जवानी में कौन लड़कियों के पीछे नहीं भागा : शरद यादव

Shambhunath Shukla : मंगलवार को लोकसभा में शरद यादव ने कुछ गलत नहीं कहा कि जवानी में कौन लड़कियों के पीछे नहीं भागा और किसने किसको नहीं घूरा। शरद यादव ने कहा कि इस पर रोक लगाने का मतलब प्रेम पर बंदिश। शरद जी की इस बात से सहमत हुआ जा सकता है। जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी घूरने से नहीं बच पाए तो आम आदमी की क्या बिसात। तुलसीदास ने मर्यादा पुरुषोत्तम के सारे अवगुणों की अनदेखी की है मसलन सीता का अग्रिप्रवेश और उत्तर कांड में उनका वनवास लेकिन सीता को देखने की ललक श्रीराम में कितनी थी इसका वर्णन जरूर किया है-

अस कहि पुनि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भये नयन चकोरा।
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहु सकुचि निमि तजे दृगंचल।।

तुलसीदास तो लिखते हैं कि वे बार-बार सीताजी की तरफ देखते हैं। और नयन तो मानों स्थिर हो गए। यह देखकर नयनों में वास करने वाले निमि महाराज, जिनकी वजह से पलकें उठती गिरती हैं, नयन छोड़कर चले गए क्योंकि वे रिश्ते में सीता के बाबा लगते थे।

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Om Thanvi : आज दिन में संसद की तरफ चला गया। थोड़ी देर राज्यसभा की कार्यवाही देखी-सुनी। फिर सेंट्रल हॉल के बाहर दूध-दही के काउंटर पर छाछ पी, टी-बोर्ड के काउंटर से एकल बागान (सिंगल एस्टेट) वाली दार्जीलिंग चाय की पसंदीदा पत्ती खरीदी और लौट आया। एक बात कहूं। दिल से। बड़े-बड़े खंभों से घिरे गलियारों में आते-जाते एक घुटन-सी महसूस होती है। वही घुटन मुझे नेताओं के इर्द-गिर्द भी अनुभव होती है — अगर रोजगार में कभी उनकी सोहबत का काम पड़ जाय! संसद में गहमागहमी आज भी होनी ही थी। प्रधानमंत्री मौजूद थे। बाहर लोगों की जुबान पर एक ही सवाल था, क्या सरकार चलेगी? चुनाव कब होंगे? संसद की यह इमारत जल्द निर्माण के सौ साल पूरे कर लेगी। आजादी के बाद उसकी आभा हमारे लिए और बढ़ी है। फिर भी, पूरे रख-रखाव के बावजूद, स्वाभाविक है कि जहां-तहां उसके कोनों-कोठरों से सीलन की बू सिर उठा ही लेती है। किसी भभके के साथ लगता यों हैं मानो ढेर चमगादड़ें एक साथ फड़फड़ाती जाने किधर से आएंगी और किधर निकल जाएंगी। संसद भवन के विशाल खंभों के बीच बैठकर थोड़ी देर सुस्ताते हुए मैंने गर्दन ऊपर की और खंभों की ऊंचाई को नापा। पता नहीं क्यों, बरबस कहीं भीतर कविवर कैलाश वाजपेयी की एक कविता 'राजधानी' की पंक्तियां कुलबुला उठीं:

"शिला की तरह गिरी है स्वतंत्रता
और पिचक गया है पूरा देश …"

न कोई संदर्भ था, न प्रसंग — पर कविता की जो पंक्तियां उस वक्त अचानक याद आईं, उनकी गूंज अब तक बनी हुई है। ये टीप लिखकर छोड़ूं तो शायद उससे पीछा छूटे!

वरिष्ठ पत्रकार द्वय शंभूनाथ शुक्ला और ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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