच-बीच में अचानक गीली होती आँखों को पोंछ रहा था। इस दूसरे आघात ने स्तब्ध कर दिया।

‘‘आज सुबह यह दुखद समाचार मिला कि जलेस अध्यक्ष डॉ. शिवकुमार मिश्र नहीं रहे। जनवाद के लिए वे सदैव संघर्षरत रहे। जनवादी आंदोलन की ये अपूरणीय क्षति है।’’ गत 21 जून को जब प्रातः दस बजे जलेस की दिल्ली इकाई के सचिव डॉ. बली सिंह का यह एसएमएस मिला तब मैं टी.वी. के विभिन्न चैनलों में दिखाई जा रही उत्तराखंड की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी के दिल हिला देने वाले मंज़र भारी मन से देखता और बीच-बीच में अचानक गीली होती आँखों को पोंछ रहा था। इस दूसरे आघात ने स्तब्ध कर दिया।

एकाएक विश्वास नहीं हुआ। मनुष्य की प्रकृति ऐसी ही है। अपने किसी प्रियजन के जाने के बाद उस दुखद सच्चाई को स्वीकार करने में उसे समय लगता है। मिश्र जी से एक-डेढ़ महीने पहले ही बात हुई थी। हमेशा की तरह बरसों से चले आ रहे घुटनों के दर्द और पत्नी की तबीयत ठीक न होने की शिकायत कर रहे थे। इतनी जल्दी चले जायेंगे यह तो कोई नहीं सोच सकता था।

तुरंत फोन मिलाया। उधर से उनकी बेटी थीं। ख़बर की पुष्टि करते हुए उन्होंने बताया कि पिछले महीने फेफड़ों के इन्फ़ैक्शन के चलते उन्हें अहमदाबाद के अस्पताल में भर्ती कराया गया था और आज सुबह 7 बजे के आसपास नहीं रहे। मैं एकाध महीने के अंतराल पर हमेशा फ़ोन पर उनके हालचाल लेता रहता था। वे दिल्ली जब भी आते अवश्य सूचित करते और गेस्ट हाउस में बुला लेते। घंटों चर्चा होती फिर मैं उन्हें छोड़ने स्टेशन भी जाता, क्योंकि एक-दो बार उन्होंने कहा कि तुम्हारे साथ रहने से बड़ा बल मिलता है।

एक बार निज़ामुद्दीन स्टेशन पर उन्हें सिर में चोट लग गई तो मैं स्टेशन के बाहर स्थित दवाओं की दुकान से दवाएं लेकर आया और गाड़ी आने पर उन्हें ठीक तरह से बर्थ में लिटा दिया। सहयात्रियों से भी उनका ध्यान रखने के लिए कहा। इस बात को वे हमेशा याद करते थे। एक बार बोले-‘‘हमारे संगठन के कुछ साथी अक्सर कहते हैं कि आप हर समय उद्भ्रांत की बात क्यों करते रहते हैं तो मैंने उन्हें कहा कि पहली बात तो यह कि उद्भ्रांत से हमारे सम्बंध जलेस की स्थापना और तुम लोगों से परिचय के भी बहुत पहले के हैं। दूसरे यह कि एक उद्भ्रांत ही हैं जो इतनी भागमभाग वाली व्यस्त ज़िंदगी में भी कई घंटों तक साथ रहकर हमारा ध्यान रखते हैं और स्टेशन तक छोड़ने जाते हैं। आप लोगों ने कभी इस बारे में सोचने की कोशिश तक नहीं की।’’

मिश्र जी के नाम से पहले ही वाकिफ़ था, लेकिन भेंट पहले-पहल हुई कानपुर के एक कार्यक्रम में वर्ष 1969 में, जिसमें स्थानीय स्तर पर ‘साठोत्तरी कविता’ नामक एक कविता संकलन का लोकार्पण गोष्ठी के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने किया था। गोष्ठी में शिरक़त करते हुए इन पंक्तियों के लेखक ने संकलित कविताओं को कमज़ोर बताकर कड़ा प्रहार किया था, मगर अध्यक्ष के रूप में मिश्र जी ने समावेशी पद्धति अपनाते हुए संकलित कवियों को सहानुभूति के योग्य माना था।

इसके बाद उनसे निरंतर संपर्क रहा। वर्ष 1973 में बाँदा के प्रगतिशील लेखक सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद मैं सक्रिय रूप से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़ा। आगे के लेखक सम्मेलनों में उनसे बराबर भेंट होती थी और वे मेरा उत्साहवर्द्धन करते थे। समकालीन कविताओं का मेरा पहला संग्रह ‘नाटकतंत्र तथा अन्य कवितायें’ जनवरी, 1977 में प्रकाशित होते ही पर्याप्त चर्चा में आ गया। उनका पहला महत्त्वपूर्ण पत्र मुझे इसी पुस्तक पर प्राप्त हुआ जो इस प्रकार था-

‘‘प्रिय उद्भ्रांत जी,

आशा है आप स्वस्थ-प्रसन्न होंगे। आपका कविता-संकलन मिल गया था। बाहर चले जाने के कारण आपको तत्काल नहीं लिख सका था। आपकी कविताओं को पढ़ता रहा हूँ-संकलन की कविताओं के अलावा भी। आपकी रचनाओं के भीतर से जो एक सात्विक रोष झाँक रहा है-व्यवस्था और उसके सरमाएदारों के प्रति-उसके प्रति मेरा लगाव रहा है और है। कुछ कविताओं में और विशेषतः ‘नाटकतंत्र’ में आपने गहराई में जाकर व्यवस्था को पहचानने और बेनक़ाब करने की कोशिश की है। अभिव्यक्ति सब जगह समान रूप से प्रभावशाली नहीं है, किंतु बीच-बीच के टुकड़े आंदोलित करते हैं और सोचने तथा कुछ करने के लिए उकसाते हैं। आपका यह रोष बरक़रार रहे- और भी धारदार बने-यही कामना है। आप अपनी कलम को माँजते रहें-‘वस्तु’ के साथ-साथ ‘रूप’ पर भी समान ध्यान दें। अभी इतना ही। अपने कुशल समाचार देंगे। शेष शुभ।’’

मिश्र जी आगे भी मेरे ऊपर लिखते रहे। वर्ष 1989 में प्रकाशित समकालीन कविताओं के मेरे दूसरे संग्रह ‘क्या शब्द कम ताक़तवर है’ और 1998 में प्रकाशित ‘काली मीनार का ढहाते हुए’ के अतिरिक्त ‘शब्दकमल खिला है’ पर भी उन्होंने टिप्पणियाँ कीं और युधिष्ठिर पर केन्द्रित महाकाव्य ‘अभिनव पाण्डव’ पर गहराई से विचार करते हुए ‘संवेद’ में लिखा-‘‘उद्भ्रांत की यह महत्त्वाकांक्षी रचना पाठक-समाज को आंदोलित ज़रूर करेगी, अपने विचारोत्तेजक कथ्य के नाते ही चर्चित होगी और समकालीन काव्य-विमर्श का विषय वह बनेगी।’’ वर्ष 1999 में प्रकाशित कविता संग्रह ‘शब्दकमल’ के आवरण पर प्रकाशित उनकी टिप्पणी इस प्रकार थी-‘‘उद्भ्रांत की कविताओं में अपने समय की गहरी बेचैनी परिलक्षित होती है, जो उनकी सबसे बड़ी पंूजी है। किसी भी बड़ी कविता के पीछे रचनाकार की यही बेचैनी कार्य करती है। इसके अभाव में बड़ी कविता जन्म नहीं ले सकती। उनमें एक बेचैनी मौजूदा पतनशील माहौल को लेकर है और एक बेचैनी अपनी रचनात्मक ऊर्जा और उसे अभिव्यक्ति देने के लिए विविध साहित्यिक ट्रेंड्स को लेकर भी है। शब्द से क्रांति नहीं होती, किंतु जब शब्द को सलीके के साथ उस बड़े आशय से जोड़ा जाता है जो विचार और दर्शन को समकालीन ज़िंदगी को समझने का नज़रिया देता है तो काली मीनार ढहती है। नामवर जी ने ठीक ही कहा है कि उद्भ्रांत में अपनी कविता के प्रति अदम्य आत्मविश्वास है और उन्हें किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। एक सार्थक रचना को अगर हम इग्नोर करते हैं तो खुद बेनक़ाब होते हैं। उद्भ्रांत की कविताएं अपनी शक्ति की स्वयं गवाही देती हैं। इस अंधेरे समय में न केवल वे निरंतर लिख रहे हैं वरन् टिके हुये हैं, यह बड़ी बात है। इनकी कविताएं स्वयं बोलती हैं। कवि की आंतरिक बेचैनी ही शब्द को क्रियाशील व ताक़तवर बनाती है। मेरी कामना है कि उद्भ्रांत में यह बेचैनी सदा बनी रहे।’’

वर्ष 1998 में नवगीत संग्रह ‘हिरना कस्तूरी’ का दूसरा संस्करण दिल्ली के अभिरुचि प्रकाशन से आया था। उन दिनों वे किसी काम से दिल्ली आये हुये थे और जलेस के कार्यालय 8, विट्ठलभाई पटेल हाउस में ठहरे थे। दूरदर्शन के दिल्ली केन्द्र का ऑफ़िस तब ठीक सामने संसद मार्ग पर होता था। मैं हमेशा की तरह मिलने गया और उन्हें पुस्तक भेंट की। मिश्र जी आधे घंटे तक देखते रहे फिर बोले, ‘‘तुम्हारे गीतों का शिल्प नया है और कथ्य आधुनिक। एक बात और कहूँगा कि इन्हें पढ़ते हुए पता नहीं क्यों मुझे निराला की ‘गीतिका’ के कुछ गीतों का स्मरण हो आया।’’ मैंने मिश्र जी की बातों को अपने लिए उनके विशेष स्नेह का सूचक माना।

‘पहल’-पुस्तिका में प्रकाशित काव्य-नाटक ‘ब्लैकहोल’ को भी उन्होंने बहुत पसंद किया था मगर इस भूल की तरफ़ भी संकेत किया था कि ज्योतिबा फुले सम्बंधी संवाद स्त्री-पात्र के मुख से कहलवाया गया है। गत वर्ष प्रकाशित नाटक के पुस्तक संस्करण में कुछ अन्य संशोधनों के साथ सावित्री बाई फुले सम्बंधी नये संवाद जोड़ते हुए मैंने इस भूल को भी ठीक कर लिया था।

पिछले कुछ वर्षों से वे मुझे ध्यान में रखकर एक बड़ा मूल्यांकनपरक लेख लिखने की बात कहते थे कि तुम्हारा इधर बहुत काम आया है। पिछले वर्ष साहित्य अकादेमी ने उन्हें किसी कार्यक्रम में बुलाकर करोलबाग स्थित एक होटल में ठहराया। मैं एक मित्र के साथ उनसे मिलने पहुँचा। वे उन्हें कुछ रसरंजन कराना चाहते थे, मगर पूछने की हिम्मत नहीं होती थी। आहिस्ते से मुझसे कहा। मैंने पूछा तो मिश्र जी मान गये। इस तरह पहली बार मैं उनके साथ ऐसे कार्यक्रम में शरीक़ हुआ। उस अवस्था में भी वे सजग मस्तिष्क से साहित्यिक मुद्दों पर बात कर रहे थे। थोड़ी देर में मुझसे बोले-‘‘इधर तुम्हारे ऊपर लिखने के लिए मेरे मन में एक नया शीर्षक आया है-‘उद्भ्रांत का गद्य’।

बता दूँ कि वे पहले भी व्यक्तिगत रूप से और पुस्तकों पर केन्द्रित गोष्ठियों में भी मेरे गद्य-लेखन, कहानियाँ, निबंध, आलोचना में भी सक्रिय रहने की चर्चा करते रहते थे। यह भी कि 46 भूमिकाओं की लगभग 500 पृष्ठों वाली किताब ‘सृजन की भूमि’ को मैंने आनंदप्रकाश दीक्षित के साथ उन्हें भी विशेष रूप से इसीलिए समर्पित किया था क्योंकि उन्हें महत्त्वपूर्ण बताते हुए एक किताब की शक्ल देने का सुझाव एकाधिक बार उन्होंने ही दिया था।

मैंने कहा कि इस लेख को फ़िलहाल मुल्तवी रखें। कविता पर केन्द्रित आपका प्रस्तावित लेख पहले आना चाहिए। मेरा लहज़ा कुछ तीखा था, जो प्रारंभ में उन्हें अच्छा नहीं लगा, मगर बाद में उन्होंने मुझे क्षमा कर दिया। वे निश्चय ही बड़े मनुष्य थे और व्यर्थ की चीज़ें ढोते नहीं थे।

वर्ष 2011 में दिल्ली आने से दो दिन पहले ही गुजरात से उन्होंने फोन कर मुझे कहा कि मैं दिल्ली के कार्यक्रमों को दो दिनों में निबटाकर तुम्हारे घर आऊँगा और पूरे दिन साथ रहूँगा। उन्होंने अपना वायदा निभाया और दिन भर साथ रहे। इस बीच एक प्रकाशक भी उनसे मिलने आये। पत्नी के बनाये भोजन की तारीफ़ करते रहे। चार-पाँच वर्ष पूर्व ‘हंस’ के वार्षिक आयोजन में राजेंद्र यादव ने उन्हें विशिष्ट वक्ता के रूप में आमंत्रित कर दरियागंज के किसी होटल में ठहराया था। ऐवाने-ग़ालिब हाल में कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद राजेंद्र जी ने मिश्र जी को मेरे हवाले करते हुए कहा कि ‘‘अब कानपुर का धर्म निभाओ!’’ उन दिनों मेरे पास ऑल्टो गाड़ी थी और यादव जी का आशय था कि मैं अपनी गाड़ी से उन्हें दरियागंज वाले होटल तक छोड़ दूँ। वे न भी कहते तो भी मैं वही करने वाला था।

वर्ष 1977 में ‘पहल’ के ‘मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र’ पर केन्द्रित विशेषांक में उनका लेख ‘यथार्थवाद: समाजवादी यथार्थवाद; उद्भव और विकास’ समाजवादी यथार्थवाद के विभिन्न रूपों की व्यापक पड़ताल करने वाला ऐतिहासिक महत्त्व का लेख था। उनका ग्रंथ ‘मार्क्सवादी साहित्य चिन्तन: इतिहास तथा सिद्धांत’ अपने विषय का बेजोड़ ग्रंथ है और उनके शीर्ष मार्क्सवादी चिंतक होने का जीवंत प्रमाण भी।

मिश्र जी का रहन-सहन साधारण था और उसी में उन्हें आनंद आता था। गुजरात विश्वविद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने पर उन्हें पता लगा कि सागर विश्वविद्यालय में वर्षों अध्यापन सम्बंधी उनकी वरिष्ठता यहाँ नहीं जुड़ेगी। लेकिन अब क्या हो सकता था, वापस जाना संभव नहीं था। नतीज़ा यह हुआ कि अवकाशप्राप्ति के बाद मिलने वाली पेंशन बहुत कम थी-घर चलाने के लिए अपर्याप्त। यह भी एक बड़ा कारण था कि वे साहित्यिक आयोजनों के निमंत्रणों पर स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए देशभर में घूमते थे ताकि वहाँ से मिलने वाला पारिश्रमिक घर की जीवनरेखा की समुचित आपूर्ति कर सके। आश्चर्य यह था कि ऐसी स्थिति में रहने के बावजूद उन्हें पैसे के मोह ने कभी नहीं सताया। आज जब बड़े-बड़े धर्मात्मा-महात्मा पुरस्कारादि पाने के लिए सत्ता-व्यवस्था के सामने शीर्षासन करते रहते हैं, ऐसे समय मिश्र जी ने गुजरात सरकार द्वारा उन्हें प्रस्तावित एक लाख रुपये के शीर्ष पुरस्कार को ठोकर मार दी थी!

पिछले दस वर्षों से वे जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष थे। स्वास्थ्य सम्बंधी कठिनाइयों के चलते कुछ वर्षों से वे इस दायित्व से मुक्त होना चाहते थे, मगर संगठन के पास उनके जैसे बड़े क़द वाला अध्यक्ष बनने योग्य दूसरा व्यक्तित्व नहीं था, इस कारण उन्हें अनुनय-विनय कर अध्यक्ष पद पर बने रहने के लिए मना लिया जाता था। बहुत कम लोग जानते हैं कि जलेस के रूप में प्रगतिशील लेखक संघ से अलग दूसरा लेखक संगठन बनाने में मुख्य भूमिका शिवकुमार मिश्र की ही थी। उनके शिष्यों की संख्या बड़ी है और वे देश भर में फैले हुए हैं। नामवर जी के बाद निर्विवाद रूप से मार्क्सवादी आलोचना के वे शिखर पुरुष थे।

इधर वर्षों से वे अपनी आउट ऑफ़ प्रिंट पुस्तकों के नये संस्करण प्रकाशित कराने के लिए चिंतित रहते थे और कहते थे कि अब जो थोड़ा-सा जीवन शेष है उसमें उनकी कोशिश है कि जो किताबें वर्षों से अप्राप्य हैं उनके नये संस्करण आ जायें। कुछ प्रकाशक इसी कारण उनसे संपर्क के इच्छुक रहते थे। पता नहीं इस दिशा में कितनी प्रगति हो सकी, क्योंकि इस बारे में मैं उनसे कुछ पूछ नहीं पाया। अपनी तरफ़ से उन्होंने बताया नहीं। बातें दूसरे विषयों पर होती रहती थीं और अचानक ट्रेन के चलने का सिग्नल मिलते ही हम एक-दूसरे से विदा ले लेते थे। अगर यह काम नहीं हुआ है तो हमें पहले तो उनके सभी अप्राप्य ग्रंथों के पुनर्प्रकाशन और अप्रकाशित काम को प्रकाशित कराने पर ज़ोर देना चाहिए, यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्हें मेरे शत-शत प्रणाम।

-उद्भ्रांत

नोएडा

मो. नं. 09818854678

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